आयोजन में उपस्थित श्रोतागण
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इस आयोजन में चार चांद लगाए 76 साल से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय और 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में जेल यात्रा कर चुके 92 साल के आनंद मोहन माथुर ने। उन्होंने मुल्क़ की आज़ादी में सभी धर्मों के लोगों के योगदान को सराहा, लेकिन आज के दौर में इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश करने के घातक परिणामों से आगाह किया।
दैनिक पत्रिका के संपादक अमित मंडलोई ने लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर संसद के लिए सभी दलों की भूमिका के महत्व को प्रतिपादित किया। एबीपी न्यूज़ चैनल के मध्यप्रदेश प्रमुख और अख़बार की दुनिया में मेरे सहयोगी रहे पत्रकार बृजेश राजपूत ने मध्यप्रदेश के हालिया चुनाव में राजनीतिक दलों की असलियत बताई और नेताओं की साख़ के संकट का विश्लेषण किया।
मेरी राय में हर चुनाव के बाद भारतीय लोकतंत्र की चिंता कुछ और बड़ा आकार ले लेती है। पॉलिटिकल पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी,नए किस्म के सामंतवाद का उदय,जनाधार वाले नेताओं की घटती संख्या,नई पीढ़ी के राजनेताओं का प्रदूषित प्रशिक्षण ,नोटा का दुरुपयोग और शब्द मर्यादा का बिखरना भी मेरी दृष्टि में डराने वाली तस्वीर पेश करता है।
सेवा सुरभि के भाई संजय पटेल, ओम प्रकाश जी,प्रेसक्लब के अध्यक्ष अरविंद तिवारी और नवनीत शुक्ला ने भी अपने विचार रखे। पुराने मित्र ,अनिल त्रिवेदी,अतुल लागू,शशीन्द्र जलधारी, कीर्तिराणा,मधुकरजी और मेरी कटी उँगलियों की माइक्रो सर्जरी करके दोबारा काम लायक बनाने वाले डॉक्टर शैलेश गुप्ता तथा उद्योगपति और सेवा सुरभि के प्रमुख स्तंभ ओमप्रकाश जी से मिलना हर बार की तरह सुखद रहा।