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2019 में सिनेमा होगा सियासी अखाड़ा? रिलीज होंगी ये 4 साउथ इंडियन फिल्में, आखिर क्या है प्रोपेगैंडा?

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चुनाव से पहले सिनेमा राजनीति का नया अखाड़ा बनता दिखाई दे रहा है। - फोटो : Social Media
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बीते 5 सालों में भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव आया है। नेता, अभिनेता पहले से ही चुनावी राजनीति का हिस्सा रहे हैं, लेकिन ये वह समय है जब चुनाव से पहले सिनेमा राजनीति का नया अखाड़ा बनता दिखाई दे रहा है। दरअसल, दो दिन पहले मुंबई में राजनीतिक पार्टी शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की बायोपिक ठाकरे का ट्रेलर रिलीज़ हुआ था। ट्रेलर के साथ ही विवाद भी सामने आए और ये खत्म भी नहीं हुआ है कि शुक्रवार को फिल्म एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के ट्रेलर पर बवाल मचा हुआ है।

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इधर, मई 2019 से पहले साउथ से भी 4 पॉलिटिकल बॉयोपिक्स आ सकती हैं। पहली एनटीआर, जिसमें विद्या बालन एनटीआर की पत्नी की भूमिका में हैं। दूसरी केसीआर, तीसरी यात्रा, जो वायएस राजशेखर रेड्डी की राजनीतिक जीवनी है जिसमें मम्मूटी मुख्य भूमिका में हैं। चौथी चंद्रबाबू नायडू की ज़िंदगी पर बनी- चंद्रोदयन। मीडिया और सोशल मीडिया के बाद 2019 में सिनेमा राजनीति का नया रणक्षेत्र बन रहा है।

द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर शुरू से ही विवादों में है। - फोटो : Social Media
तो क्या ये चल रहा है प्रोपेगेंडा? 
इन फिल्मों के ट्रेलर देखकर ऐसा लग रहा है कि हिंदुस्तान में बन रही बॉयोपिक्स मीडियाई प्रोपेगैंडा और सोशल मीडिया के 'फ्रैंकेंस्टीन' फ़ेक न्यूज़ का विस्तार हैं। सरल होकर कहा जाए तो ये बॉयोपिक्स प्रोपेगैंडा और फ़ेक न्यूज़ की खिचड़ी लग रही हैं।

दरअसल, लकीर को छोटी करने के लिए बड़ी लकीर खींचने के बजाय ये आसपास की लकीरों को ही छिपाती हुई या अनदेखी करती हुई दिख रही हैं। वैसे भी बॉलीवुड की बॉयोपिक्स में हीरो को एस्टेब्लिस करने की लिए पहले विलेन को एस्टेब्लिस करने की परंपरा चल पड़ी है। हीरो इसलिए हीरो नहीं है कि वो हीरो है, बल्कि इसलिए है कि सामने एक विलेन है। धोनी को हीरो बनाने के लिए युवराज को विलेन बना दिया जाता है।  वर्ल्ड कप फाइनल की उनकी इनिंग को बड़ा करने के लिए गंभीर की इनिंग को छिपा लिया जाता है। ये अर्धसत्य है। 
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शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे पर बन रही बायोपिक में नवाजुद्दीन मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। - फोटो : amar ujala
मीडिया ये काम सालों से कर रहा है। हिंदुस्तानी सिनेमा ने नया-नया शुरू किया है। हिंदुस्तानी सिनेमा अब तक हिस्टोरिकल ड्रामा के नाम पर काल्पनिक इतिहास बेचता रहा है, अब वो पॉलिटिकल बॉयोपिक्स के नाम पर काल्पनिक वर्तमान बेचेगा, फिर जैसे हम सलीम-अनारकली के प्यार की कसमें खाते हैं वैसे ठाकरे के नायकत्व से गौरवान्वित हुआ करेंगे। प्रोपेगैंडा का उत्कर्ष है ये। 

लोग अक्सर कहते हैं कि गांधी ब्रिटिश डायरेक्टर ने क्यों बनाई, किसी हिंदुस्तानी ने क्यों नहीं बनाई? ठाकरे और एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के ट्रेलर देखकर लग रहा है कि नहीं बनाई तो ठीक ही किया।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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