प्लास्टिक के सेवन के बाद समुद्री पक्षियों में स्वास्थ्य से जुड़े कई प्रकार की समस्याएं देखी गई हैं।
- फोटो : डॉ. अनंत पांडे
वैज्ञानिक शोध से यह जाना गया है की समुद्री पक्षियों में प्लास्टिक निगलने के अनेक गंभीर प्रभाव हो सकते हैं। वयस्क पक्षी गलती से प्लास्टिक के कचरे को शिकार समझकर चूजों को खिला देते हैं जो बहुत छोटे, और शिकार करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। प्लास्टिक निगलने से इन चूजों की वयस्कता तक पहुंचने की संभावना कम हो जाती है। प्लास्टिक पक्षियों के पेट में जमा होने लगता है, जिसकी वजह से भुखमरी जैसी स्थिति पैदा होने से इनकी मृत्यु हो जाती है। मृत समुद्री पक्षियों के पेट में काफी मात्रा में प्लास्टिक पाया गया है।
प्लास्टिक के सेवन के बाद समुद्री पक्षियों में स्वास्थ्य से जुड़े कई प्रकार की समस्याएं देखी गई हैं, जैसे जो पक्षी वयस्कता तक जीवित रह जाते हैं उनके शरीर का विकास कम होता है। उनके पंख और चोंच छोटे रह जाते हैं और शरीर का वजन भी कम होता है। प्लास्टिक पक्षियों में गुर्दे संबधित विकार से यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ने के साथ कोलेस्ट्रॉल एवं एन्ज़इम्स के निर्माण पर भी विपरीत प्रभाव डालता है।
प्लास्टिक निगलने की समस्या समुद्री सतह पर शिकार करने वाले जैसे अल्बाट्रोस या गोते लगाने वाले जैसे पफिंस में भी पाई गई है। कुछ समुद्री पक्षी जैसे ऐल्बाट्रॉस प्लास्टिक पर दिए हुए मछलियों के अंडे या फिर प्लास्टिक के टुकड़ों को स्क्विड समझ कर खा जाते है। प्लास्टिक में उलझने और फंसने से भी कई समुद्री पक्षी घायल हो जाते हैं या संक्रमण के शिकार हो जाते है या फिर डूब जाते हैं। जाल में फसने के कारण उनकी चाल और गति धीमी हो जाती है जिससे वो आसानी से अन्य जानवरों के शिकार बन जाते है।
कुछ पक्षी प्लास्टिक को अपने घोसले बनाने के उपयोग में लाते हैं। इन पक्षियों के घोंसले में मछली पकड़ने वाले जाल और नायलॉन रस्सियां में प्राकृतिक सामग्री जैसे समुद्री शैवाल और सूखी टहनियों के साथ सयुंक्त की जाती है । घोसला बनाने में प्लास्टिक के उपयोग का दुष्प्रभाव अभी समुद्री पक्षियों में पूरी तरह ज्ञात नहीं हुआ है।
इंसानों द्वारा उत्पादित प्लास्टिक का असर दूरगामी क्षेत्रों में निवास करने वाले समुद्री पक्षियों पर भी हो रहा है। मुख्य भूभाग में प्लास्टिक का कुप्रभंधन न सिर्फ नदियों, भूमि और सागरी किनारों को दूषित कर रहा है बल्कि सुदूर इलाकों में भी समस्या बन चुका है। प्लास्टिक का उचित प्रबंधन और दुष्प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की सख़्त आवश्यकता है।
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