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मुख्य धारा से दूर भारत का एक मात्र गांधी पंथी अहिंसक समुदाय है टाना भगत

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जब टाना भगत आंदोलन प्रारंभ हुआ था तो इस आंदोलन को दबाने के लिए ब्रितानी हुकूमत ने इनकी जमीन को बलात नीलाम कर दी थी। - फोटो : सोशल मीडिया
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टाना से टाना टोन टाना,

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कांसा-पीतल माना,
दोना-पत्तल खाना,
टाना से टाना टोन टाना,
हड़िया-दारू माना,
मूला भट-भूटल खाना,
टाना से टाना टोन टाना!


यह घोष वाक्य जतरा टाना भगत का है। गांधी आज दुनिया में पूजे जाते हैं। हर जगह गांधी की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है लेकिन गांधी को जीने वाला कोई समूह है तो वह टाना भगतों का समूह है। यह समूह गांधी के बताए रास्ते सत्य और अहिंसा के साथ आज भी जी रहे हैं। हिंसा से भरी इस दुनिया में झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र का टाना भगतों का समाज सचमुच अभिनव है।

जब हम उनके संघर्ष और सहिष्णुता के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालेंगे तो लगता है सचमुच गांधी इस धरती पर आज भी जीवित हैं और वह टाना भगतों के भौतिक शरीर में देखे जा सकते हैं। कोई आडंवर नहीं, कोई उठा-पटक नहीं, विगत लगभग 100 वर्षों से ये शालीनता से अपना जीवन जीए जा रहे हैं।
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आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जब टाना भगत आंदोलन प्रारंभ हुआ था तो इस आंदोलन को दबाने के लिए ब्रितानी हुकूमत ने इनकी जमीन को बलात नीलाम कर दी थी। स्वतंत्र भारत की सरकार भी इन्हें वो जमीन वापस नहीं दिला पाई। टाना भगत आज भी उस मांग को लेकर अहिंसक आंदोलन करते रहते हैं। टाना भगतों की अपनी दुनिया है और अपना पंथ है। गांधी की 150वीं जयंती पर टाना भगतों को इसलिए भी याद किया जाना चाहिए कि वे आज भी गांधी के बताए अहिंसक रास्ते पर चल रहे हैं। उनका जीवन बेहद सरह है और कम से कम संसाधनों में अपना निर्वहन करते हैं।
 

बिरसा मुंडा आंदोलन की समाप्ति के करीब 13 साल बाद टाना भगत आंदोलन शुरू हुआ। - फोटो : सोशल मीडिया
क्या है टाना भगतों का इतिहास?
बिरसा मुंडा आंदोलन की समाप्ति के करीब 13 साल बाद टाना भगत आंदोलन शुरू हुआ। वह ऐसा धार्मिक-राजनीतिक आंदोलन था, जिसके आर्थिक-राजनीतिक लक्ष्य थे। वह आदिवासी जनता को संगठित करने के लिए नए 'पंथ' के निर्माण का आंदोलन था। सच पूछिए तो वह बिरसा आंदोलन का ही विस्तार था। मुक्ति-संघर्ष के क्रम में बिरसा ने जनजातीय पंथ की स्थापना के लिए सामुदायिकता के आदर्श और मानदंड निर्धारित किए थे।

टाना भगत आंदोलन
टाना भगत आंदोलन में उन आदर्शों और मानदंडों के आधर पर जनजातीय पंथ को सुनिश्चित आकार प्रदान किया गया। बिरसा ने संघर्ष के दौरान शांतिमय और अहिंसक तरीके विकसित करने के प्रयास किए। टाना भगत आंदोलन में अहिंसा को संषर्ष के अमोघ अस्त्र के रूप में स्वीकार किया गया। बिरसा आंदोलन के तहत झारखंड में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का ऐसा स्वरूप विकसित हुआ, जिसको क्षेत्रीयता की सीमा में बांध नहीं जा सकता था।

टाना भगत आंदोलन ने संगठन का ढांचा और मूल रणनीति में क्षेत्रीयता से मुक्त रह कर ऐसा आकार ग्रहण किया कि वह गांधी के नेतृत्व में जारी आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन का अविभाज्य अंग बन गया।

टाना भगत आन्दोलन को चलाने वाले जगतरा टाना भगत
उपलब्ध इतिहास के अनुसार जतरा उरांव के नेतृत्व में उस आंदोलन के लिए जो संगठन नए पंथ के रूप में विकसित हुआ, उसमें करीब 26 हजार सदस्य शामिल थे। वह भी वर्ष 1914 के दौर में । जतरा उरांव का जन्म वतर्मान गुमला जिला के बिशुनपुर प्रखंड के चिंगारी नामक गांव में 1888 में हुआ था। जतरा उरांव ने 1914 में आदिवासी समाज में पशु- बलि, मांस भक्षण, जीव हत्या, शराब सेवन आदि दुर्गुणों को छोड़ कर सात्विक जीवन यापन करने का अभियान छेड़ा।

जतरा टाना भगत के नेतृत्व में ऐलान हुआ- माल गुजारी नहीं देंगे, बेगारी नहीं करेंगे और टैक्स नहीं देंगे। - फोटो : अमर उजाला
उन्होंने भूत-प्रेत जैसे अंधविश्वासों के खिलाफ सात्विक एवं निडर जीवन की नई शैली विकसित की और उनके इस जीवन शैली में जो शामिल हुए उन्हें टाना भगत कहा जाने लगा। उस शैली ने शोषण और अन्याय के खिलाफ लड़ने की नई दृष्टि आदिवासी समाज में विकसित की। तब आंदोलन का राजनीतिक लक्ष्य स्पष्ट होने लगा। सात्विक जीवन के लिए एक नए पंथ पर चलने वाले हजारों आदिवासी जैसे सामंतों, साहुकारों, मिशनरियों और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संगठित 'अहिंसक सेना' के सदस्य हो गए।

जतरा टाना भगत के नेतृत्व में ऐलान हुआ- माल गुजारी नहीं देंगे, बेगारी नहीं करेंगे और टैक्स नहीं देंगे। उसके साथ ही जतरा भगत का विद्रोह 'टाना भगत आंदोलन' के रूप में सुखिर्यों में आ गया। आंदोलन के मूल चरित्र और नीति को समझने में असमर्थ अंग्रेज सरकार ने घबराकर जतरा उरांव को 1914 में गिरफ्तार कर लिया। उन्हें डेढ़ साल की सजा दी गयी। जेल से छूटने के बाद जतरा उरांव का अचानक देहांत हो गया लेकिन टाना भगत आंदोलन अपनी अहिंसक नीति के कारण निरंतर विकसित होते हुए महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन से जुड़ गया।

टाना भगतों का संघर्ष कांग्रेस के इतिहास में है दर्ज
टाना भगतों का संघर्ष कांग्रेस के इतिहास में भी दर्ज है कि 1922 में कांग्रेस के गया सम्मेलन और 1923 के नागपुर सत्याग्रह में बड़ी संख्या में टाना भगत शामिल हुए थे। 1940 में रामगढ़ कांग्रेस में टाना भगतों ने महात्मा गांधी को 400 रु. की एक थैली भेट की थी।

टाना भगतों की शाखा
कालांतर में रीति-रिवाजों में भिन्नता के कारण टाना भगतों की कई शाखाएं विकसित हो गई। टाना भगतों की प्रमुख शाखा को सादा भगत कहा जाता है। इसके अलावे बाछीदान भगत, करमा भगत, लोदरी भगत, नवा भगत, नारायण भगत, गौरक्षणी भगत आदि कई शाखाएं हैं। 1948 में देश की आजाद सरकार ने 'टाना भगत रैयत एग्रिकल्चरल लैंड रेस्टोरेशन एक्ट'   पारित किया। यह अधिनियम अपने आप में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ टाना भगतों के आंदोलन की व्यापकता और उनकी कुर्बानी का आईना है। इस अधिनियम में 1913 से 1942 तक की अवधि में अंग्रेज सरकार द्वारा टाना भगतों की नीलाम की गई जमीन को वापस दिलाने का प्रावधान किया गया था।
 
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टाना भगतों की लड़ाई केवल अंग्रेजों के साथ ही नहीं थी अपितु स्वतंत्र भारत की सरकारों के साथ भी टाना भगत अपनी मांग को लेकर जुझते रहे हैं।
आजादी के बाद टाना भगतों का सरकार के साथ अंतरविरोध
बता दें कि टाना भगतों की लड़ाई केवल अंग्रेजों के साथ ही नहीं थी अपितु स्वतंत्र भारत की सरकारों के साथ भी टाना भगत अपनी मांग को लेकर जुझते रहे हैं। गौरतलब है कि हभी हाल ही में सरकार ने टाना भगतों का साल 1956 से बकाया लगान माफ कर दिया। यह टाना भगतों की पुरानी मांग थी। इस योजना के तहत 61 लाख 63 हजार 209 रुपए माफ किए गए हैं। राशि माफ करने के साथ ही सरकार ने टाना भगतों की जमीन पर लगान को लेकर एक रुपए की सेस लेने का फैसला किया है।

यह भी टाना भगतों की पुरानी मांग रही है। दरअसल, अलग-अलग जगहों पर नीलाम की गई जमीन की वापसी को लेकर टाना भगत लगातार आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन इस दिशा में मुक्कमल कारर्वाई कभी नहीं की गई। टाना भगतों का आरोप है कि अगर जमीन वापसी का पत्र जारी कर दिया गया बावजूद इसके दखल नहीं मिल पा रहा है। टाना भगतों को इसकी भी टीस है कि अलग राज्य गठन के 18 सालों बाद भी इस समुदाय के लोग हाशिए पर हैं। टाना भगतों के किसी भी गांव में जाएं, तो कच्चे मकान, कच्ची गलियां, वही खेत- खलिहान के भरोसे टिकी जिंदगी और दूर- दूर तक पैदल साइकिल से आते-जाते लोग दिखाई पड़ेंगे।

इन बातों ने टाना भगतों को आंदोलित किया है। वैसे टाना भगतों से बातचीत में एक बात यह भी रेखांकित होती है कि अपने समुदाय के लिए लोग संघर्ष दशकों से कर रहे हैं, पर वे भी संघ-संगठन और जिले के नाम पर लगातार बंटते रहे हैं। टाना भगतों की एक मांग यह भी है कि उनके लिए 1908 के खतियान के आधार पर भूमि का सीमांकन किया जाए। सरकार इस बात को भी मानने से इनकार करती रही है।

कहां-कहां बसते हैं टाना भगत
झारखंड राज्य के लोहरदगा, गुमला, खूंटी, रांची, चतरा, लातेहार, सिमड़ेगा जिले के अलग-अलग गांवों में टाना भगतों के परिवार बसे है। तिरंगा और अंहिसा के पुजारी झारखंड में इस समुदाय ने आजादी की लड़ाई में अहम भागीदारी निभाई है। इसलिए ये जहां भी हैं ग्रामीण क्षेत्र में ही रहते हैं। इनका अपना संसार है जो निहायत अहिंसक है।
टाना भगतों की पहचान एवं परंपरा बेहद सहज, सरल  व्यक्तित्व और सफेद धोती, कुर्ता, माथे पर टोपी, गमझा टाना भगतों की खास पहचान है।

इनकी महिलाएं सफेद साड़ी पहनती हैं। बड़े बुजुर्ग अब भी घरों से बाहर निकलने पर दूसरे के हाथ का पका खाना नहीं खाते हैं। वे गांधी को शिद्दत से जीते है। उनसे झूठ नहीं बोला जाता। कई बड़े, बुजुर्ग कतली से सूत कातते हैं। इसी सूत से वे लोग जनेऊ बनाते हैं। हर तीन महीने पर वे इसे बदलते भी हैं। साथ ही घर के दरवाजे पर गड़ा बांस और तिंरगा भी बदलते हैं, जिसकी वे हर सुबह पूजा करते हैं। कोई भी टाना भगत बिना स्रान और प्राथर्ना के भोजना ग्रहण नहीं करता है। हालांकि अब इन नियमों में थोड़ी कमजोरी आने लगी है लेकिन आज भी ये इसे निभा रहे हैं।

टाना भगतों की प्राथर्ना और उसका अर्थ
प्राथर्ना
भगवान बाबा निरमाल
आ मैनू सीरीजान
माना बाबा सीरीजन बाबा होई
आ मैनू सीरीजन
धरती आयो होय निरमाल
आ मैनू सीरीजन
चान-सूरुज बाबा
आ मैनू सीरीजन
सीरी सीता माय
आ मैनू सीरीजन
बुधु बीर बाबा निरमल
आ मैनू सीरीजन
लक्ष्मी आयो होय
आ मैनू सीरीजन
आ महात्मा गांधी बाबा निरमल
सीरीजान बीरीजन
मानो होले जोलो ढ़ाइच
नमो न बाबा
चालिन बड़ा बाबा
बाली मू बड़ा बाबा
चाली नू बाड़ो होले जालो ढाय दुधेर ढाय
आषीवाद चिया बाबा सीरीबाद चिया।


अर्थ
टाना भगत स्रान के बाद अपने दरवाजे पर गरे झंटे के पास जल चढ़ाते हैं और प्राथर्ना के माध्यम से सात देवताओं का आह्वान करते हैं। इसमें परम पिता परमात्मा, धरती माता, सूर्य देव, चन्द्रमा, सीता माता, लक्ष्मी माता और गौमाता का वे आह्वान करते हैं। फिर अपने गुरू जतरा टना भगत का आह्वान करते हैं।

इसके बाद महात्मा गांधी का आह्वान करते हैं। इसके साथ ही साथ उन सभी वीर सपूतों का आह्वान करते हैं जिन्होंने मानवत के लिए बलिदान दिया। प्राथर्ना का दूसरा पार्ट आह्वान किए गए देवताओं और गुरुओं को निर्मल जल और दूध से सेवा करने की बात कहते हैं। इसके बाद देवता को वे विसर्जित कर देते हैं। इस दैनिक अराधना के बाद ही टाना भगत भोजन करते हैं। यह प्रत्येक टाना भगतों का दैनिक धार्मिक अनुष्ठान है।

अपने पूवर्जों के बारे में बताते हैं टाना भगत
जतरा टाना भगत, तुरिया टाना भगत जैसे वीर हमारे दिलों में बसते हैं। यही वजह है कि नियमित तौर पर गांव के बड़े- बुजुर्ग इन वीर सपूतों की मूर्ति के पास प्राथर्ना करते हैं। रांची टाना भगत के अध्यक्ष खरिया टाना भगत का कहना है कि  हमारे पूवर्जों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी हम वतर्मान सरकार के खिलाफ भी लड़ रहे हैं। मौजूदा सिस्टम में बहुत आसानी से हक,अधिकार मिलने वाला नहीं है। गांवों और पंचायतों की बात नहीं सुनी जाती। आखिर हमलोगों को ही सरकारी दफ्तरों तक क्यों चक्कर लगाने पड़ते हैं। साहब लोग गांव क्यों नहीं आते। उनके दरख्वास्त पर तत्काल और समुचित कारर्वाई क्यों नहीं होती?

वहीं, बेरमो रांची के गंगा टाना भगत का कहना है कि हमें समुदाय के बच्चों और युवाओं की शिक्षा तथा रोजगार को लेकर चिंता होती है। इसके साथ ही समाज के मूल्य को लेकर भी चिंतित हैं। टाना भगतों के बच्चों के लिए छोटानागपुर में कई आवासीय स्कूल हैं लेकिन वहां की व्यवस्था उनके समाज के अनुकूल नहीं है। टाना भगतों के बच्चों को मांसाहारी भोजन परोसा जाता रहा है। परंपराग तौर पर टाना भगत समुदाय मुर्गी पालन से भी बचते हैं। इस हाल में शाकाहारी होने का जो गुमान हमारे बड़े बुजुर्ग रखते हैं वह आने वाली पीढ़ी के बीच खतरे में दिखई दे रही है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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