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शिक्षक दिवस: नौ की सीढ़ी और 98 का सांप, बिना कहे कितना कुछ सिखा देता है ये खेल

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बचपन में हम सभी ने सांप-सीढ़ी का खेल खेला है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : instagram
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बचपन में हम सभी ने सांप-सीढ़ी का खेल खेला है। कभी जीते भी होंगे तो कभी हारे भी होंगे। कभी हमने सोचने का यह प्रयास किया है कि सांप-सीढ़ी का यह खेल हमारे जीवन में कितना प्रासंगिक है। वैसे तो यह बात साफ है कि यह खेल दिमाग का नहीं है।

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कुछ लोग इसे किस्मत का खेल मानते हैं और यह सही भी है कि पासे में आपको कितने अंक मिलेंगे यह आपकी किस्मत पर निर्भर करता है। खेल तो किस्मत का ही है, मगर इसमें ढेर सारा ज्ञान अंतर्निहित है। हम इसी अंतर्निहित ज्ञान को समझ नहीं पाते हैं और यदि समझते भी हैं तो अपने जीवन में उसका पालन नहीं कर पाते हैं। 


इतिहास में उपलब्ध जानकारियों से पता चलता है कि सांप-सीढ़ी खेल की शुरुआत संत ज्ञानदेव के समय में हुई थी और इस खेल का उद्देश्य बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाना था।  प्राचीन इतिहास में इस खेल का उल्लेख ‘मोक्षपट्ट’और ‘लीला’ नाम से भी मिलता है।
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इतिहास में जहां कहीं भी इस खेल का वर्णन मिलता है उसे पढ़ने से एक बात समझ में आती है कि प्रारंभिक दिनों में यह खेल मनोरंजन का नहीं था, बल्कि पाप और पुण्य के हिसाब का था। 

इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उस जमाने में कोई एक ऐसा व्यक्ति रहा होगा जिसके पास लोग अपने पाप और पुण्य का हिसाब जानने आते होंगे और वह पासे में आए नंबरों के आधार पर सांप और सीढ़ी को केंद्र में रखते हुए उनके पाप और पुण्य की जानकारी देता हो।

ऐसी स्थिति में सीढ़ी को स्वर्ग की सीढ़ी और सांप को नरक का द्वारा बताया गया हो। होने को कुछ भी हो सकता है और करने वाला कुछ भी कर सकता है। 

विदेशों में यह खेल भारत से ही पहुंचा है। इंग्लैंड पहुंचकर यह ‘स्नेक ऐंड लैडर’ हो गया। इंग्लैंड पहुंचने के बाद इस खेल में सांप और सीढि़यों की संख्या बराबर हो गई। उपलब्ध जानकारियों से यह भी पता चलता है कि मिल्टन ब्रेडले ने अमेरिका के लोगों से इस खेल का परिचय कराया। अमेरिका में इसको ‘शूट ऐंड लैडर’ के नाम से जानते हैं। 

इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ लोग इसे मानव स्वभाव की व्याख्या करने में प्रयोग में लाते हों। जैसे कि प्रश्न पूछने वाला मनुष्य का स्वभाव कैसा है, इसकी जानकारी भी सांप और सीढ़ी को आधार बनाकर की जाती है। पासा यदि सांप पर पहुंच गया तो उस व्यक्ति को गुस्सैल और पासा यदि सीढ़ी पर गया तो उसे शांत बताया जाता हो। ये सब थी इतिहास की बातें। 

वर्तमान समय में में हम सांप-सीढ़ी के इस खेल को किस नजरिए से देख सकते हैं। हमें जिंदगी जीने की कला सिखाता है। सौ खानों में बंटा यह खेल हमें जीवन-संघर्षों के दर्शन कराता है। मजे की बात है कि इस खेल से आपको कोई भगा नहीं सकता।

आपको डरा कर मैदान छोड़कर जाने को बाध्य नहीं कर सकता। यह खेल है जो आपको अनायास ऊपर ले जाता है। यह खेल है जो आपको अनायास नीचे गिरा देता है। यह खेल है जो खेलने वाले की लगन और साहस का इम्तेहान लेता है। 

अनायास ऊपर चढ़ना जितना रोमांचकारी होता है, अनायास नीचे गिरना उतना ही निराशाजनक होता है। यह जो अनायास होता है उसे कोई किस्मत कहता है, कोई संयोग भी कह सकता है। 100 खानों में बंटे इस खेल के अंतिम खाने में पहुंचने तक आप अनेक बार ऊपर चढ़ते हैं, अनेक बार नीचे गिरते हैं।

यह बड़े कमाल की चीज है। सांप-सीढ़ी का यह खेल जो इस तरह खेल-खेल में हमें जिंदगी जीने की कला सिखाता है। जीवन-संघर्षों के दर्शन कराता है।

हम में से बहुत से लोग जो कुछ भी कर रहे होते हैं, उसमें असफल होने पर उस कार्य को छोड़ देते हैं। कुछ और सोचने लगते हैं। अपने भाग्य को कोसने लगते हैं। महसूस कीजिए, कैसा लगता है मंजिल से बस दो कदम दूर, अनठानबे पर जाकर सांप का निवाला बनना और फिर एक नई चढ़ाई के लिए उसकी पूंछ के सहारे नीचे गिर जाना। 

अरुणिमा सिन्हा ने इसे महसूस किया होगा, जब शेरपा ने उसे मंजिल के एकदम करीब से लौटने को कहा होगा। यह खेल हमें आत्मनिर्भर बनना और अपने ऊपर विश्वास रखना सिखाता है। इस तरह की बातें करना आसान होता है लेकिन करना उतना ही कठिन होता है।

जब तक हम कोशिश नहीं करेंगे तब तक हमें अपनी काबिलियत का पता नहीं चलता और यह उतार-चढ़ाव ही एक ऐसा जरिया है जो हमारे अंदर सोई शक्तियों को जगाता है, इसलिए जिंदगी के उतार-चढ़ाव से डरने के बजाय उनका डटकर सामना करना चाहिए। 

यह जो डट कर सामना करने की बात है, यही परिश्रम है, पुरुषार्थ है। लक्ष्य जो भी हो, कदम बढ़ चले तो बढ़ चले। रुकेंगे तो अब लक्ष्य पर जाकर ही। बीच में थक गए, बीच में रुक गए तब हुआ संकट। कोई निकल पड़ा तेज कदमों से हमसे आगे और ले उड़ा लक्ष्य को, हमें उदास आंखों से देखता हुआ छोड़कर। लक्ष्य के प्रति यही दृढ़ता संकल्प को जन्म देती है। 

सांप ले आया है खींच कर बहुत ऊपर से बहुत नीचे, लेकिन सीढ़ी अभी भी नजर के सामने है। धूल से उठकर बढ़ चलने का हूनर मन में है। गिर-गिर कर उठ जाने का, उठ-उठ कर बढ़ जाने का हौसला तन में है। मन और तन का यह संयोग सांप और सीढ़ी के किसी भी संयोग से अधिक ताकतवर है, अधिक संभावनाशील है। 

इसी संकल्प के साथ एक बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी ने वस्त्र उतार दिए देह से तो फिर कभी धड़ पर धारण नहीं किए और दुनिया ने उन्हें बैरिस्टर से ‘महात्मा’ बना दिया, भारत ने उन्हें अपना राष्ट्रपिता बना लिया। पुरुषार्थ का बड़ा अप्रतिम उदाहरण है यह। सो, गुरु है यह सांप-सीढ़ी का खेल।

शिक्षक है यह जीवन का। सीखने वाले सीख लेते हैं इस खेल से- सांप है तो सीढ़ी भी है, उतार है तो उठान भी है, किस्मत है तो संयोग भी है, पासे में 1 है तो 6 भी है। यह खेल संभावनाओं का एक प्रखर प्रकाश-पुंज है।

समझने वालों के अंतर्मन को उजास से भर देता है। निराशा का अंधकार छंट जाता है, आशा की ज्योति जल जाती है। मैं शिक्षक-दिवस के अवसर पर नमन करता हूं इस मूक शिक्षक को जो बिना कहे कितना कुछ सिखा देता है। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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