बसंत में खिले रंग-बिरंगे फूल हर जीव को आकर्षित करते हैं।
- फोटो : शोभिता अस्थाना
पंख हिला कर बुलबुल ने कुछ कहा और उड़ गई, हरियल अपनी ही धुन में कुछ गुनगुनाता रहा कि तभी अमलतास के पेड़ पर कुछ हलचल दिखाई दी। यहां पर पीले रंग की छोटी सी चिड़ियों की टोली डाल- डाल पर फुदक- फुदक कर कीट कीटाणु खा रही थी।
दूरबीन से देखने से पता चला की यह तो पूर्वी बबुना है। जब तक मैं कैमरा उठाती तब तक वह अमलताश से नीम, नीम से जामुन ओर फिर आगे निकल गई।
उसी समय चिररर की आवाज हुई तो देखा की नीम के तने पर कालपुठ आंगरा कठफोड़ा आ कर बैठ गया। वह तने पर अपनी चोंच से बार- बार ठोक रहा था। वह शायद अपने घोसले के लिए छेद बनाने की सही जगह तलाश रहा था?
बहुत देर तक कठफोड़ा नीम के तने पर गोल-गोल घूम नीचे से ऊपर विश्लेषण करता रहा कि तभी नीम के नीचे बहुत चहल- पहल दिखाई दी, देखा तो जंगल चरखी का एक समूह उछल- कूद कर रहा था।
जंगल चरखी को सात भाई भी कहा जाता है क्योंकि यह हरदम एक सयुंक्त परिवार के तरह मिलजुल कर ही रहते हैं। इस समय भी शायद वह सब मिलजुल कर कुछ खाना बटोर रहे थे ओर साथ ही साथ उनकी बातचीत चल रही थी।
बसंत में खिले रंग-बिरंगे फूल हर जीव को आकर्षित करते हैं। कभी चमकती बैगुनी शकरखोरा तेजी से आ कर हेलिकॉप्टर के जैसे फूल पर मंडराती है और अपनी पैनी चोंच से रस का सेवन करती है तो कभी तितलियां कोमलता से फूल के रस का चयन।
बैगुनी शकरखोरा की मादा और नर शकरखोरा रंग में बिलकुल अलग दिखते हैं। पक्षियों में कई बार नर और मादा के रंग भिन्न होते हैं। नर के पंख मादा को लुभाने के लिए रंगों से भरपूर अत्याधिक आकर्षक होते हैं। मादा अंडे देती है, उन्हें सेती है। अन्य शिकारी जीवों कि दृष्टि उनके घोसंले पर ना पडे, शायद इसी कारण से सृष्टि रचयिता ने मादा को सादगी प्रदान की होगी?
तभी दूर कहीं अम्बुवा की बोर पर कोयल की कूक सुनाई दी मानोंं बसंत का स्वागत कर रही हो, अब मैं उसको देखने की उत्सुकता से अगले दिन से हर रोज बालकनी में समय बिताने लगी। लाल कोकयिया, सामान्य दरजी, सामान्य भुजंगा, कोयल, कौआ, कबूतर, छोटा फाख्ता, देसी मैना, अबलकी मैना, पुहय्या, आदि हर सुबह अपनी खेल क्रियाओं को दिखा कर मेरा मनोरंजन करने लगे ।
कुछ दिनों तक हर सुबह उनकी चहचहाट से मन खुश हो उठता रहा।
- फोटो : शोभिता अस्थाना
कुछ ही दिनों में पीपल के पत्ते गिर गए और फल आने लगे। फलों से आकर्षित हो बहुत प्रकार के पक्षी फलों का सेवन करने के लिए पीपल पर दिखने लगे। धनेष, सिपाही बुलबुल, लहबर तोता, हीरेमन तोते आदि। अरे! यहां तो गुलाबी मैना की टोली भी पहुंच गई।
कुछ दिनों तक हर सुबह उनकी चहचहाट से मन खुश हो उठता रहा। पीपल की अनजीर और शहतूत खा कर यह प्रवासी गुलाबी मैना समुंद्र पार अपने धर तक की लंबी यात्रा की तैयारी कर रही थीं।
क्या विचित्र दुनिया है इन पक्षियों की? बालकनी से ही मानों मैंने एक नई दुनिया की झलक देख ली। इन पक्षियों को देख मुझे बहुत आनंद मिला और बहुत कुछ सीखने को भी। परंतु बचपन में हमारे घरों में खेलने वाली गौरैया की बहुत याद आई। इंसान विकास की दौड़ में क्या अपनों से ही दूर हो चला है?
दरअसल, मुझे अपने विवाहित जीवन में अनेकों आर्मी की छविनियो में रहने का अवसर मिला। प्रकृति के अनुभवों से सृष्टि की ओर सम्मान ओर प्रेम उत्पन हुआ। पक्षियों से आकर्षित होने पर मैंने पक्षी और वृक्षों की जानकारी प्राप्त करने के प्रयास किया। अनेक वन, जलाशय तथा पहाड़ों का मभ्रमण कर विविध पक्षी जाती के विस्मयकारी आचरण को देख मुझे बहुत विनीत अनुभव हुए। इसी कारण अब मैं प्रकृति संगरक्षण और उसकी ओर जागरूकता बढ़ाने में परस्पर प्रयास करती हूं।
पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण की दिशा में ''प्रकृति संरक्षण फाउंडेशन'' की अहम भूमिका है। फाउंडेशन अपने ' प्रकृति संचार' कार्यक्रम के अंतर्गत प्रकृति संरक्षण, संवर्द्धन और हमारे पारिस्थितिक तंत्र के प्रति संवेदनशील है। इस संदर्भ में फाउंडेशन का उद्देश्य प्रकृति संरक्षण से संबंधित लेख, सुलेख और अन्य सामग्री को सभी भारतीय भाषाओं में प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखना चाहते हैं तो फाउंडेशन से संपर्क कर सकते हैं।
(शोभिता आस्थाना नियमित स्तंभकार हैं. एक ब्लॉगर के तौर पर भी वे विविध विषयों पर लगातार लिख रही हैं. )
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