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बॉलीवुड और सुशांत सिंह राजपूत : सिनेमाई नेपोटिज्म पर बेमतलब बवाल

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कंगना रनौत, सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : Social Media
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बीते चौदह जून को बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद से सिनेमा जगत से लेकर सामान्य जन तक हलचल मची हुई है। इस प्रतिभावान युवा अभिनेता के इस तरह चले जाने ने लोगों को झकझोर के रख दिया है।

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एक 35 साल के संभावनाओं से भरे युवा का यह मार्ग चुनना किसी भी सहृदय व्यक्ति को निश्चित रूप से विचलित और व्यथित करेगा, सो इस हलचल में कुछ विचित्र नहीं है। परन्तु, इस आत्महत्या को लेकर जिस तरह के कारण गढ़े जा रहे और उन कारणों के जरिये जो विमर्श खड़ा किया जा रहा, उसका कोई आधार और औचित्य समझ में नहीं आता। 

भारतीय सिनेमा, विशेषकर बॉलीवुड, में भाई-भतीजावाद यानी कि नेपोटिज्म की बहस नई नहीं है, परन्तु सुशांत की आत्महत्या के संदर्भ में इन दिनों इसका एक तीव्र और तीखा उभार देखने को मिल रहा है। न केवल सामान्य जन अपितु सियासत और सिनेमा जगत के अनेक नाम भी इस विमर्श में कूद पड़े हैं और इसे अपने-अपने हिसाब से दिशा देने में लगे हैं।
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इस विमर्श को खड़ा करने वालों का मूल स्वर यही है कि नेपोटिज्म के कारण सिनेमा जगत में सुशांत के लिए कठिनाइयांं खड़ी की गईं और इसी कारण वे अपनी जान देने को विवश हुए। 

दरअसल, भारत भावुकताओं का देश है और निश्चित रूप से भावुक होना कोई बुराई नहीं है, परन्तु, जब भावुकता का आवेग इतना बढ़ जाता है कि वो बुद्धि और विवेक के दायरे से भी बाहर निकल जाए तो समस्या पैदा होने लगती है। इस मामले में सामान्य लोगों के साथ यही हो रहा है। सुशांत की आत्महत्या से आहत हुए जनसामान्य द्वारा, इधर-उधर से मिली सूचनाओं के आधार पर, जिन लोगों और बातों को उसके लिए दोषी माना जा रहा है, उसमें बहुत हद तक भावुकता ही कारण है।

संभवतः भावुकता के इस आवेग में ही बिहार की एक कोर्ट में सलमान खान, करण जौहर, संजय लीला भंसाली और एकता कपूर सहित आठ लोगों के खिलाफ एक वकील साहब ने केस कर दिया है। उनका कहना है कि इन लोगों ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं जिसके कारण सुशांत को आत्महत्या करनी पड़ी। उनकी इस बात का आधार क्या है, ये वही जानते होंगे। खैर। 
 

सुशांत सिंह राजपूत ने हुनर के बूते अपनी जगह बनाई। - फोटो : Social Media
इससे अलग सिनेमा जगत से जो लोग इस विषय में लगे हैं, उनके साथ भी अपने-अपने मामले दिखते हैं। कंगना रानावत, जिनका अबतक का सिनेमाई सफर काम से अधिक विवादों में गुजरा है, सुशांत की आत्महत्या को लेकर एकबार फिर बॉलीवुड के प्रति आक्रामक हैं।

कंगना की प्रतिभा पर कोई संदेह नहीं, परंतु अक्सर ऐसा लगता है कि अपेक्षित सफलता न मिलने से उनमें कहीं न कहीं फिल्म जगत के प्रति एक किस्म की कुंठा भर गयी है, जिसे वे जब-तब और जिस-तिस बहाने व्यक्त करती रहती हैं। सुशांत के बहाने भी नेपोटिज्म का विमर्श खड़ा कर वे शायद अपने उसी कुंठा को व्यक्त कर रही हैं। 

एक वीडियो में वे कुछ अखबारी खबरें सुना रही हैं, जिनमें सुशांत को लेकर अनाप-शनाप बातें लिखी हैं। उनका कहना है कि सुशांत को मानसिक रूप से तोड़ने के लिए ये सब सुनियोजित रूप से किया गया था।

मीडिया में फ़िल्मी हस्तियों को लेकर आए दिन तमाम अनुमान आधारित और कई बार बहुत अनुचित बातें भी होती रहती हैं, जिसे अनदेखा कर वे आगे बढ़ जाते हैं। कभी-कभी आपत्ति भी जता देते हैं। फिर सुशांत के साथ ऐसा होने में साज़िश देखना समझ से परे है। कंगना के अलावा शेखर कपूर, रवीना टंडन जैसे नाम भी मुखर रूप से सुशांत की आत्महत्या के लिए बॉलीवुड पर निशाना साध रहे हैं। 

कहा जा रहा कि सुशांत को छः-सात फ़िल्में मिली थीं, जो कि एक-एक कर उनके हाथ से छिनती गईं। कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने भी इस बात का उल्लेख किया है। इस बात की चर्चा हर तरफ हो रही, लेकिन यह कोई नहीं बता रहा कि वो कौन-सी फ़िल्में थीं, कब मिलीं और कैसे चली गयीं? क्या इन फिल्मों को लेकर हुए अनुबंधों का किसीके पास कोई लिखित प्रमाण भी है? ऐसा कोई प्रमाण इत्यादि कहीं नहीं दिख रहा, बस बातें ही हो रही हैं।

फिर भी एकबार के लिए हम मान लेते हैं कि ये फ़िल्में सुशांत को मिली होंगीं लेकिन मिलने के बाद उनके छिन जाने की वजह तो सुशांत ही जानते होंगे, लेकिन उन्होंने अपने जीते-जी इस सब के बारे में कभी कहीं कुछ नहीं कहा और अब वे रहे नहीं, फिर इसके आधार पर दूसरों पर सवाल उठाने का क्या मतलब है? एक और बात कि किसे, किसको काम देना है या नहीं देना है, ये अधिकार काम देने वाले का होता है। सो काम न मिलने के कारण यदि कोई आत्महत्या कर ले तो इसके लिए काम न देने वाले को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अब आते हैं नेपोटिज्म के विमर्श पर तो इसमें तीन प्रकार की बातें हैं। पहली चीज ये कि, बॉलीवुड में सुशांत के संदर्भ में ‘इनसाइडर बनाम आउटसाइडर’ की चर्चा हो रही है। कहा जा रहा कि सुशांत बाहरी थे, इसलिए उनके साथ भेदभाव किया गया। यह भी कि बॉलीवुड में ‘स्टार किड्स’ को ही उभरने का मौका मिल सकता है, बाहरियों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं।

इस तरह की बातें कहने वाले शायद भूल जाते हैं कि दिलीप कुमार, राजकुमार, राजेश खन्ना, धर्मेन्द्र, महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर आज शाहरुख़ खान, अक्षय कुमार, रणवीर सिंह, आयुष्मान खुराना आदि सब बाहरी ही रहे हैं। जिस नेपोटिज्म की आज बात हो रही, वो इन लोगों के समय में भी रहा है, लेकिन तब भी इंडस्ट्री में इन्होंने अपनी मेहनत, अपने हुनर और अपनी हिम्मत से अपना मुकाम बनाया। सुशांत की आत्महत्या पर फिजूल का शोर मचाने वाले धुरंधर बताएं कि इन सबके मामले में ‘इनसाइडर बनाम आउटसाइडर’ की थ्योरी ने काम क्यों नहीं किया? 

दूसरी बात यह कही जा रही कि ‘स्टार किड्स’ को अभिनय नहीं आता, लेकिन परिवार के नाम पर उन्हें अवसर मिल जाते हैं। यह तर्क देने वालों की समझ और याद्दाश्त दोनों पर तरस आता है। ऐसा कहने वाले भूल जाते हैं कि यदि फिल्म जगत से जुड़े लोगों के बच्चों को अवसर न दिया जाता तो आज बॉलीवुड के पास राज कपूर, ऋषि कपूर, शशि कपूर, अनिल कपूर से लेकर आमिर खान, अजय देवगन, सनी देओल, संजय दत्त, सलमान खान, ऋतिक रोशन, रणबीर कपूर जैसा कोई नाम नहीं होता। क्या इन सितारों के बिना बॉलीवुड की पहचान वैसी ही होती जैसी आज है?

तीसरी बात, यदि केवल इस आधार पर कि कोई अभिनेता-अभिनेत्री ‘स्टार किड’ हैं, कुछ लोगों की संतुष्टि मात्र के लिए, उन्हें अवसर न दिया जाए तो क्या ये उनके साथ अन्याय नहीं होगा? किसीकी भी योग्यता का पता तो उसे योग्यता सिद्ध करने का अवसर देने के बाद ही चल सकता है। तिसपर सिनेमा तो ऐसा क्षेत्र है, जहां कैमरे के सामने जाने के बाद आप कपूर के बच्चे हों या कन्नू पनवाड़ी के, कोई फर्क नहीं पड़ता। उसवक्त आपके साथ केवल आपकी कला रह जाती है, बाकी सब पहचान गौण हो जाती है। यदि आपकी कला में सामर्थ्य है, तो वो अवश्य अपना स्थान बना लेगी अन्यथा कोई कितना भी यत्न कर ले, कुछ नहीं हो सकता। 

यदि बड़े कलाकारों के लिए अपने बच्चों को स्थापित कर देना इतना ही आसान होता तो आज अरमान कोहली से लेकर अभिषेक बच्चन, अर्जुन कपूर और तुषार कपूर तक सब सुपरस्टार होते। अरमान कोहली के पिता तो उन्हें स्टार बनाने के चक्कर में बर्बाद ही हो गए, लेकिन तब भी अरमान का कुछ न हो सका। अमिताभ बच्चन स्वीकार भले न करें, पर यह सब समझते हैं कि उन्होंने अभिषेक को सुपरस्टार बनाने के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन अभिषेक एक औसत अभिनेता से अधिक कोई और पहचान नहीं बना पाए। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। 

अंततः बात यह है कि किसी बड़े अभिनेता का बेटा/बेटी होना कोई अपराध नहीं है कि इस आधार पर किसीको खारिज कर दिया जाए। अंदर वाले हों या बाहर वाले, अवसर सबको मिलना चाहिए और ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट है कि मिलता भी है। बात बस इतनी है कि किसीको अवसर जरा आसानी से मिल जाता है, तो किसी को थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है। 

जहां तक सुशांत की बात है, तो उन्हें टीवी के जरिये अवसर मिला था और यह अवसर भी उन्हें एक ‘स्टार किड’ यानी कि एकता कपूर ने ही दिया था जहां से उनकी पहचान बनी और वे सिनेमा आए। सिनेमा में अपनी प्रतिभा के बलबूते उन्होंने अच्छी जगह बना ली थी। परन्तु, आज जो विमर्श चल रहा उस संदर्भ में प्रश्न यह है कि क्या उन्होंने सिने जगत में इतना समय बिता लिया था, जिसके आधार पर यह तय किया जाए कि उन्हें उनकी योग्यता के अनुरूप पहचान और महत्व मिला या नहीं। 

गौर करें तो बड़े परदे पर उनके करियर को केवल सात साल ही गुजरे थे, जिसमें अपनी पहली फिल्म के लिए ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ डेब्यू का फिल्मफेयर में नामित हुए थे। तो वहीं धोनी की बायोपिक के लिए वे फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में नामित हुए थे। इस सात साल के करियर में ही उन्होंने यशराज और धर्मा जैसे बड़े बैनरों के तहत फ़िल्में भी कर ली थीं। 

सात साल के लिहाज से ये उपलब्धियां इतनी कम भी नहीं हैं कि यह कहा जाए कि सुशांत के साथ बॉलीवुड में अन्याय हुआ। हो सकता है कि मौजूदा वक्त उनके करियर के लिए ठीक न रहा हो, लेकिन ये उतार-चढ़ाव तो हर कलाकार के साथ होते हैं। 

सन दो हजार का दशक अमिताभ बच्चन के लिए बहुत अच्छा नहीं रहा था। फ़िल्में चल नहीं रही थीं, एबीसीएल का विवाद अलग हो गया था। वो संघर्ष का दौर था, मगर उसे झेलते हुए अमिताभ ने केबीसी के जरिये नयी पारी शुरू की और अपनी किस्मत का सितारा बदल लिया। आज बॉलीवुड के सबसे सफल सुपरस्टार बन चुके अक्षय कुमार खुद बता चुके हैं कि एक समय में उनकी चौदह फ़िल्में लगातार फ्लॉप हुई थीं, मगर वे तब भी जीवन से निराश नहीं हुए थे। 
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सुशांत सिंह राजपूत: संघर्ष के बाद सफलता मिली। - फोटो : Social Media
पंद्रहवीं फिल्म चल गई और वहां से अक्षय बढ़ते गए। बॉलीवुड के एक और बड़े सुपरस्टार अजय देवगन ‘राजू चाचा’ के फ्लॉप होने के बाद भारी आर्थिक नुकसान के कारण परेशानी में आ गए थे और उसके बाद कुछ फ़िल्में भी ख़ास नहीं चलीं, लेकिन उनकी हिम्मत है कि संघर्ष करते रहे और अपना मुकाम बनाया। करण जौहर जिनपर आज सबसे ज्यादा निशाना साधा जा रहा है, उनके पिता बड़े प्रोड्यूसर अवश्य थे, लेकिन सच्चाई यही है कि सिवाय ‘दोस्ताना’ के वे कोई और बड़ी हिट फिल्म नहीं दे पाए। फ्लॉप फ़िल्में कई दीं। 

अमिताभ वाली ‘अग्निपथ’ को लेकर  करण जौहर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि हिट की शेखी बघारने के बावजूद अग्निपथ फ्लॉप रही और इसका नुकसान पूरा करने के लिए उनके माता-पिता को करण की नानी का घर बेचना पड़ा था। करण ने अपनी योग्यता से और मेहनत से बर्बाद हो रहे ‘धर्मा प्रोडक्शन’ को आज बॉलीवुड का बड़ा प्रोडक्शन हाउस बनाया है।

कहने का अर्थ है कि कम या ज्यादा, हताशा और विफलता सबके हिस्से आते हैं, पर यह आपके हुनर और हिम्मत पर निर्भर करता है कि तब आप संघर्ष चुनते हैं या कोई और रास्ता।

बहरहाल, सुशांत ने आत्महत्या क्यों की, इस प्रश्न का सही उत्तर उनके साथ ही जा चुका है, सो उनके लिए तो बस मन से एक टीस, एक कराह ही निकल सकती है। परन्तु, यह लेख फिल्म जगत के उन लोगों के प्रश्नों का उत्तर है, जो जीते जी सुशांत का हाल न पूछ सके, पर उनके जाने के बाद आज उनके हिमायती बनकर उनकी आत्महत्या को ‘हत्या’ बताते हुए व्यर्थ विवाद पैदा करने में ही अपना पुरुषार्थ समझ रहे हैं। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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