सुशांत सिंह राजपूत मेरी आने वाली किताब का हिस्सा नहींं थे क्योंकि मेरा उनसे कभी वास्ता नहींं पड़ा। लेकिन फ़िल्म उद्योग की कार्यशैली पर मुझे विस्तार से लिखना ही था। अब वही कार्यशैली सुशांत के माध्यम से आप लोगों के समक्ष है।
सुशांत सिंह राजपूत को पता होता कि उनके जाने के बाद सोशल मीडिया पर इतना बवाल होगा और देश मे उनके इतने चाहने वाले हैंं तो अपनी जान कतई नहींं लेते। वैसे मेरा रिश्ता फ़िल्म उद्योग से, जिसे आसान भाषा में सब बॉलीवुड कहते हैंं पिछले 25 साल से है। 20 साल सक्रिय और 5 साल बतौर दर्शक।
सुशांत सिंह के जाने के बाद उनके इतने हितैषी मिलेंगे मुझे उम्मीद नहीं थी, जनता-जनार्दन का तो समझ आता है। एक युवा आकर्षक सफल अभिनेता के अचानक चले जाने का वास्तव में आघात लगा था। मुझे भी लगा। कभी उनके साथ काम नहींं किया था, हांं उनकी फिल्में देखी थी। प्रतिभाशाली थे, लगा था चलो नई पौध में एक सितारा यह भी होगा।
लेकिन मैं विचलित हुआ जब फ़िल्म नगरी के कुंठित हताश, निराश लोगोंं ने सुशांत के अशरीरी कंधे पर बंदूक रखकर चलाना शुरू किया। मैं फिर भी देखता रहा, पढ़ता रहा और समझने की कोशिश करता रहा की इस सफल लड़के ने खुदकुशी क्यों की होगी!
जितना पढ़ा, देखा, लोगोंं का ज्ञान समझने की कोशिश की, नहींं समझ आया दिमाग का दही हो गया। किताबें लिखने के कारण गोवा रहता हूंं तो मुम्बई मीडिया की खबरें नहींं मिल पाती हैंं। ओल्ड स्कूल होने के कारण अभी भी कागज वाला अख़बार ही पढ़ने की आदत है। डिजिटल के माध्यम से खबरों की खुशबू नहींं आती।
लेकिन मुम्बई मिड-डे को डिजिटल मीडिया पर खोल ही लिया और मुझे बहुत हद तक सुशांत की हताशा समझ आ गई। हालांकि वो इतनी गहरी नहींं है कि कोई खुदकुशी कर ले, लेकिन अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की समझ तो हो ही जाती है।
सुशांत ने जिन फ़िल्मों में काम करने का सपना देखा था वो तो बननी ही नहींं थी। लेकिन यह समझ भी आया यह लड़का अलग तरह की फिल्में करना चाहता था। इसलिए वो ऐसे फ़िल्म निर्देशकोंं के जाल में फंस गया। मैं समझ सकता हूंं की सुशांत फ़िल्मों की दुनिया के लिए कम अनुभवी थे।
मुझे नहींं पता उनके इर्द-गिर्द कौन लोग थे, लेकिन जो भी थे वो काबिल नहींं थे यह पक्का है। हमारी फ़िल्म नगरी की सबसे बड़ी समस्या, यस मैन और यस वुमन की है। वो सितारों को यह नहींं बताते उनके लिए सही क्या गलत क्या है। उन्हें लगता है हमने यस सर नहीं कहा तो नौकरी भी जा सकती है। उनके इर्द-गिर्द जो समझदार लोग थे, उन्होंने सुशांत को सही सलाह दी होती तो उन्हें बचाया जा सकता था। आइए अब उन फिल्मों पर नज़र डालते हैंं जो वो कर रहे थे।
पहली फ़िल्म का नाम है "चंदा मामा दूर के"। निर्देशक हैैं संजय पूरन सिंह चौहान। साल 2010 में लाहौर फ़िल्म आई थी, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। अच्छी फिल्म थी। जितनी बड़ी फिल्म थी उतनी ही सफलता उसे मिली थी। इस निर्देशक की पीआर समझ इतनी जबरदस्त है वो ऐसी घोषणा करते हैंं की कोई न कोई मुख्य मीडिया उनको बड़े-बड़े हेेडिंग के साथ छाप ही देता है।