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जीवन धारा: मैं से हम तक, सपने, संघर्ष और समझ; जीवन का उद्देश्य जीत नहीं, विस्तार है

Thu, 08 Jan 2026 07:24 AM IST
शुभम कुमार बर्ट्रेंड रसेल

सार

जीवन हमें सिखाता है कि केवल ‘मैं’ ही वास्तविक नहीं है। जब हम समझ लेते हैं कि दूसरों का दुख भी हमारे जितना ही सत्य है, तब हमारी रुचियां निजी दायरे से निकलकर सामाजिक क्षितिज की ओर बढ़ती हैं।
 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मनुष्य का जीवन आरंभ में स्वयं के चारों ओर सिमटा होता है। बचपन में हमारी दुनिया छोटी और स्पष्ट होती है-मैं, मेरा घर, मेरी इच्छाएं, मेरी जरूरतें आदि। चेतना उस समय एक संकीर्ण नदी की तरह होती है, जो अपने किनारों में बंधी तेजी से बहती है। हर अवरोध चुनौती लगता है, हर मोड़ संघर्ष। यह स्वाभाविक है, क्योंकि यही हमें पहचान देता है, हमें चलना सिखाता है और आगे बढ़ने का साहस देता है। बिना इस आत्म-केंद्रित ऊर्जा के विकास संभव नहीं होता।

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युवावस्था में यही नदी वेग पकड़ लेती है। महत्वाकांक्षाएं तीव्र हो जाती हैं, सपने ऊंचाई मांगते हैं, और जीवन की धारा कई बार उग्र हो उठती है। हम स्वयं को सिद्ध करना चाहते हैं, संसार के सामने अपने अस्तित्व की घोषणा करना चाहते हैं। यह समय सृजन का भी होता है और थकान का भी। हम दीवारें खड़ी करते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि उन्हीं में हमारी सुरक्षा है। यह शोर, यह टकराव वह ऊर्जा है, जो हमें सीमाओं से परिचित कराती है।

अनुभव के साथ नदी चौड़ी होने लगती है। जीवन हमें यह सिखाता है कि केवल ‘मैं’ ही वास्तविक नहीं है। जब हम यह समझ लेते हैं कि दूसरों का दुख उतना ही सत्य है, जितना हमारा अपना, तभी हमारी रुचियां निजी दायरे से निकलकर सामाजिक क्षितिज की ओर बढ़ती हैं। हम परिवार, समाज, विचार व अंततः मानवता के बारे में सोचने लगते हैं। किनारे पीछे हटते हैं, प्रवाह शांत होता है, और संघर्ष की जगह समझ ले लेती है। इस परिपक्व अवस्था में एक गहरी शांति जन्म लेती है।
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जीवन अब युद्धभूमि नहीं लगता, बल्कि एक अर्थपूर्ण यात्रा प्रतीत होता है। हम जान जाते हैं कि हर वस्तु को नियंत्रित करना न संभव है और न आवश्यक। स्वीकार्यता बुद्धिमत्ता का रूप ले लेती है। अहंकार ढीला पड़ता है और करुणा उसका स्थान ग्रहण करती है। व्यक्ति स्वयं को केंद्र मानने के बजाय, व्यापक जीवन-प्रवाह का एक सजग अंश समझने लगता है।

जीवन के उत्तरार्ध में नदी समुद्र के समीप पहुंचती है। यहां न उतावलेपन की आवश्यकता होती है, न टकराव की। जल गहरा और शांत हो जाता है। व्यक्ति नाम, पद और पहचान से चिपका नहीं रहता, क्योंकि उसे यह बोध हो जाता है कि उसका अस्तित्व कभी अलग था ही नहीं। वह सदा से उसका हिस्सा रहा है। इस स्वीकार में कोई पीड़ा नहीं, क्योंकि खोने को कुछ शेष नहीं रहता।

जब अहंकार की दीवारें पूरी तरह गिर जाती हैं, तब जो बचता है, वह निर्मल चेतना है, यानी नदी का समुद्र में विलय। यहां व्यक्ति कुछ खोता नहीं, बल्कि उस अनंतता को प्राप्त करता है, जिसमें सब कुछ समाहित है। यही जीवन की पूर्णता है, जहां व्यक्तिगत सीमाएं समाप्त होकर सार्वभौमिक जीवन में बदल जाती हैं। अंततः यात्रा ‘मैं’ से ‘हम’ और फिर ‘सब’ की ओर होती है और इसी विस्तार में जीवन को उसका अर्थ, गरिमा और सच्ची गहराई प्राप्त होती है।

परिपक्व बनें
जीवन एक नदी है-आरंभ में संकीर्ण, तेज और आत्म-केंद्रित, पर समय के साथ गहरी, विस्तृत और शांत। संघर्ष उसका शोर नहीं, उसकी तैयारी है; अहंकार उसका बोझ नहीं, उसकी पहली ऊर्जा है। परिपक्वता का अर्थ जीतना नहीं, बल्कि जिंदगी को समझना है। जो इस नदी में बहना सीख लेता है, वही समुद्र तक पहुंचता है।

 

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