अमीरात ने तो हिंदी को अपनी तीसरी भाषा का सम्मान दे दिया।
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भारत का यह रौद्र रूप तो उसने अड़तालीस,पैंसठ ,इकहत्तर और निन्यानवे में भी नहीं देखा था। हर बार उसने हिन्दुस्तान की सदाशयता का ग़लत फायदा उठाया। जब जब भारत ने इस नक़ली मुल्क़ को सबक़ सिखाना चाहा ,अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में मौजूद पाकिस्तान के कुछ शुभचिंतक आड़े आ गए। इस बार ऐसा नहीं हुआ। एक तरफ़ पश्चिमी देशों ने दूरी बनाई तो यूरोप से भी पाकिस्तान को समर्थन नहीं मिला। और तो और उसके अपने ही किनारा कर गए। सऊदी अरब ,संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका से लेकर चीन तक ने उससे मुंह मोड़ लिया।
आबूधाबी में इस्लामिक सहयोग संगठन के विदेश मंत्री सम्मेलन से ठीक पहले अमीरात ने तो हिंदी को अपनी तीसरी भाषा का सम्मान दे दिया। इसके बाद इस सम्मेलन में उसने पहली बार हिन्दुस्तान को गेस्ट ऑफ ऑनर के तौर पर बाक़ायदा न्योता भेजा। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इस दो दिनी सम्मेलन में भारत का पक्ष मज़बूती से रखा। पाकिस्तान को जाहिर है कि ये रास नहीं आया। उसने खूब आंखें तरेरीं,फिर सम्मेलन के बहिष्कार की धमकी दी। आखिर सम्मेलन में उसकी कुर्सी खाली पड़ी रही।
पाकिस्तान लगातार कश्मीर के बहाने हिन्दुस्तान की इस संगठन में सदस्यता का विरोध करता रहा है।
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दरअसल, पाकिस्तान लगातार कश्मीर के बहाने हिन्दुस्तान की इस संगठन में सदस्यता का विरोध करता रहा है। भारत संसार की कुल मुस्लिम आबादी का तीसरा बड़ा देश है और उसके आने से 57 सदस्यों वाले इस संघ में पाकिस्तान का वर्चस्व समाप्त होगा। अभी तक वह इस मंच का दुरुपयोग भारत की आलोचना के लिए करता रहा है।
पाकिस्तान से उठा मुस्लिम विश्व का भरोसा
जनरल याह्या ख़ान की बायकॉट धमकी के मद्देनज़र भारत के प्रतिनिधिमंडल को 1969 में इस संगठन के पहले स्थापना सम्मेलन से बैरंग लौटना पड़ा था। इस प्रतिनिधिमंडल की अगुआई फ़ख़रुद्दीन अली अहमद कर रहे थे। इसके बाद 1990 में सऊदी अरब, 2002 में क़तर, 2006 में फिर सऊदी अरब और पिछले बरस टर्की और बांग्लादेश ने फिर भारत को शामिल करने का समर्थन किया था।अतीत में सऊदी अरब और टर्की जैसे देश पाकिस्तान के दबाव में भारत से दूरी बनाते रहे हैं। इस बार पाकिस्तान की पोल खुल गई है। मुस्लिम विश्व अब उसका भरोसा नहीं कर रहा है।
इससे पहले विदेशमंत्री सुषमा स्वराज चीन में रूस चीन और भारत की त्रिपक्षीय बैठक में इन दोनों देशों को पाकिस्तान के आतंक समर्थक रवैये की निंदा करने के लिए सहमत कर चुकी हैं। पाकिस्तान के लिए चीन का भारत के साथ आना एक बड़ा झटका है। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में भी आतंकवाद विरोधी प्रस्ताव पर उसके दस्तख़त पाकिस्तान के होश उड़ाने वाले हैं। चीन के सामने भी पाकिस्तान की कलई खुल चुकी है। इसे यूं भी कह सकते हैं कि मालदीव ,मलेशिया और लंका से लगातार झटकों ने चीन को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार के लिए बाध्य कर दिया है। क्या हिन्दुस्तान के लिए इन परदेसी हवाओं में कोई सुगंध आप महसूस कर रहे हैं ?
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