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Teachers Day 2019: गुरुजी आपके व्यक्तित्व ने मुझे हर मुश्किल मोड़ पर रोशन किया

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प्रत्येक वर्ष शिक्षक दिवस मेरे बच्चों के साथ-साथ मेरे लिए भी बहुत खास होता है।
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प्रत्येक वर्ष शिक्षक दिवस मेरे बच्चों के साथ-साथ मेरे लिए भी बहुत खास होता है। जहां एक ओर मेरी दोनों पुत्रियां अपनी प्रिय अध्यापिकाओं के लिए कार्ड्स बनाने में व्यस्त होती हैं, वहीं मैं उनको देखकर अपने अतीत में खो जाता हूं। हमारी छ: से दसवीं कक्षा तक अंग्रेजी की अध्यापिका रहीं स्वर्गीया दमयंती रैना गुरुजी को मैं बहुत याद करता हूं।

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कुशल आध्यापिका होने के साथ-साथ वह एक अच्छी लेखिका व उपन्यासकार भी थीं । उनसे मिलने वाला प्रभावित हुए बिना रह ही नहीं सकता था । ‘ज़िन्दगी ज़िन्दा दिली का नाम है’ की मानो गुरुजी एक मिसाल थीं । यूं तो गुरूजी ने हमें सिर्फ कक्षा दस तक इलाहाबाद स्थित भारत स्काउट और गाइड विद्यालय में ही पढ़ाया, पर सौभाग्यवश परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि मैं उनसे अक्सर  मिला करता था।

यह बिलकुल सही है कि जो बड़े लोग होते हैं, वह अपने कर्मों से लोगों को प्रभावित करते हैं। ये गुरुजी से ही मैंने सीखा कि लिखने- पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती। आप उम्र के चाहे किसी भी पड़ाव में हों , अगर आप में लगन है, तो आप कभी भी, कुछ भी सीख सकते हैं । दसवीं  की परीक्षा देने के बाद मैंने घर में  ही अपने ताया जी से उर्दू पढ़ना आरम्भ कर दिया  था । ये बात जब मैंने अपनी गुरुजी को बतायी तो वह बहुत ख़ुश हुईं और बोलीं कि बचपन में उन्होंने भी उर्दू के कुछ सबक लिए थे, पर बाक़ायदा उन्हें कभी सीखने का मौक़ा नहीं मिला।
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‘क्या तुम मुझे सिखाओगे ?’ मेरी तो ख़ुशी का ठिकाना न रहा । प्रत्येक रविवार को सुबह नौ बजे मैं बलरामपुर, प्रयागराज स्थित उनके आवास पर अपनी साइकिल से पहुंच जाता। अंकलजी  (गुरुजी के पति ) मुझे देखते ही जोर से अपने घर में आवाज लगाते ,‘ दम्मो ! तुम्हारे उस्ताद जी आये हैं ’और फिर गुरुजी बाक़ायदा मुझसे सबक़ लेतीं ।

 

कुछ दिनों बाद गुरुजी ने मुझे अनुवाद का काम देना आरम्भ कर दिया । - फोटो : Pixabay
मुझे उनको सबक देने से अधिक उनके पूरे परिवार के साथ बैठ कर नाश्ता करने का इंतज़ार रहता था। उनके परिवार में सभी लोग लिखने - पढ़ने वाले थे । उनसे शहर के बहुत सारे लोग - सम्पादक , लेखक , गायक , कलाकार मिलने आया करते थे और गुरुजी मुझे बिना झिझक उनसे मिलवाया करती थीं - ‘ये हैं मेरे नन्हे उस्ताद।’  गुरुजी , उनकी सोहबत , उनका  पूरा परिवार मेरे लिए किसी गुरुकुल से कम नहीं था।

कुछ दिनों बाद गुरुजी ने मुझे अनुवाद का काम देना आरम्भ कर दिया । वह ‘ मनोरमा ‘ के लिए अनुवाद भी किया करती थीं । इस तरह से गुरुजी के ज़रिये मैंने लेखन के क्षेत्र में कदम रखा । लीडर , प्रयागराज टाइम्स , पत्रिका , अमृत प्रभात , अमर उजाला , दैनिक जागरण  , गंगा - जमुना जैसे प्रसिद्ध समाचार पत्रों में गुरुजी के मार्गदर्शन  में लिखना शुरू किया । मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरे लेखों से जो मुझे मानदेय मिलता था, वह मेरी पॉकेट पॉकेट-मनी में बोनस का कार्य करता था और मैं उनसे खूब सारी किताबें खरीदता था ।

गुरुजी खूब पढ़ती थीं और  हर चीज़  पढ़ती थीं । शायद यही वजह थी कि वह किसी भी टॉपिक पर हमेशा अपडेटेड रहती थीं। उनके साथ कभी भी बात करने पर जेनेरशन  गैप का एहसास नहीं हुआ । हमसे पहले, गुरुजी को शुक्रवार को रिलीज़ होने वाली फ़िल्म की जानकारी  होती थी । मैंने कभी भी उनको किसी भी वजह के चलते परेशान होते नहीं देखा । वह बड़ी से बड़ी  परेशानी का मुक़ाबला हंसते हुए करने में विशवास रखती थीं।

 
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हमारी गुरुजी हमारे बीच नहीं हैं , पर उनका व्यक्तित्व हमें जिंदगी के हर मुश्किल मोड़ पर रोशनी देता है ।
शायद गुरुजी ही एक ऐसी इन्सान थीं, जिनके घर पर मैंने ईश्वर, अल्लाह, गुरु नानक जी और भगवान जी, सभी खुदाओं को एक साथ किसी न किसी रूप में उनके लिखने की तख़्ती के सामने वाली अलमारी के शोकेस में विराजमान पाया । उनके लिए सारे भगवान बिना किसी भेद-भाव के एक ही थे । मुझे गुरुजी के ही कारण  इलाहाबाद शहर के अन्य नामचीन लोगों से  मिलने  और उन्हें करीब से जानने का मौक़ा मिला ।

प्रख्यात साहित्यकार रवीन्द्र कालिया, ममता कालिया, स्वतन्त्रा  सेनानी जनाब पुरुषोत्तम दास टंडन , फादर भट्ट , वी .एस .दत्ता , माला तनख़ा, उर्दू के मशहूर शायर चकबस्त के नवासे कर्नल काक साहब इनमें प्रमुख थे । समय अपनी रफ़्तार से निरन्तर भाग रहा था । देखते - देखते मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर ली और जॉब के चलते मुझे इलाहाबाद शहर को अलविदा कहना पड़ा । पर मैं जब भी इलाहाबाद आता, तो  गुरूजी से ज़रूर मिलता और जैसे  हर बार उनसे ज़िन्दजी को जीने का एक नया सबक़ ले कर वापस जाता ।

इलाहाबाद में  न रहने के बावजूद मैं  हमेशा  उनसे फ़ोन  के द्वारा जुड़ा रहने का प्रयास करता था। वह मुझे हमेशा बतातीं कि आजकल वह कौन सी किताब पढ़ रही हैं । शायद अन्तिम बार उन्होंने कालिया साहब की ‘ग़ालिब छुटी शराब ‘ का जिक्र किया था । गुरुजी हमेशा कहा करती थीं कि किताबें  हमारी सबसे अच्छी  दोस्त होती हैं  और कभी अकेला नहीं छोड़तीं ।  मुझे अक्सर जॉब के सिलसिले से यूरोप जाने का मौक़ा मिलता था ।

गुरुजी मुझसे छोटे बच्चों की तरह यूरोप  के विभिन्न देशों के बारे में , वहां के खान-पान , विशेष स्थानों के बारे में  बताने को कहतीं । किसी भी विदेश ट्रिप में जाने से पहले मैं गुरुजी को इत्तेला ज़रूर करता था और वह यही कहती थीं कि ‘अरे वाह ! तुम्हारे ज़रिए ऊपर वाला मुझे भी वर्चुअल विश्व भ्रमण करवा रहा है ।’ मेरी अन्तिंम बार गुरुजी से बातचीत मेरे 2012 के यूरोप दौरे में जाने से ठीक पहले हुई थी और लौटने के कुछ दिनों बाद ये ज्ञात हुआ कि गुरुजी का अचानक से देहांत हो गया । 

आज हमारी गुरुजी हमारे बीच नहीं हैं, पर उनका व्यक्तित्व हमें जिंदगी के हर मुश्किल मोड़ पर रोशनी देता है । अक्सर ये एहसास होता है कि गुरुजी जहां भी हैं, वहां से ज़िद करके उनको वापस ले आयें, पर न जाने, दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।            
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