दिल्ली समेत कई इलाकों में एयरक्वालिटी इंडेक्स 400 के स्तर को पार कर गया है जो खतरनाक है।
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आर्थिक संकट में फंसे किसानों की मजबूरी है पराली जलाना
धान की कटाई के बाद खेतों में बचे पराली को जलाना किसानों की मजबूरी है, क्योंकि पराली के खेतों में ही प्रबंधित कर गेहूं लगाने की प्रक्रिया पर किसानों को प्रति एकड़ 5 हजार रुपये का खर्च तय है। किसानों का तर्क है कि या तो इस खर्च को सरकार उठाए या प्रति क्विंटल 200 रुपए का बोनस दे, क्योंकि भारी कर्ज में डूबे किसान इस पराली प्रबंधन का अतिरिक्त खर्च उठाने में समर्थ नहीं है। दिलचस्प बात है कि सरकार खुद पराली प्रबंधन को बेहतर करने के लिए तैयार नहीं है।
कृषि क्षेत्र को लंबे समय से कवर करने वाले विशेषज्ञ पत्रकार हमीर सिंह के अनुसार एनजीटी का आदेश है कि सीमांत किसानों को मुफ्त में पराली प्रबंधन से संबंधित मशीनरी दी जाए। वहीं पांच एक़ड़ तक के मालिक को 5 हजार रुपये में मशीनरी उपलब्ध करवाई जाए। अगर सरकार एनजीटी के आदेश को लागू कर देती है तो काफी हद तक पराली जलाने की घटना कम हो जाएगी।
हमीर सिंह के अनुसार पराली मैनेजमेंट की मशीनों को चलाने के लिए 60 हार्स पावर का ट्रैक्टर चाहिए। हर किसान की बस की बात नही है कि 12 लाख रुपये का ट्रैक्टर सिर्फ पराली मैनेजमेंट के लिए ले। वैसे में सरकार ही इस खर्च का वहन करे तो तभी पराली जलाने की घटना बंद होगी। हमीर सिंह के अनुसार पंजाब सरकार ने केंद्र से पराली प्रबंधन के लिए प्रति क्विंटल 100 रुपये के बोनस की मांग की है।
हमीर सिंह के अनुसार एक एकड़ में 25 क्विंटल औसत धान का उत्पादन होता है। अगर प्रति क्विंटल 200 रुपए का बोनस मिल जाए तो किसानों को 5 हजार रुपये मिल जाएंगे और वे पराली प्रबंधन को बेहतर तरीके से कर लेंगे।
दिलचस्प बात यह है कि पंजाब सरकार पराली मैनेजमेंट के विज्ञापन पर 18 करोड़ रुपए खर्च कर रही है, जिसका कोई परिणाम नहीं निकलेगा। अगर इस पैसे की मशीनें खरीदी जाती और किसानों को दी जाती तो शायद कुछ परिणाम आते।
पराली के प्रबंधन से संबंधित मशीनों को लेकर भी पंजाब में अब विवाद उठ रहा है।
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पराली प्रबंधन की मशीनें सब्सिडी के बाद भी किसानों की खरीद शक्ति से बाहर
धान की खेती को हतोत्साहित करने में विफल रही पंजाब सरकार पराली जलाने की घटना को कम करने के लिए स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम, हैप्पी सीडर, पैडी स्ट्रा चॉपर, हाइड्रोलिक रिवर्सवल माउल्ड बोर्ड आदि मशीनों का खेतों में प्रयोग पर जोर दे रही है।
इन मशीनों से पराली को जलाए बिना खेतों को अगली बुआई के लिए तैयार कर लिया जाता है। ये मशीनें कई कंपनियां बना रही है। पंजाब सरकार इनकी खरीद पर किसानों को सब्सिडी दे रही है। लेकिन इसके भी अच्छे परिणाम नहीं निकले है। पंजाब सरकार ने इस साल 28 हजार एग्रो मशीनों को सब्सिडी रेट पर देने का फैसला किया गया। राज्य सरकार ने इसके लिए 278 करोड़ रुपये का बजट भी रखा। किसानों को इन मशीनों पर 50 प्रतिशत की सब्सिडी दी जा रही है।
कृषि संबंधित सोसायटियों को 80 प्रतिशत की सब्सिडी दी जा रही है। सरकार ने दावा किया था कि सब्सिडी के लिए राज्य सरकार के पास 12 हजार आवेदन आए। इसके बावजूद राज्य में पराली जलाने की घटना कम नहीं हुई है। हालात ज्यों के त्यों रहे।
दरअसल, पराली के प्रबंधन से संबंधित मशीनों को लेकर भी पंजाब में अब विवाद उठ रहा है। किसान संगठनों का दावा है कि सब्सिडी रेट पर जो मशीन किसान को राज्य सरकार उपलब्ध करवा रही है, उससे सस्ती दर पर मशीनें बाजार में उपलब्ध है।
किसानों का आरोप है कि सब्सिडी की रकम में खेल हो रहा है। मशीन बनाने वाली कंपनियां और अधिकारी इस रकम में घालमेल कर रही हैं। किसान संगठनों का तर्क है कि सब्सिडी रेट वाली हैप्पी सीडर मशीन का रेट 1 लाख 50 हजार रुपए तय किया गया है। सब्सिडी के साथ किसानों को यह 75 हजार रुपए में मिल रहा है। जबकि खुले बाजार में कई कंपनियां हैप्पी सीडर 60 हजार रुपए में बेच रही है। सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि 60 हजार वाला हैप्पी सीडर घटिया क्वालिटी की है। सरकार जो मशीन सब्सिडी पर उपलब्ध करवा रही है उसकी क्वालिटी काफी अच्छी है।
खराब होते वातावरण के बीच पंजाब का पठानकोट जिले ने अच्छा संदेश दिया है।
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वोट बैंक की पॉलिटिक्स
किसान पहले से ही संकट में है। पंजाब में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं काफी बढ़ी है। कर्ज में डूबे किसानों की नाराजगी सरकार इस समय काफी बढ़ी है। कर्ज के बोझ तले दबे किसानों को फसलों की उचित कीमत भी नहीं मिल रही है। इससे भी किसान नाराज हैं।
वैसे में राजनीतिक दल या सरकार किसानों से ज्यादा टकराव नहीं चाहती है। अगर पराली को जलाने के बजाए खेत में ही इसका दूसरा प्रबंधन किसान करेगा तो किसानों को प्रति एकड़ 5 हजार रुपये तक खर्च आएगा।
किसानों की आर्थिक हालात काफी खराब है। वैसे में किसान पराली के बेहतर प्रबंधन का खर्च खुद कैसे वहन करेंगे, यह सवाल राजनीतिक दलों, नेताओं और नौकरशाही के सामने है। दूसरी तरफ राजनेताओं के वोट बैंक की पॉलिटिक्स और अधिकारियों के भ्रष्टाचार ने भी संकट को बढ़ाया है।
दरअसल, पंजाब और हरियाणा में धान के पराली जलाने की घटना आज नई नहीं है। पिछले कई सालों से यह हो रहा है। सरकारें तमाम दावे करती हैं कि पराली जलाने की घटना में कमी आई है, जबकि आंकड़े तमाम सरकार के दावों के खिलाफ है। सच्चाई तो यह है कि जमीन पर सरकारों ने पराली जलाने की प्रक्रिया को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है, क्योंकि दोनों राज्य की बड़ी आबादी किसानी पर निर्भर है और किसानों को कोई नाराज नहीं करना चाहता है।
जाहिर है कृषि इन दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था में अच्छा योगदान देती, इसलिए नेता अपने वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहते हैं। हरियाणा में हाल ही चुनाव संपन्न हुए हैं। चुनाव संपन्न से पहले खेतों में ही पराली जलाने के कई मामले सामने आए। लेकिन चुनाव के कारण सरकार चुप रही।
पंजाब में हालात ज्यादा नाजुक
पंजाब में तो हालात बहुत ही नाजुक है। पंजाब और केंद्र के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े के अनुसार एक दिन में ही 3000 से ज्यादा पराली जलाने की घटना रिकॉर्ड किया जा रहा है। 23 सितंबर से 30 अक्तूबर तक राज्य में 19,869 पराली जलाने की घटना सामने आई है। जबकि हरियाणा में 4211 जगहों पर पराली जलाई गई।
पंजाब में 27 से 30 अक्तूबर तक पराली जलाए जाने के कारण पूरे उतर भारत की एयर क्वालिटी इंडेक्स खराब हो गया। पंजाब में चार दिनों 7842 पराली जलाने की घटना सामने आई। 30 अक्तूबर को राज्य के संगरूर, भटिंडा, अमृतसर, फिरोजपुर में पराली जलाने की सबसे ज्यादा घटना रिकॉर्ड की गई। इस दिन संगरूर में 550, भटिंडा में 343 और फिरोजपुर में 328 मामले सामने आए।
हालांकि खराब होते वातावरण के बीच पंजाब का पठानकोट जिले ने अच्छा संदेश दिया है। जिले के किसानों ने अपने बेहतर प्रबंधन से बताया है कि पराली जलाने की घटना कम ही नहीं खत्म की जा सकती है।
पठानकोट जिले में अबतक पराली जलाने के मात्र 2 मामले रिकॉर्ड किए गए हैं, जबकि जिले में 27,500 हेक्टेयर जमीन में धान की खेती की गई है। यहां के किसानों ने सफलतापूर्वक पराली को बेचा। कई किसानों ने अपने 10 से 12 एकड़ जमीन की पराली को बेच 30 से 40 हजार रुपये तक कमाए।
स्थानीय किसानों के अनुसार अगर कंबाइन से काटी गई धान के पराली पर प्रति एकड़ 1500 से 1800 रुपये प्राप्त हुए। वहीं मजदूरों दवारा हाथ से काटे गए धान के पराली पर 4000 रुपये प्रति एकड़ उन्हें मिला। हाथ से काटे गए पराली को डेरी मालिकों ने खासा पसंद किया है। वे अपने जानवरों को पराली चारे के तौर पर खिलाते है।
लॉन्ग टर्म प्लानिंग की जरूरत
अगर पूरे उतर भारत को ठंड के मौसम में एयर क्वालिटी इंडेक्स को बेहतर रखना है तो इसके लिए लंबे समय की योजना बनानी होगी। पंजाब और हरियाणा की जमीन धान की खेती के लिए अब उपयुक्त नहीं है। क्योंकि इससे जहां भारी जल संकट पैदा हो गया है, वहीं प्रदूषण भी बढ़ा है।
दरअसल, हरियाणा तो पहले ही जल संकट से जूझ रहा है। वहीं पंजाब के कई जिले भूजल के मामले में डार्क जोन में आ गए हैं। हालात काफी नाजुक हैं। इन दोनों राज्यों में एक किलो चावल के उत्पादन के लिए 5 हजार लीटर पानी का इस्तेमाल कर रहे है।
गौरतलब है कि पंजाब धान की खेती राज्य के जरूरतों को पूरा करने के लिए नहीं करता है, क्योंकि यहां के खान पान में चावल की जगह रोटी मुख्य भोजन है।
पराली से प्रदूषण दिल्ली के साथ पंजाब, हरियाणा के शहरों में भी बढ़ा है।
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पंजाब और हरियाणा की बासमती निर्यात होती है, जबकि धान की दूसरी किस्में दूसरे राज्यों में भेजा जाता है। स्थानीय वैज्ञानिकों का तर्क है कि लोभ में किसान पंजाब के भविष्य को खत्म कर रहे है। एक तरफ भूजल का संकट पैदा हो गया है, वहीं दूसरी तरफ धान की पराली जलाने से एयरक्वालिटी इंडेक्स बहुत ही खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।
हालांकि दोनों राज्य पिछले कई सालों से कृषि विविधिकरण की योजना चला रहे हैं, लेकिन इसमें कोई खास सफलता नहीं मिली है। हरियाणा ने तो इस साल मक्का, दलहन की खेती के रकबे को बढ़ाने के लिए किसानों को खरीद की गारंटी के साथ प्रति एकड़ कुछ पैसे देने की योजना भी बनाई है। लेकिन इसके भी उत्साहजनक परिणाम नहीं आए।
धान की खेती से बेहतर आय
पंजाब और हरियाणा के किसानों का तर्क है धान की खेती से अच्छी आय होती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पंजाब और हरियाणा में मंडियों में धान बिक जाता है। बाकी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य फिक्स हो जाने के बाद भी मंडियों में नहीं बिक पाते।
न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी कम कीमत पर बिकते हैं। वैसे में किसानों को आय के लिए धान की खेती मजबूरी है। एक हेक्टेयर धान की खेती से जो आय किसानों को मिल रही है, उतना आय मक्का, बाजरा और दलहन की खेती से नहीं मिल रही है। पंजाब में राज्य सरकार धान की खेती के रकबे को कम करने के लिए काफी प्रयास कर रही है, लेकिन परिणाम अच्छे नहीं आए है।
इस साल भी पंजाब में 28 लाख हेक्टेयर जमीन में धान की खेती हुई है। वहीं हरियाणा में इस साल 10 लाख हेक्टेयर जमीन में धान की बुआई हुई। धान की बुआई का रकबा ज्यादा होना, धान का परंपरागत तरीके से कटाई न होना ये दो मुख्य कारण है,जिससे भविष्य में भी अक्तूबर, नवंबर और दिसंबर के माह में लोगों को प्रदूषण का संकट झेलना ही होगा।
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