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पानीपत का तीसरा युद्ध: भारत के सैन्य इतिहास की एक क्रांतिकारी घटना

सार

संक्रांति के चार दिन बाद (उस साल संक्रांति 10 जनवरी को थी) 14 जनवरी को मिली भयानक हार ने ही मराठी कहावत 'संक्रांत झाला' को जन्म दिया। मराठे तो 10 साल में फिर खड़े हो गए, भारत के डिफैक्टो शासक बन गए, लेकिन जिन राजाओं ने उनका साथ नहीं दिया उन्होंने यह तय कर दिया था कि भारत को फिर स्वाभिमान से खड़े होने में सदियां लगेंगी।
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सदाशिव राव भाऊ - फोटो : social media
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विस्तार
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"दोन मोती गळाले, २७ मोहोरा गमावल्या, चांदी व तांब्याची नाणी किती गेली याची गणतीच नाही"

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(दो मोती खो दिए हैं। सोने की 27 मोहर भी चली गई। चांदी और तांबे की तो कोई गिनती ही नहीं)

24 जनवरी 1761 को नाना साहब पेशवा (प्रथम) को यह गुप्त संदेश तब मिला था जब वे अपनी सेना के साथ उत्तर भारत की ओर बढ़ रहे थे।  आज उत्तर भारत में हम लोग ठिठुर रहे हैं। ठंड की वजह से घरों में दुबके हैं, लेकिन 263 साल पहले आज ही के दिन मराठे अपने घरों से 1500 किलोमीटर दूर पानीपत में एक विदेशी ताकत से लड़ रहे थे। न उनके साथ जाट थे, न सिख और न राजपूत। हां, विदेशियों के साथ परंपरा के मुताबिक भारत के लोग जरूर थे। 

मराठों के पास तो खाने को भी कुछ नहीं था और तन पर जो कपड़े थे वे भी उत्तर भारत की इस सर्दी से निपटने के लिए नाकाफी थे। 

नाना साहब को मिले गुप्त संदेश से साफ था कि मराठों की बुरी हार हुई है। जिन दो मोतियों की बात संदेश में की गई थी वे थे- मराठा सेना का नेतृत्व कर रहे सदाशिव राव भाऊ और खुद पेशवा के बेटे विश्वास राव। 

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मराठा सैनिकों के साथ बर्बरता

युद्ध के बाद कम से कम 10 हजार मराठा सैनिकों को बंदी बनाया गया था। आत्मसमर्पण का भी दुश्मन पर असर नहीं पड़ा। इन्हें अनाज के कुछ दाने दिए गए और एक घूंट पानी। इसके बाद इन सब के सिर कलम कर दिए गए। अफगान, रोहिल्ले, मुगल और लखनऊ के शाह शुजाउद्दौला की सेना इन पर टूट पड़ी थीं। हर अफगान सरदार के तंबू के बाहर एक कल्ला मीनार (कटे सिरों का टावर) थी। 

यही नहीं, गुलाम हुसैन ने सियार-उल-मुतखरीन में लिखा है कि बैलगाड़ियों में सवार कर के 22 हजार महिलाओं और बच्चों को भी गुलाम के तौर पर भेजा गया था। ये महिलाएं वे थीं जो मराठा सेना के साथ उत्तर भारत की तीर्थयात्रा पर आई थीं। संभवतः इन गुलामों को काबुल के बाजारों में कुछ सिक्कों के बदले बेच दिया गया। किसी तरह जो बच सके उन्होंने बुरी तरह घायल मराठों की मात्र जाट राजा सूरजमल ने मदद की। महाराजा सूरजमल ने उन्हें आश्रय दिया और हर एक को एक रुपया और कपड़े देकर पुणे भेजा।

संक्रांति के चार दिन बाद (उस साल संक्रांति 10 जनवरी को थी) मिली इस भयानक हार ने ही मराठी कहावत 'संक्रांत झाला' को जन्म दिया। मराठे तो 10 साल में फिर खड़े हो गए, भारत के डिफैक्टो शासक बन गए, लेकिन जिन राजाओं ने उनका साथ नहीं दिया उन्होंने यह तय कर दिया कि भारत को फिर स्वाभिमान से खड़े होने में सदियां लगेंगी।
 
पानीपत में प्राण गंवाने वाले बलिदानियों को श्रद्धांजलि।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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