अप्रैल 1789 में सिडनी के आदिवासी समुदायों के बीच फैली चेचक महामारी के स्रोत को लेकर लंबे समय तक इतिहासकारों के बीच भ्रम बना रहा। शोधकर्ताओं के अनुसार, ब्रिटिश उपनिवेशवादी ऑस्ट्रेलिया में टीकाकरण के लिए चेचक वायरस से संक्रमित नमूने अपने साथ लाए थे, जो संभवतः संक्रमण का कारण बने होंगे।
अप्रैल 1789 में सिडनी क्षेत्र के आदिवासी समुदायों के बीच चेचक (स्मॉलपॉक्स) के रूप में पहली महामारी फैली। लंबे समय तक इतिहासकारों का मानना था कि यह बीमारी ब्रिटिशों के कारण नहीं, बल्कि उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में आने वाले मकासन व्यापारियों के जरिये फैली थी। हालांकि, नेचर ह्यूमन बिहेवियर में प्रकाशित नया शोध इस धारणा को चुनौती देता है।
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शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि आखिर महामारी कैसे फैली होगी। अध्ययन के अनुसार, संक्रमण की शुरुआत ब्रिटिश कॉलोनी से हुई थी। यह महामारी उत्तर और पश्चिम दिशा में हजारों किलोमीटर तक फैली हो सकती थी और इससे लगभग 2.2 लाख आदिवासियों की मौत हुई। यह दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक थी। चेचक के सबूत मिस्र की ममी में मिले हैं, जो 1500 ईसा पूर्व की है।
18वीं सदी के यूरोप में हर वर्ष औसतन चार लाख लोगों की मौत इससे होती थी, जबकि 20वीं सदी में इस बीमारी ने लगभग 30 करोड़ लोगों की जान ली। अध्ययन के अनुसार, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया से सिडनी तक ऐसा कोई संभावित मार्ग नहीं था, जिससे 1789 में महामारी पहुंच सकती। महामारी मुख्य रूप से समुद्री तटों और बड़ी नदियों के किनारे फैली, लेकिन पूरे ऑस्ट्रेलिया में नहीं पहुंची। शोधकर्ताओं का मानना है कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी अपने साथ ‘वैरिओला मैटर’, यानी चेचक वायरस से संक्रमित जैविक नमूने लाए थे, जिनका उपयोग टीकाकरण के लिए किया जाना था। संभव है कि यही सामग्री गलती से या जानबूझकर संक्रमण का कारण बनी हो। अध्ययन ने यह धारणा भी खारिज कर दी कि महामारी केवल सिडनी तक सीमित रही थी। मॉडल के अनुसार, यह संक्रमण लगभग 21 वर्षों तक आदिवासी आबादी में बना रहा।
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इस महामारी ने परिवारों, पारंपरिक ज्ञान, भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को गहरा नुकसान पहुंचाया। बुजुर्ग, बच्चे और गर्भवती महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित हुए। हालांकि, ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि भारी तबाही के बावजूद आदिवासी समुदाय ने स्वयं को दोबारा संगठित किया और अपनी भाषा, परंपराओं तथा सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा। यह अध्ययन याद दिलाता है कि उपनिवेशवाद की सबसे भयावह विरासत केवल भूमि पर कब्जा नहीं थी, बल्कि वे संक्रामक बीमारियां भी थीं, जिन्होंने कई समुदायों के इतिहास और भविष्य को हमेशा के लिए बदल दिया।