भास्कर ने अपने चित्रों में पहाड़ के जीवन को बखूबी उकेरा है
- फोटो : Bhaskar
भास्कर उत्तराखंड के बागेश्वर से 44 किमी दूर नाकुरी पट्टी स्थित कुरोली गांव के रहने वाले हैं। वह कहते हैं, मेरी स्कूल से लेकर कॉलेज तक की जर्नी बहुत अच्छी नहीं रही। अस्त-व्यस्तता बनी रही, बहुत से स्कूल बदलते रहे। गांव से शहर फिर वहां से हॉस्टल, फिर अकेले रहना पड़ा। अब ये सारी चीजें मुझमें ढल गई हैं। वह कहते हैं, ‘कविता खुद ही निकल जाती है कभी- कभार। तुकबंदी ईजा से ही सीखी।
बचपन में ईजा से ही सीखा और सुना। ईजा बचपन में मुझे कई मार्मिक चीजें सुनाती, तो बहुत ही जोड़ की शैली में बोलती, जो रोचक होने के साथ ही बेहद प्रभावी भी होती थी। ईजा पहली पंक्ति में पहाड़ से संबंधित संज्ञा और फिर तुकबंदी में अपनी बात कहती। बचपन से ही ईजा और कैंजा लोगों से ये ही बात सुनते हुए बड़ा हुआ हूं। गांव और मेलों की चौपालों पर लगने वाले सामूहिक गीत भी मुझे अंदर तक हमेशा प्रभावित करते हैं । मैं बहुत ही उत्सुत रहता हूं इन चीजों को सुनने के लिए । थोड़ा बहुत लिख लेता हूं, गा लेता हूं , जो चीज चित्रो में रह जाती है, वो दूसरे माध्यम से निकलना चाहती हैं।’
भास्कर ने अपने कई चित्रों में पलायन के दर्द को भी बखूबी उकेरा है। मैंने जब भास्कर से उसके बचपन के बारे में पूछा तो उसका कहना था, ‘बचपन बहुत सुंदर बीता पर.. हम कफ्फू तिमिल के पेड़ पर झूलते थे , और कभी- कभी घर के अंदर भराण पर रस्सी डालकर खेलते .. एक बार रस्सी टूटी और नीचे चूल्हे में झोली और छछिया के झोल में जा पड़े.. इसके बाद घर वालों की खूब गाली सुनाई और पीटा। एकबार तो मैं घर से भागकर गांव के भूमिया देवता के थान के भीतर जा छिपा। इसके बाद भयंकर बवाल मचा और कुटाई सो हुई वो तो हुई ही, साथ में भिभूत लगाना पड़ा और झाड़ फूंक अलग से हुई। स्कूल में भी बड़ा उद्दंड रहा। बच्चों से झगड़ना आम बात रही।
भास्कर अभी पढ़ाई कर ही रहे हैं और अपनी चित्रकारी को और तराश रहे हैं। भास्कर कहते हैं, मैं एक लोहार से भी प्रेरित होता हूं। लकड़ी का काम करने वाले बारुड़ि से भी बहुत हिम्मत मिलती है । ईजा से बहुत कुछ सीखता हूं।
भास्कर कहते हैं, पिता मुझे एक अधिकारी, डॉक्टर और इंजीनियर बनाने का ख्वाब देख रहे थे और मैं मन के भीतर कागज पर चित्रकारी उकेर रहा था। एक दिन मैंने पिता के सामने अपने मन की बात रखी और उनको अपने बनाए चित्र दिखाए, वो हैरान रह गए और इसके बाद उन्होंने मेरा दाखिला फाइन आर्ट में करवाया।
भास्कर कहते हैं, मेरा सपना पहाड़ में ही रहकर लोक संस्कृति के रंग को और गहरा करना है। उनके पिता सेना से रिटायर हैं और भास्कर की प्रतिभा और अखबारों में नाम छपने के बाद बेटे के हाथों को कैनवास पर चलते हुए टुकटुकी लगाकर देखते हैं।
पहाड़ी जनजीवन और प्रकृति के सुंदर रूप को उकेरती भास्कर की दो कविताएं:
(1)
ऐगो बसन्त डाना धारों में ,
डार डार पॉली ऐगे !
सुघड़ ब्यौली जै सजी यो धरती ,
सुरमयी रंग बिछैगे !
भोर फजल में गीलो पटाँगण,
घुगति घिनोड़ि बासिगे !
जथ देखूं तथ प्यौंली फुलिछन ,
पिंगैई रंग में फुलीगे !
(2)
बैसाखा को म्हैना लायो,
ग्यों जौऊ की बारा लो !
सर - सरी बयौ बगैंनी,
काम धाणीं की मारा लो !!
रत्तब्यांणें की बेला मजी,
झट् खुलिंनी आँखि लो!
चा कितैली चुलूं मां धरी,
भबरांणी छौ आग लो !!
ठंडू माठू छू हाव् चलैणी,
पंछी बिजी घोल लो !
खुली गैनीं कपाट गोठ,
गोरु भैंसी रम्मांण लो !!
धारा पन्यारों भीड़ जुटी,
दीदी भुल्यों की सैर लो !
ताम् गगैरी कांख दबै,
बाटों मां चैल- पैल लो !!
रात ब्याई अर सूर्ज चढ़ी,
भुर - भूरु उज्याउ लो !
लाई की भुजी,मडुवै रव्टी,
बांधी कल्यो अर पांणी लो,
पैटी गैनी स्यारों मजी,
बौ - ब्वारियों की टोली लो !!
मीठी मीठी बथ लगौनीं,
छुंण्कयोंनी दथुली लो !
कमर बांधी ज्योड़ी भुल्यों,
छटकोंनी धमेली लो !
पौंछी गिन ग्योंवाड़ मजी,
ग्यों स्यारा पैंनाणां लो !!
क्वे दीदी छन ग्यों काटैणी,
क्वे पूवा बांधैणी लो !
क्वे भुली छन भारी लगौणी,
क्वे दाथी पल्यौंणी लो !!
नई ब्वारी छन घात सारैंणी,
सासु जी की मौज लो !
घर मां बैठी बैठी फूकैंणी,
ह्वका तमांखू आग लो !!
ब्याल पड़ीगे स्यारों मां,
अब सूर्ज चढ़ी धार लो !
सर सरी बयाउ बगैणी,
काम धाणी की मार लो !!
"हिट दीदी आब भोल काटूलों,
ताल स्यारों का धाण लो !
घर जै औंला, पटै बिसौंला,
गोरु होला रम्मांण लो !!"
बैसाखा को म्हैना लायो,
ग्यों जौऊ की बारा लो !
सर - सरी बयौ बगैंनी,
काम धाणीं की मारा लो !!
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