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शिक्षक दिवस पर बचपन वो किस्सा जो आज भी हंसाता है

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शिक्षक हमारे भविष्य निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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शिक्षक दिवस से मेरा वास्ता स्कूल के समय से है। बचपन में जब स्कूल जाते थे तो साल भर बस इसी दिन का इन्तज़ार रहता था। यही एक दिन ऐसा होता था जब शिक्षक बन कर खूब मौज़ उड़ाते थे। ना तो स्कूल की वर्दी पहनने की झंझट और ना ही स्कूल बैग ले जाने की। इस दिन बड़ों की तरह तैयार हो कर स्कूल जाने का मौका मिलता था और सहपाठियों पर पूरे दिन खूब धौंस जमाते थे। थोड़ी शामत तब आती जब क्लास के सारे बच्चें कॉपियां जांचने को भी कह देते, और कभी- कभी तो बच्चों को चुप रख पाना भी किसी पहाड़ चढ़ने से कम ना हुआ करता था। लेकिन शिक्षक बनने पर उनकी जिम्मेदारियों का भी अहसास होता था।

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 वैसे तो जिंदगी के इस लंबे सफर में बहुत से शिक्षकों का योगदान है और उन सब के अथक प्रयासों से ही आज हम सब अपने अपने क्षेत्रों में एक कामयाब जिंदगी जी रहे हैं। लेकिन मेरे लिये सबसे विस्मरणीय समय तब का है, जब शिशुवस्था पूरी कर के बाहरी दुनिया में पहला कदम रखा था और पिता जी ने नर्सरी कक्षा में दाखिला करवाया ।

मेरी प्राथमिक शिक्षा वैसे तो उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण इलाके में हुई और सत्यनरायन और श्रीवास्ताव मास्टर जी अब भी याद हैं, जिनके अथक प्रयासों से क, ख, ग और पहाड़े ऐसे याद हुए की आज तक नहीं भूलते। भले ही आगे की शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से दिल्ली से पूरी करी हो लेकिन अब भी कहीं गुना भाग करते हैं तो अंदर जेहन में दो एक दो और दो दुनी चार वाले पहाड़े ही गिनते हैं।
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जहां एक तरफ संस्कारों की शिक्षा माता- पिता से मिलती है वही, शिक्षक हमारे भविष्य निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वैसे भी हम सब उस पीढ़ी के बच्चे थे जहां मास्टर जी की पढ़ाई के परिणाम से ज्यादा यह महत्तवपूर्ण होता था कि मास्टर जी बच्चों को मारते कितना हैं। बचपन में श्रीवास्तव मास्टर जी को पिता जी की वो शिकायत अब भी याद है- " मास्टर आजकल तुम पढ़ाते नहीं हो, देख रहा हूं कि इतने दिनों से इनको मारा भी नहीं" ।

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कबीर दास जी ने तो शिक्षक को भगवान् से भी ऊंचा दर्जा दिया है
शिक्षक ही हमारे जीवन की नींव रखते हैं। उसे इतना मजबूत बनाते हैं कि हम आगे ज़िन्दगी में हर चुनौती का सामना कर पायें। शिक्षक दिवस के इस अवसर पर बचपन में पिता जी का भी योगदान नहीं भुलाया जा सकता, उनकी सख्ताई में छिपे लाड़ प्यार से ही हम बचपन से सही रास्ते पर चलते हैं और आगे बढ़ते हैं। मुझे अब भी याद है जब पांचवी कक्षा का परिणाम आया था, बाकी सब विषयों में तो अच्छे नम्बरों से पास हो गया था लेकिन गणित के हिसाब किताब ने पूरे साल के हिसाब किताब को थोड़ा सा गड़बड़ा दिया था।  

उसके बाद पिता जी का फरमान आया कि गणित के क्षेत्र मे मेरी शानदार उपलब्धी को देखते हुए मुझे अपने बालों का त्याग करना पड़ेगा जिससे की मन पढ़ाई में ही लगा रहे। गणित और बालों का यह संबंध मुझे आज तक समझ नहीं आया परन्तु जब बाज़ार से सर मुंडवा कर वापस लौट रहा था तो एक और सहपाठी दिखा जिसकी हालत मेरे जैसी ही थी और जिज्ञासावास् पूछने पर पता चला कि गणित के साथ साथ अन्य विषयों का भी अपना महत्त्व है। जो महत्त्व मेरे लिये गणित का था वही उसके लिये विज्ञान का था। ऐसे ही ना जाने कितने अनुभव के साथ हम सब पढ़ लिख कर बड़े होते हैं।

जहां बोलना हमें माता- पिता सिखाते हैं वही, शिक्षक हमारे जीवन को लक्ष्य देता है। इतिहास में जहां एक तरफ लोग चन्द्रगुप्त को जानते हैं तो उससे ज्यादा उनके गुरु चाणक्य को जानते हैं, अगर भगवान राम है तो ऋषि विश्वामित्र भी है। कबीर दास जी ने तो शिक्षक को भगवान् से भी ऊंचा दर्जा दिया है, उन्होंने कहा है-

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु अपने गोविन्द दियो बताय।।

इसका अर्थ है गुरु और गोविन्द (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरु को अथवा गोविन्द को? ऐसी स्थिति में गुरु के श्रीचरणों में शीश झुकाना चाहिए क्योंकि वह गुरु ही होता है जिनके कृपा रुपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आज शिक्षा दिवस के इस पावन दिन पर में अपने सभी गुरुओं का सत सत नमन करता हूं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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