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स्टैच्यू ऑफ यूनिटी: सरदार पटेल को समर्पित, किसानों और राष्ट्र की भागीदारी से बनता भारत का विराट प्रतीक

Sat, 01 Nov 2025 07:38 AM IST
शुभम कुमार अमर उजाला नेटवर्क

सार

सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती पर स्टैच्यू ऑफ यूनिटी सिर्फ दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा नहीं, बल्कि भारतीय एकता का प्रतीक है। अक्तूबर 2010 में, गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा विचार साझा किया जिसका उद्देश्य राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोना था। इस महाकाव्य निर्माण में देशभर के गांवों, किसानों और नागरिकों ने हिस्सा लिया। किसानों ने अपने पुराने हल, दरांती समेत औजार दान किए, 135 टन से अधिक लोहा इकट्ठा हुआ, जिससे यह स्मारक राष्ट्रीय भावना का साक्षात रूप बन गया।
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स्टैच्यू ऑफ यूनिटी - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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सरदार वल्लभभाई पटेल को समर्पित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी सिर्फ दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा नहीं, बल्कि यह भारतीय एकता के एक विराट जन-आंदोलन का परिणाम है। यह राष्ट्र के संकल्प का एक महाकाव्य है। इस प्रतिष्ठित स्मारक के पीछे देश के गांव-गांव की भागीदारी और लौह पुरुष सरदार पटेल के प्रति अटूट श्रद्धा की कहानी निहित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया हैंडल मोदी आर्काइव ने सरदार पटेल की 150वीं जयंती पर इस स्मारक के मूर्त रूप  लेने की दास्तां को साझाकिया है।

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2010 में बतौर सीएम नरेंद्र मोदी का एक विचार जिसने देश को जोड़ा अक्तूबर 2010 में, गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा विचार साझा किया जिसका उद्देश्य राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोना था। उनका सपना था कि भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के सम्मान में विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा का निर्माण। यह विचार केवल मूर्ति की विशालता तक सीमित नहीं था, यह भारत की एकता, उसके लोगों की शक्ति और देश को एक करने वाले महान नेता की विरासत का उत्सव था। सीएम मोदी ने तब कहा था, सरदार पटेल की प्रतिमा उन लोगों को याद दिलाएगी जो भारत के अस्तित्व पर सवाल उठाते हैं कि यह राष्ट्र शाश्वत था, है, और रहेगा।

लौह संग्रह अभियान और किसानों का योगदान
2013 में, नरेंद्र मोदी ने हर किसान से इस राष्ट्रीय श्रद्धांजलि में भाग लेने का आग्रह करते हुए कहा, सरदार पटेल लौह पुरुष थे, और मैं आपके गांवों से लोहे के टुकड़े चाहता हूं। हमें किसानों के इस्तेमाल किए गए औजार चाहिए... क्योंकि  सरदार पटेल एक किसान के बेटे थे। पूरे भारत के लाखों किसानों ने अपने —हल, दरांती और अन्य उपकरण—दान किए। 135 टन से अधिक लोहा इकट्ठा किया गया, जिसने इस स्मारक के लिए राष्ट्रीय भावना की नींव रखी।
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मिट्टी और पानी से बनी एकता की दीवार
आंदोलन में सिर्फ लोहा ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने से पवित्र मिट्टी और पानी भी जुटाया गया। स्कूली बच्चों ने अपनी शालाओं से मिट्टी दी, जबकि अमृतसर के स्वर्ण मंदिर, पुरी के जगन्नाथ मंदिर और सबरीमला जैसे तीर्थस्थलों से मिट्टी और जल एकत्र किया गया। इस पवित्र मिट्टी का उपयोग एकता की दीवार बनाने में किया, जिसने प्रतिमा को राष्ट्रीय एकता और भारत की विविध विरासत का आध्यात्मिक आयाम दिया।

इंजीनियरिंग का चमत्कार
31 अक्तूबर 2013 को सरदार पटेल की जयंती पर इस प्रतिमा की नींव रखी गई। 182 मीटर की ऊंचाई के साथ, यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है। इसका निर्माण 18,500 टन प्रबलित स्टील, 6,500 टन संरचनात्मक स्टील और 2,10,000 क्यूबिक मीटर कंक्रीट के साथ एक विशाल इंजीनियरिंग उपलब्धि थी। इसे भूकंपीय क्षेत्र-3 में भी बाहरी सहारे के बिना खड़ा रहने के लिए डिजाइन किया गया, जो विश्व में अपनी तरह का पहला था।

31 अक्तूबर 2018 को शुरू हुआ समर्पण व एकता का पर्व
31 अक्तूबर 2018 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का उद्घाटन किया, तो वे भावुक हो गए। देश के लोगों से एकत्रित किए गए लोहे का एक हिस्सा थामे उन्होंने कहा, आप सभी से यह लोहा प्राप्त करके मैं बहुत अभिभूत हूं। यह सिर्फ धातु नहीं है, यह एकता की शक्ति में विश्वास रखने वाले हर भारतीय की ताकत है।

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