आखिर इंसानी जान की कीमत आवारा कुत्ते की जान से ज्यादा है
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कोर्ट ने यह भी कहा था कि अधिकारियों को ऐसे परिसरों से मौजूद आवारा कुत्तों को हटाकर उनकी नसबंदी करानी होगी। इसके बाद उन्हें डॉग शेल्टर में भेजना होगा। हालांकि तब इस फैसले की व्यावहारिकता पर सवाल उठे थे और कुत्तों के साथ इस तरह के व्यवहार को अमानवीय ( या अश्वाननीय ?) कहा गया था। इसके खिलाफ एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया द्वारा जारी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं कोर्ट में दायर हुई थीं, उन्हें भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। यानी कोर्ट ने अपने पुराने फैसलो को वापस लेने से इंकार कर दिया। कुत्तों के प्रति लाख सहानुभूति के बाद भी कड़वी सच्चाई यही है कि आज आवारा कुत्ते बच्चों और बुजुर्गो के लिए मौत का परवाना बन गए हैं। यद्यपि कोर्ट के इस आदेश पर सख्ती से पालन पर अभी भी प्रश्न चिन्ह है। बावजूद इसके कि कोर्ट ने माना कि आवारा कुत्तों के काटने से लोगों की जान जाने की समस्या बेहद गंभीर रूप ले चुकी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सुरक्षित व्यवस्था बनाने में नाकाम अफसरों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई भी की जा सकती है।
इसमें दो राय नहीं कि कुत्तों को भी जीने का और पूरी गरिमा के साथ जीने का हक है। मूक प्राणियों के प्रति संवेदना मानवीय गुण है। लेकिन असल सवाल यह है कि कुत्ता अगर श्वान न रहकर सचमुच कुत्ता हो जाए तो मनुष्य को क्या करना चाहिए? क्या वह अपनी जान गंवाने का जोखिम उठाता रहे और कुत्तों की जान बख्शता रहे? जो लोग इस फैसले का विरोध कर रहे हैं, वो कुत्तों के मानवाधिकार को मानवीय गरिमा की रक्षा के साथ जोड़कर देख रहे हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस जाले को यह कहकर साफ किया है कि गरिमा के साथ जीने के अधिकार में यह अधिकार भी शामिल है कि व्यक्ति कुत्तों के हमलों के डर के बिना स्वतंत्र रूप से जीवन जी सके। लिहाजा राज्य मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकता। अदालत भी उन कठोर जमीनी हकीकतों से आंखें नहीं मूंद सकती, जहां बच्चे, विदेशी यात्री और बुज़ुर्ग कुत्तों के काटने की घटनाओं का शिकार हुए हैं। संविधान ऐसे समाज की कल्पना नहीं करता, जहां बच्चों और बुज़ुर्गों का जीवन केवल शारीरिक ताकत या किस्मत के भरोसे हो।
जाहिर है कि यह फैसला पशु संवेदना के खिलाफ नहीं है। केवल आवारा, हिंसक और पागल हो चुके कुत्तों को लेकर है। आवारा कुत्तों का हर संभव इलाज किया जाए, उन्हें खाना खिलाया जाए, उन्हें आवारा बनने और इंसान पर हमला करने से रोका जाए इत्यादि बातें सैद्धांतिक तौर पर रंजक और आदर्शवादी लगती हैं। लेकिन जरा उन परिवारों के दुख पर भी निगाह डालिए, जिन्होंने आवारा कुत्त के काटे जाने के बाद अपने किसी परिजन को खोया है। इनमें कई तो ऐसे फूल हैं, जो खिलने के पहले ही मुरझा गए और कई ऐसे हैं, जिन्होंने ऐन जवानी अथवा बुढ़ापे में असमय अपने प्राण गवां दिए हैं। और यह कोई पशुप्रेम की राह में दी गई शहादत नहीं है बल्कि आवारा कुत्तों को दी गई विवशताजनित अबाध छूट अथवा कुत्तों को मानव से भी ज्यादा जरूरी प्राणी मान लेने के दुराग्रह का नतीजा है।
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