कोरोना संकट ने भारत के वर्ग विभाजन को बेनकाब कर दिया है, इसने हमारे कल्याणकारी राज्य होने के दावे के बुनियाद पर निर्णायक चोट की है।
लॉकडाउन लगाए जाने के बाद जिस तरह से लाखों की संख्या में मजदूर और कामगार अपने गांंवो की तरफ रिवर्स पलायन पर निकल पड़े उसकी मिसाल आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास में देखने को नहीं मिलती है। यह एक ऐसा वर्ग है जिसपर लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार पड़ी है वे अपने देश में ही प्रवासी करार दिए गए।
एक ऐसे समय में जब सबसे ज्यादा मदद की जरूरत थी तो उन्हें पूरी तरह से लावारिस छोड़ दिया गया जबकि इस देश के चुनावी राजनीति को चलाने वाले वही सबसे बड़े ईधन हैं। इस दौरान केंद्र और राज्य सरकारों का रवैया ऐसा रहा मानोंं इनका कोई वजूद ही ना हो। जब वे भूखे, प्यासे, बदहवासी के आलम में सैकड़ों, हजारों किलोमीटर की यात्रा पर पैदल ही निकल पड़े तब भी इस व्यवस्था का दिल नहीं पसीजा और उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज करते उनके हाल पर छोड़ दिया गया।
लॉकडाउन के दौरान शहरों में रोजगार पूरी तरह से ठप हो जाने के बाद मजदूरों को अपना गांंव दिखाई पड़ा था, जहां से वे शहर की तरफ पलायन करके आए थे ताकि वे अपने और अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी का इंतजाम कर सकें और अब जब हम लॉकडाउन से अनलॉक की तरफ बढ़ रहे हैं तो एकबार फिर वे रोजगार की तलाश में उसी शहर की तरफ निकलने लगे हैं।
बीते कुछ दशकों के दौरान भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। इस दौरान गांव में सीमित रोजगार, खेती के लगातार बिगड़ते हालात और शहरों में बढ़ते काम के अवसरों के कारण एक बड़ी आबादी शहरों की तरफ भागने को मजबूर हुई है। इनमें बड़ी संख्या छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों की है।
ये वे लोग हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में भी हाशिए पर थे और शहरों में भी परिधि पर रहते हैं जिसे हम स्लम या झुग्गी बस्ती कहते हैं। शहरों के चमक-दमक के बीच इन बस्तियों में जीवन जीने के लिए सबसे बुनियादी जरूरतों का अभाव होता है। हालांकि यहां बसने वाली आबादी शहर की रीढ़ होती है जो अपने श्रम से शहर की अर्थव्यवस्था में बहुमूल्य योगदान देती है।
ये श्रम शक्ति असंगठित औद्याेेगिक श्रमिकों के अलावा निर्माण श्रमिक, छोटे दुकानदार, सब्जी-खाने का सामान बेचने वाले, अखबार बेचने वाले, धोबी, फेरी वाले, सफाई करने वाले, घरेलू कामगार इत्यादि जैसे काम करती है जिन्हें असंगठित क्षेत्र में गिना जाता है। नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण के तहत 'विकास' का जो मॉडल अपनाया गया है उसकी परिधि से यह बड़ी आबादी बाहर है।
उदारीकरण का असली लाभ कुछ लोगों को ही मिला है जबकि असंगठित का एक बड़ा हिस्सा जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी बेहतर जिंदगी जीने के लिए न्यूनतम सुविधाएं से भी दूर है। उनके बच्चों को न तो बेहतर शिक्षा मिल पाती है और न ही काम के बेहतर अवसर। ऑक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक असमानता की खाई इस कदर चौड़ी हो गई है कि देश के मात्र 57 अरबपतियों की संपत्ति देश के आर्थिक पायदान पर नीचे की 70 प्रतिशत आबादी की कुल संपत्ति के बराबर है।