Dark Reality Of Online Games: वैसे यह चर्चा नई नहीं है, लेकिन गाजियाबाद की एक सोसायटी में तीन बहनों की सामूहिक खुदकुशी के बाद मोबाइल गेम्स की अंधेरी दुनिया एकबार फिर चर्चाओं में है। तकनीक के स्याह कोनों से कुछ ऐसी अदृश्य परछाइयां उभर रही हैं, जो हमारे घर के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले कोनों, बच्चों के कमरों तक पहुंच गई हैं।
स्कूलों में केवल कंप्यूटर चलाना सिखाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि डिजिटल नागरिकता और इंटरनेट के खतरों की पहचान करना सिखाना समय की मांग है। दूसरा, प्रत्येक जिले में साइबर-साइकोलॉजी विंग की स्थापना होनी चाहिए, जहां प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक और साइबर विशेषज्ञ मिलकर काम करें। सरकार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए सख्त एल्गोरिदम ऑडिट लागू करना चाहिए, ताकि वे किशोरों को ऐसे डार्क कंटेंट की ओर न धकेलें।
सरकार को इस समस्या का समाधान केवल तकनीकी प्रतिबंध या सेंसरशिप में नहीं ढूंढना चाहिए। अत्यधिक सख्ती अक्सर बच्चों को डार्क वेब जैसे और अधिक असुरक्षित रास्तों की ओर धकेल देती है।
सरकार को इसे केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं मानना चाहिए। यह एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक महामारी है, जिसे केवल डंडे के जोर पर नहीं रोका जा सकता। पुलिसिया जांच के दौरान पीड़ित परिवारों के साथ संवेदनशीलता बरतना जरूरी है, ताकि अन्य लोग डर के बजाय मदद के लिए सामने आ सकें।
सुसाइड गेम्स की सफलता की सबसे बड़ी वजह हमारे समाज में बढ़ती संवादहीनता है। अक्सर बच्चे इन जालों में तभी फंसते हैं, जब उन्हें घर पर सुनने या समझने वाला कोई नहीं होता। जब माता-पिता काम में व्यस्त होते हैं और बच्चा फोन के साथ अकेला होता है तो वह अनजाने में ऐसे समूहों का हिस्सा बन जाता है, जहां उसे महत्व मिलने का भ्रम होता है।
इसलिए डिजिटल डिटॉक्स से अधिक जरूरी इमोशनल कनेक्ट है। यदि बच्चा अपने माता-पिता के साथ अपनी हर छोटी उलझन साझा करने में सहज है तो कोई भी आभासी खेल उसे मौत के मुहाने तक नहीं ले जा सकता।
ब्लू व्हेल, मोमो जैसे खतरे केवल इंटरनेट की बुराइयां नहीं हैं, बल्कि ये हमारे समाज के खोखले होते जा रहे भावनात्मक ढांचे का प्रतिबिंब हैं। यह समय केवल तकनीक को दोष देने का नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटने का है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरासत भी, विकास भी के मंत्र में विरासत का अर्थ केवल ऐतिहासिक स्मारकों को बचाना नहीं है, बल्कि हमारे उस पारिवारिक ताने-बाने को बचाना भी है, जहां संवाद और संवेदना प्राथमिक थे। सरकार, समाज और परिवारों को मिलकर एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार करना होगा, जहां हमारे किशोरों को आभासी रोमांच की तलाश में अपनी जान जोखिम में न डालनी पड़े।
हमें उन्हें यह सिखाना होगा कि हारना, असफल होना या उदास होना सामान्य है। इसके लिए जान देना कोई वीरता नहीं है। इंटरनेट को एक औजार की तरह इस्तेमाल करना चाहिए, न कि उसे अपनी जिंदगी का मालिक बना देना चाहिए।
जब तक हम सामूहिक रूप से किशोर मन की इन जटिलताओं को नहीं समझेंगे, तब तक आभासी दुनिया के ये शिकारी हमारे नौनिहालों का शिकार करते रहेंगे। यह समय जागने का है, इससे पहले कि एक और चिराग डिजिटल अंधेरे की भेंट चढ़ जाए।
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