तमिलनाडु के छोटे गांव में डॉ. दंपती ने एक ऐसा अस्पताल बनाया है, जो कई मायनों में अनूठा है। यहां सिर्फ बीमारी का इलाज ही नहीं किया जाता है, बल्कि उसकी रोकथाम पर विशेष जोर दिया जाता है। इसके साथ ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कोशिशें की जा रही हैं। जैविक खेती से लेकर हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया जाता है। यह अस्पताल धर्मपुरी जिले के सित्तिलिंगी गांव में है।
इसकी शुरुआत करने वाले डॉ. रेगी बतलाते हैं कि करीब तीन दशक पहले यहां शिशु और मातृ मृत्यु दर अधिक थी, क्योंकि 50 किलोमीटर तक कोई अस्पताल नहीं था और न ही अच्छी सड़कें थीं। साल 1993 के आसपास डॉ. रेगी और उनकी पत्नी डॉ. ललिता ने यहां आकर एक छोटा क्लिनिक शुरू किया। तीन साल बाद 10 बिस्तर का अस्पताल बना। साल 1996 में ‘ट्राइबल हेल्थ इनिशिएटिव’ की शुरुआत कर आदिवासी लड़कियों व महिलाओं को स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण दिया गया। ये प्रशिक्षित कार्यकर्ता बीमारी की जांच, सामान्य इलाज, मरीजों की देखभाल करती हैं। साथ ही, प्रसव पूर्व जांच करती हैं। इस प्रकार एक समूह महिला सहायिकाओं का है। इनका काम गर्भवती महिलाओं व बच्चों को क्लिनिक में सहयोग करना तथा पोषण, स्वच्छता और साधारण बीमारियों की जानकारी देना है। डॉ. रेगी बतलाते हैं कि वर्तमान में यह 35 बिस्तरों का अस्पताल है, जहां न्यूनतम खर्च पर सर्जिकल, मेडिकल और प्रसूति सेवाएं मिलती हैं।
यहां आधुनिक ऑपरेशन थिएटर, लैब, जेनेरिक फार्मेसी, एक्स-रे और एंबुलेंस जैसी सुविधाएं हैं। सौर ऊर्जा से मोटर पंप व स्ट्रीट लाइटें चलती हैं। अस्पताल की टीम महीने में एक बार सभी 25 गांवों का दौरा कर स्वास्थ्य शिक्षा, प्रसव पूर्व जांच और पांच वर्ष से कम के बच्चों को क्लीनिक सुविधा देती है। साथ ही, टीम सित्तिलिंगी घाटी के 14 स्कूलों में जाकर छात्रों को स्वास्थ्य शिक्षा देती है। अब ‘सित्तिलिंगी वेली ऑर्गेनिक फार्मर एसोसिएशन’ के तहत कई किसान जुड़ चुके हैं। कुल मिलाकर, तीन दशक से चल रही पहल का सकारात्मक असर दिख रहा है। सुविधायुक्त अस्पताल, जैविक खेती, जैव उत्पादों का प्रसंस्करण व हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया जा रहा है। गरीब आदिवासियों का कम कीमत पर अच्छा इलाज किया जाता है। आमदनी बढ़ाने के लिए महिला स्वयं सहायता समूहों के साथ मिलकर काम किया जा रहा है। यह पहल महत्वपूर्ण है, जो सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है।