कबीर दास जी ने तो शिक्षक को भगवान् से भी ऊंचा दर्जा दिया है
शिक्षक ही हमारे जीवन की नींव रखते हैं। उसे इतना मजबूत बनाते हैं कि हम आगे ज़िन्दगी में हर चुनौती का सामना कर पायें। शिक्षक दिवस के इस अवसर पर बचपन में पिता जी का भी योगदान नहीं भुलाया जा सकता, उनकी सख्ताई में छिपे लाड़ प्यार से ही हम बचपन से सही रास्ते पर चलते हैं और आगे बढ़ते हैं। मुझे अब भी याद है जब पांचवी कक्षा का परिणाम आया था, बाकी सब विषयों में तो अच्छे नम्बरों से पास हो गया था लेकिन गणित के हिसाब किताब ने पूरे साल के हिसाब किताब को थोड़ा सा गड़बड़ा दिया था।
उसके बाद पिता जी का फरमान आया कि गणित के क्षेत्र मे मेरी शानदार उपलब्धी को देखते हुए मुझे अपने बालों का त्याग करना पड़ेगा जिससे की मन पढ़ाई में ही लगा रहे। गणित और बालों का यह संबंध मुझे आज तक समझ नहीं आया परन्तु जब बाज़ार से सर मुंडवा कर वापस लौट रहा था तो एक और सहपाठी दिखा जिसकी हालत मेरे जैसी ही थी और जिज्ञासावास् पूछने पर पता चला कि गणित के साथ साथ अन्य विषयों का भी अपना महत्त्व है। जो महत्त्व मेरे लिये गणित का था वही उसके लिये विज्ञान का था। ऐसे ही ना जाने कितने अनुभव के साथ हम सब पढ़ लिख कर बड़े होते हैं।
जहां बोलना हमें माता- पिता सिखाते हैं वही, शिक्षक हमारे जीवन को लक्ष्य देता है। इतिहास में जहां एक तरफ लोग चन्द्रगुप्त को जानते हैं तो उससे ज्यादा उनके गुरु चाणक्य को जानते हैं, अगर भगवान राम है तो ऋषि विश्वामित्र भी है। कबीर दास जी ने तो शिक्षक को भगवान् से भी ऊंचा दर्जा दिया है, उन्होंने कहा है-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु अपने गोविन्द दियो बताय।।
इसका अर्थ है गुरु और गोविन्द (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरु को अथवा गोविन्द को? ऐसी स्थिति में गुरु के श्रीचरणों में शीश झुकाना चाहिए क्योंकि वह गुरु ही होता है जिनके कृपा रुपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आज शिक्षा दिवस के इस पावन दिन पर में अपने सभी गुरुओं का सत सत नमन करता हूं।
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