EWS आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
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इस बारे में सरकारी पक्ष का कहना है कि नए प्रावधान से सुप्रीम कोर्ट द्वारा लागू आरक्षण की पचास फीसदी की सीमा का कहीं से उल्लंघन नहीं हुआ है, क्योंकि यह वास्तव में कोटे के भीतर कोटा ही है। यह दस प्रतिशत आरक्षण अनारक्षित वर्ग (जिसमें हिंदुओं की अगड़ी जातियां व गैर हिंदू धर्मावलंबी शामिल हैं) के बाकी पचास फीसदी कोटे में से ही दिया गया है।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
बेशक, इससे समाज के सामान्य वर्ग के उस गरीब तबके को राहत मिली है, जो केवल गरीब होने के कारण अपने ही वर्ग के सम्पन्न तबके से प्रतिस्पर्द्धा में पिछड़ रहा था। भाजपा और एनडीए में शामिल दलों ने इसे अपनी जीत बताया है। भाजपा को इसका कुछ लाभ आगामी चुनावों में हो सकता है, हालांकि ज्यादातर राज्यों में अगड़ी जातियां भाजपा समर्थक ही हैं।
इस मामले में कांग्रेस का रवैया थोड़ा ढुलमुल दिखा। उसने एक तरफ अगड़ों को आर्थिक आरक्षण का समर्थन यह कहकर किया कि संसद में उनकी पार्टी ने संविधान संशोधन के पक्ष में वोट दिया था तो दूसरी तरफ अपने ही एक दलित नेता उदित राज से इसका यह कहकर विरोध करा दिया कि यह संशोधन आरक्षण की सीमा लांघता है और यह भी कि न्यायपालिका की मानसिकता ही मनुवादी है। हालांकि कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने स्पष्ट कहा कि उनकी पार्टी शीर्ष अदालत के फैसले का स्वागत करती है।
उन्होंने कहा कि यह संविधान संशोधन 2005-06 में डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा सिन्हा आयोग के गठन से शुरू की गई प्रक्रिया का ही नतीजा है। सिन्हा आयोग ने जुलाई 2010 में अपनी रिपोर्ट दी थी। केवल तमिलनाडु की सत्तारूढ़ डीएमके के मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन ने फैसले का यहकर विरोध किया कि इससे लंबे समय से जारी ‘सामाजिक न्याय के संघर्ष को झटका’ लगा है।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने फैसले का स्वागत करते हुए देश में जातीय जनगणना की मांग दोहराई। जाहिर है कि अधिकांश दल राजनीतिक कारणों से फैसले का खुलकर विरोध नहीं कर रहे हैं, क्योंकि अगड़ों के वोट सभी को चाहिए।
खिंच गई हैं भविष्य की राजनीतिक रेखाएं
बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने भविष्य की राजनीतिक रेखाएं भी खींच दी हैं। अनारक्षित वर्ग को आर्थिक आरक्षण की वैधता ने आने वाले समय में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग में भी इसे लागू करने की मांग की नींव रख दी है ( ओबीसी वर्ग में तो वैसे भी क्रीमी लेयर का नियम लागू है) क्योंकि आरक्षित वर्गों में भी विभिन्न जातियों के बीच आरक्षण का लाभ उठाने को लेकर प्रतिस्पर्द्धा तेज हो गई है। (भारत में करीब 3 जातियां और 25 हजार उप जातियां हैं)।
यह भी बात जोरों से उठ रही है कि जब एक परिवार का तीन पीढि़यों से आरक्षण का लाभ लेते हुए आर्थिक-सामाजिक उत्थान हो गया फिर उन्हें आरक्षण क्यों मिलते रहना चाहिए तथा देश में सामाजिक और आर्थिक समता का सर्वमान्य पैमाना क्या है, क्या होना चाहिए?
विभिन्न जातियों और समाजों में आरक्षण का लाभ उठाकर पनप और प्रभावी हो रहे नए किस्म के ब्राह्मणवाद को अभी से नियंत्रित करना कितना जरूरी है? और यह कैसे होगा? वोट आधारित राजनीति इसे कितना होने देगी?
जाहिर है कि बदलते सामाजिक समीकरणो के चलते यह मांग आरक्षित वर्गों में से ही उठ सकती है। यानी सामाजिक न्याय का संघर्ष एक नए दौर में प्रवेश कर सकता है। ये बदले सामाजिक समीकरण ही राजनीति की चाल भी बदलेंगे और राजनीति के साथ व्यवस्था भी बदलेगी। क्षीण रूप में इसकी आहट सुनाई भी देने लगी है।
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