देखना और सुनना जीवन की सबसे मुश्किल चीजों में से एक है। अगर आपकी आंखें चिंताओं से अंधी हो गई हैं, तो आप डूबते सूरज की खूबसूरती नहीं देख सकते। हममें से ज्यादातर लोगों का प्रकृति से नाता टूट गया है। सभ्यता तेजी से बड़े शहरों की ओर बढ़ रही है और हम शहरी बनते जा रहे हैं, भीड़-भाड़ वाले अपार्टमेंट में रहते हैं, शाम-सुबह आसमान देखने के लिए भी हमारे पास बहुत कम जगह होती है, और इसलिए हम कई तरह की खूबसूरती से दूर होते जा रहे हैं। मुझे नहीं पता कि आपने यह गौर किया है या नहीं कि हममें से कितने कम लोग उगते या डूबते सूरज, चांद, या पानी पर रोशनी के अक्स को देखते हैं।
प्रकृति से नाता टूटने के कारण, हम स्वाभाविक रूप से अपनी बौद्धिक क्षमताओं को विकसित करने लगते हैं। हम बहुत सारे म्यूजियम और कॉन्सर्ट में जाते हैं, टेलीविजन देखते हैं और मनोरंजन के कई दूसरे साधन अपनाते हैं। हम बार-बार दूसरों के विचारों का हवाला देते हैं और कला के बारे में बहुत सोचते व बातें करते हैं। ऐसा क्यों है कि हम कला पर इतना ज्यादा निर्भर रहते हैं? क्या यह भागने का, या खुद को जगाने का कोई तरीका है? अगर आप सीधे तौर पर प्रकृति के संपर्क में हैं; अगर आप उड़ते हुए किसी पक्षी की उड़ान को देखते हैं, आसमान की हर हरकत में खूबसूरती देखते हैं, पहाड़ों पर पड़ती परछाइयों या किसी दूसरे इन्सान के चेहरे की खूबसूरती को देखते हैं, तो क्या आपको लगता है कि आप किसी तस्वीर को देखने के लिए किसी म्यूजियम में जाना चाहेंगे?
शायद ऐसा इसलिए है, क्योंकि आपको अपने आसपास की चीजों को देखना ही नहीं आता, और शायद इसीलिए आप खुद को बेहतर ढंग से देखने के लिए किसी नशीली चीज का सहारा लेते हैं। लेखकों ने प्रकृति के साथ समय बिताया है, और हम दिन ब दिन दूर हो रहे हैं। हम भले ही ज्ञान के पुस्तकालयों में समय बिताएं, पर जीवन की असली सुंदरता हमारे हाथों से फिसल रही होती है। प्रकृति की हर चीज में, एक गहन रहस्य और आनंद छिपा होता है, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है। किसी नदी के बहाव में, किसी पेड़ की पत्तियों की हरकत में, हवाओं के संगीत में, हमें जीवन की अनकही सच्चाई मिलती है। और जब हम सचमुच देखना सीखते हैं, तभी हम अपनी अंतरात्मा की गहराइयों से जुड़ते हैं।
यह ध्यान और सजगता का कार्य है-यह केवल आंखों से देखना नहीं, बल्कि मन की गहराइयों से अनुभव करना है। आज के व्यस्त जीवन में, अगर हम थोड़ी देर रुकें, अपने विचारों और योजनाओं से मुक्त होकर, ध्यान से आसपास की चीजों को देखें, तो हमें पता चलेगा कि जीवन खुद में कितना समृद्ध और सुंदर है। एक पंख फड़फड़ाते हुए पक्षी में, एक फूल में या हल्की हवा में हमें वही आनंद और शांति मिल सकती है, जो किसी चित्र या संगीत में भी नहीं मिलती।
-फ्रीडम फ्रॉम द नोन के अनूदित अंश
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