क्या नेपाल में एक बार फिर राजशाही की वापसी का कोई रास्ता खुल सकता है?
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मई में कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहते हुए ओली ने नवंबर में चुनाव का ऐलान करवा दिया था। जबकि नेपाली कांग्रेस ने ओली के विश्वासमत हारने के बाद शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व में सरकार बनाने का दावा करने की कवायद शुरु कर दी थी। 232 सांसदों में से 149 का समर्थन हासिल भी कर लिया था और समर्थन की चिट्ठी राष्ट्रपति को सौंप दी थी, फिर भी राष्ट्रपति भंडारी ने नवंबर में चुनाव का ऐलान करवा दिया और किसी को भी बहुमत न होने की बात कहकर चुनाव तक ओली को कार्यवाहक पीएम बने रहने का मौका दे दिया।
इस फैसले के खिलाफ 146 सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और आखिरकार 12 जुलाई को ये फैसला आ गया कि दो दिन के भीतर देउबा को पीएम की कुर्सी सौंप दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने देउबा के साथ 149 सांसदों के समर्थन की चिट्ठी का हवाला दिया और उन्हें एक महीने के भीतर सदन में विश्वासमत हासिल करने को कहा।
अब क्या होगा और नेपाल में?
इस सियासी उलटफेर के बीच एक सवाल प्रमुखता से सामने आया है कि क्या नेपाल में एक बार फिर राजशाही की वापसी का कोई रास्ता खुल सकता है? नेपाली कांग्रेस के खिलाफ कम्युनिस्टों का विरोध और वैचारिक टकराव कोई नया नहीं है। साथ ही राजशाही के खिलाफ संघर्ष में जिस तरह माओवादियों और कम्युनिस्टों ने वहां लंबा आंदोलन चलाया उसके निशाने पर कहीं न कहीं नेपाली कांग्रेस भी रही थी। अब नई परिस्थितियों में नेपाली कांग्रेस को नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी सेंटर) का समर्थन प्राप्त है।
माओवादी सेंटर के मुखिया पुष्प कमल दहल (जिन्होंने अब अपना प्रचलित नाम प्रचंड लिखना बंद कर दिया है) अब नेपाली कांग्रेस को समर्थन देने को मजबूर हो गए हैं। सीपीएन-यूएमएल और माओवादी सेंटर का जब करीब तीन साल पहले विलय हुआ था तो कम्युनिस्टों के बीच एक नई उम्मीद जगी थी, लेकिन दो साल में ही ये उम्मीद धराशाई हो गई और ओली और प्रचंड के बीच मतभेद गहराने लगे।
ओली के मनमाने फैसलों और पार्टी को भी भरोसे में न लेने की वजह से आखिरकार फिर से ये एकता खत्म हो गई। पार्टी फिर टूटी और दोनों नेता अपने अपने पूर्व प्रचलित नामों के साथ अलग हो गए।
नेपाल की सुप्रीम कोर्ट का यह बड़ा फैसला है।
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क्या होगा भारत पर असर?
अगर भारत के संदर्भ में देखें तो ओली ने जिस तरह भारत के साथ रिश्तों के बीच खटास पैदा की और कई विवादित मुद्दों पर टकराव की स्थिति पैदा की, उससे कई बार ये भी साफ हुआ कि वो सीधे-सीधे चीन के इशारों पर काम कर रहे हैं। ओली को बचाने की चीन ने भी अपने स्तर पर कई कोशिशें कीं। पहले प्रचंड और ओली में सुलह कराने की कोशिश, फिर राष्ट्रपति के साथ चीनी प्रतिनिधियों की बैठकें।
ये भी गौरतलब है कि जब से कम्युनिस्टों की ये सरकार नेपाल में बनीं और इसके मतभेद सामने आने लगे तब से राजशाही की वापसी के लिए देश भर में आंदोलन भी तेज हुए। ये साबित करने की लगातार कोशिशें की गईं कि इससे तो बेहतर राजशाही थी और राजा के रहने से कम से कम सियासत और कुर्सी की इतनी घटिया तस्वीर तो सामने नहीं आती थी और कम से कम नेपाली जनता को इस तरह नजरअंदाज तो नहीं किया जाता था। इस सोच को आगे बढ़ाते हुए राजशाही समर्थक गुट फिर से मजबूत होने लगे।
जाहिर है अब नई परिस्थितियों में शेर बहादुर देउबा के सामने बड़ी चुनौतियां होंगी। सबको साथ लेकर चलने की चुनौती, सबसे पहले सदन का आधिकारिक तौर पर भरोसा जीतने की चुनौती, माओवादियों के समर्थन की शर्तों को पूरा करने की चुनौती और साथ ही राजशाही समर्थकों को भी अपने साथ जोड़ने की चुनौती।
बेशक ओली गुट भी अभी उनके लिए एक बड़ी चुनौती है, साथ ही राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी का रुख भी अहम मायने रखेगा जो लगातार ओली को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाती नजर आती रही हैं। पिछली बार भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी उसे न मानने की रणनीतिक और तथाकथित संवैधानिक चालबाजियां और अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के दबाव में देउबा की ताजपोशी की मजबूरी। जाहिर है देउबा की राह आसान नहीं है।