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Srilanka Crisis: श्रीलंका के संकट से दूसरे मुल्कों को सीखने की जरूरत, फिलहाल इस देश को मदद की दरकार

सार

श्रीलंका में जनाक्रोश की प्रमुख वजह है, देश के स्तर पर आर्थिक बदहाली। भूख, यातायात के साधनों की भारी किल्लत और पाई-पाई के लिए तरसता खजाना।
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श्रीलंका में जनाक्रोश की भड़की आग - फोटो : ANI
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विस्तार
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श्रीलंका में जनद्रोह की आग भड़क उठी है जो बुझाए नहीं बुझ रही है और वहां के राष्ट्रपति फरार हैं। राष्ट्रपति भवन पर भारी संख्या में उमड़ आए जन-सैलाब का कब्जा है। प्रधानमंत्री आवास को जलाकर राख कर दिया गया है। हालांकि वे अपने पद से पहले ही इस्तीफा दे चुके थे। जनता का गुस्सा अपनी सभी सीमाएं लांघ चुका है। श्रीलंका के इतिहास की  यह अभूतपूर्व घटना है।

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जनाक्रोश की प्रमुख वजह है, देश के स्तर पर आर्थिक बदहाली। भूख, यातायात के साधनों की भारी किल्लत और पाई-पाई के लिए तरसता खजाना। जन विरोध की लपटें कई महीनों से सुलग रही थीं, जो पिछले हफ्ते बेकाबू विद्रोह में भड़क उठी। देश विभिन्न विदेशी स्रोतों से इतना कर्ज खा चुका है कि मूलधन तो छोड़िए, वह उस ब्याज तक को चुकाने में असमर्थ है। श्रीलंका ने ऐसी फजीहत पहले कभी नहीं देखी।

राष्ट्रपति गोताबाया के आवास पर अब जनसैलाब का कब्जा है। वहां के बिस्तरों से लेकर फर्श तक पर लोग मनमौजी तरीके से कूद रहे हैं । कुछ परिवार तो वहां पिकनिक भी मना रहे हैं। प्रधानमंत्री आवास को तो धू- धू कर जला दिया गया है। श्रीलंका क्या, विश्व में भी कहीं ऐसे विद्रोह की लपटें शायद ही देखने को मिली हों।
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श्रीलंका की कर्जदारी इतनी अधिक बढ़ गई है कि संकट के इस मुकाम पर कोई भी देश या संस्था मदद का हाथ बढ़ाने से कतरा रहे हैं। हालांकि चंद देशों ने स्थिति में सुधार आने पर मदद का वायदा किया है, लेकिन वह तो भविष्य के लिए एक आश्वासन  भर है। फौरी तौर पर यह बात भी दूर की कौड़ी ही लगती है।

हालात बद से बदतर होने का एक कारण यह भी है कि श्रीलंका ने विदेशों से, खास तौर पर चीन से इतना अधिक कर्ज ले रखा है कि श्रीलंका विदेशी हाथों में गिरवी रखी संपत्ति जैसे देश की हैसियत में आ गया है। इतना अधिक कि वह इस कर्ज पर लगने वाले ब्याज की अदायगी करने तक में असमर्थ है।

2017 में कुल विदेशी कर्ज 55 अरब डालर तक पहुंच चुका था। भारत ने इस साल श्रीलंका को 3.8 बिलियन डालर की मदद दी। राजपक्षे ने अपनी अकूत कमाई के लिए देश को विदेशी हाथों में, खास तौर पर चीन के हाथों गिरवी रख दिया, ऐसा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक कह रहे हैं।

भारत एक पड़ोसी देश के तौर पर आसान शर्तों पर श्रीलंका को मदद देता रहा है, लेकिन चीन ने यहां भी रणनीतिक हितों की दृष्टि से बाजी मार ली है। मरता क्या नहीं करता। श्रीलंका के  हुक्मरान अब भागे-भागे फिर रहे हैं  और जनता बेहिसाब परेशानियों से जूझ रही है।

क्या हम सबक सीखने को तैयार हैं?

श्रीलंका के हालात से कम से कम विकासमान देश यह सबक तो ले ही सकते हैं कि अंधाधुंध विकास के हाथों राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता को दांव पर नहीं लगाया जाना चाहिए। श्रीलंका की इस उथल-पुथल का भारत पर असर पड़ना स्वाभाविक है। प्रश्न यही है कि क्या हम सबक सीखने को तैयार हैं? 

रहा सवाल विपक्षी दलों का, तो उनमें भी आवश्यक एकजुटता दिखाई नहीं पड़ती। प्रधानमंत्री रणिल विक्रमसिंघे ने इसी संभावना के बीच इस्तीफा दिया कि राजनीतिक दल मिल-जुलकर नई सरकार बना लेंगे। लेकिन वह भी फिलहाल हवा में  झूलती उम्मीद ही है। अभी तो यह भी निश्चित नहीं है कि राष्ट्रपति घोषणा के मुताबिक कमान छोडे़ंगे कि नहीं? सारी संभावनाए अभी अगर-मगर के जाल में उलझी हुई हैं।

सदन की अध्यक्षता कौन कर पायेगा, यह सहमति-असहमति भी अभी संवैधानिक दांव-पेंच में उलझी हुई है। कहने का अर्थ यह कि जैसे हालात हैं ऐसे में श्रीलंका दीर्घकाल तक अस्थिरता से बाहर नहीं निकल पाएगा।

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श्रीलंका में बढ़ता जनता का आक्रोश - फोटो : ANI
मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री का संदेश गौरतलब

इस बारे में मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री 97 साल के मोहातिर मोहम्मद ने एक बहुत ही पते की बात कही-
विकासशील मुल्कों को विदेश से मिलने वाली मदद से सावधान रहना चाहिए। दरअसल ये देश और कमाई का जुआ खेलते हैं। उन्होंने इस बारे में नब्बे के दशक का हवाला दिया और सतर्क किया है कि आज भी उसी तरह की दशा है। विकासमान देशों की अर्थव्यवस्था फिर चरमरा सकती है।

गौरतलब है कि नब्बे के दशक के आर्थिक संकट से उबरने के लिए लोहे के चने चबाने पड़े थे।

श्रीलंका की स्थिति ने दरअसल पूरे दक्षिण एशिया को भंवर में फंसा दिया है। उधर पाकिस्तान भी इसी तरह की आर्थिक परेशानी में उलझा पड़ा है। भारत एक बड़ा देश भले ही है, लेकिन आर्थिक देनदारी का बोझ उस पर भी कम नहीं है। श्रीलंका के ताजा हालातों ने विदेशों से आने वाली धनराशि के नतीजे कैसा गुल खिला सकते हैं, इस ओर भी ध्यान देने को मजबूर कर दिया है।

श्रीलंका के वर्तमान संकट का कोई फौरी समाधान तो दिख नहीं रहा है। यह एक लम्बी लड़ाई की ओर संकेत करती है। मौका है कि अगल-बगल के छोटे बड़े देश सबक लें। पर अभी तो श्रीलंका को इस अभूतपूर्व संकट से बाहर निकालने के लिए एकजुट होना ज्यादा जरूरी है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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