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दूसरा पहलू: जापान का सादो द्वीप और सबसे पुरानी नाट्य शैली...‘नोह’ को बचाने के लिए प्रयासरत हैं लोग

Tue, 09 Sep 2025 07:52 AM IST
शुभम कुमार मार्टिन फैकलर

सार

शिनोबू कामियामा पेशेवर अभिनेत्री नहीं हैं, लेकिन वह दुनिया के सबसे पुराने और अलौकिक रंगमंच (थिएटर) के प्रति बेहद जुनूनी हैं। विलियम शेक्सपियर से करीब दो सदी पहले नोह के कई नाटकों को मोतोकिया जियामी ने लिखा था। विद्वान मानते हैं कि इसकी शुरुआत करीब आठवीं शताब्दी में हुई थी। लेकिन, अब नोह पर संकट है।
 
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मार्टिन फैकलर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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शिनोबू कामियामा पेशेवर अभिनेत्री नहीं हैं। वह दो बच्चों की मां हैं और दिन में एक केंद्र में बुजुर्गों की देखभाल करती हैं। लेकिन, वह जापान के उत्तर-पश्चिम स्थित सादो द्वीप के कई निवासियों में से एक हैं, जो दुनिया के सबसे पुराने और अलौकिक रंगमंच (थिएटर) के प्रति बेहद जुनूनी हैं। ग्रीष्म की एक रात्रि को कामियामा ने जापान की प्राचीन नाट्य शैली ‘नोह’ में भूतों से संबंधित कहानी में प्रमुख किरदार निभाया। उन्होंने जब एक छोटा अंडाकार मास्क और सुंदर किमोनो पहनकर शिंटो मंदिर के लकड़ी के पुराने मंच पर कदम रखा, तो संगतकार बांसुरी और ढोल के साथ गीत गाने लगे।

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वह अपनी शैलीगत नृत्य मुद्राओं में थिरक रही थीं। उन्होंने भी गीत गाया। 43 वर्षीय कामियामा कहती हैं, ‘मैं नोह गीतों की सुंदरता के बीच पली-बढ़ी हूं और बचपन से ही इसे गा रही हूं। उस दिन कामियामा ने शाही दरबार की प्रसिद्ध महिला तमकाजुरा की भूमिका निभाई, जो अपनी सुंदरता से इतनी परेशान है कि मृत्यु के बाद आत्मा के रूप में लौट आती है। नोह नाटक अक्सर भूतों के आगमन पर केंद्रित और प्रसिद्ध पराजित योद्धाओं या दरबार के प्रमुख व्यक्तियों से संबंधित होते हैं।

द्वीप के नोह एसोसिएशन के प्रमुख तोशिहीरो कोंडो कहते हैं, ‘नोह भगवान को अर्पित की जाने वाली भेंट है।’ 45 हजार की आबादी वाले इस द्वीप में नोह के 34 मंच हैं, जिनमें से ज्यादातर बौद्ध धर्म या देश के मूल शिंटो धर्म के मंदिरों में स्थित हैं। जापान के ज्यादातर हिस्सो में नोह का अभ्यास पेशेवर रूप से किया जाता है, लेकिन सादो में हर साल दर्जनों प्रदर्शन शौकिया तौर पर होते हैं, जैसे कामियामा ने किया। 80 वर्षीय प्रशिक्षक इचिजी कहते हैं, ‘नोह यहां अब भी जीवंत संस्कृति बनी हुई है, पर यह इसका अंतिम स्थान है।’
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विलियम शेक्सपियर से करीब दो सदी पहले नोह के कई नाटकों को मोतोकिया जियामी ने लिखा था। विद्वान मानते हैं कि इसकी शुरुआत करीब आठवीं शताब्दी में हुई थी। लेकिन, जापान की बुजुर्ग होती आबादी के बीच सदियों पुराने नोह पर भी संकट है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नोह मंचों की संख्या आधी घटकर करीब 200 ही रह गई है। दो सदी पुराने नोह मंच वाले शिंटो मंदिर की 30वीं पीढ़ी के पुजारी यशियो हिनो कहते हैं कि इस कला को संरक्षित करने का मतलब है ज्यादा पर्यटकों को आकर्षित करना, जिन्होंने हाल के वर्षों में सादो द्वीप की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया है। कामियामा के प्रदर्शन को देखने के लिए स्थानीय और विदेशी पर्यटकों समेत करीब 200 दर्शक आए थे, जिनमें उनका पांच वर्षीय बेटा भी था। 

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