भारतीय लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव की निष्पक्षता की पहली शर्त है। इसलिए मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कोई असाधारण राजनीतिक कार्रवाई नहीं, अपितु चुनाव प्रक्रिया को दुरुस्त रखने का जरूरी अभ्यास है। इसके बावजूद, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने इस प्रक्रिया को लेकर ऐसा राजनीतिक अभियान छेड़ रखा है, मानो देश में पहली बार मतदाता सूची की जांच हो रही हो। दिल्ली में विपक्ष की रैली, चुनाव आयोग के खिलाफ आरोप और सुप्रीम कोर्ट में याचिका के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जिन मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटे जाने का दावा किया जा रहा है, उनकी वास्तविक समस्याओं को लेकर विपक्ष ने जमीन पर कितना काम किया है?
दरअसल, विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर के नाम पर बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। कांग्रेस ने इसे वोट चोरी का नाम दिया है और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गई है। एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडी गठबंधन की रैली इसी अभियान का हिस्सा थी। रैली से पहले आयोजकों ने दस लाख लोगों के जुटने का दावा किया था, जबकि दिल्ली पुलिस ने लगभग 50 हजार लोगों की संभावित उपस्थिति का अनुमान लगाया।
रैली के बाद भीड़ को लेकर राजनीतिक दलों ने अपने-अपने दावे किए, लेकिन दस लाख की अपेक्षा और पुलिस के अनुमान के बीच का अंतर विपक्ष के राजनीतिक अभियान की चर्चा का विषय जरूर बना। सवाल यह है कि क्या इस मुद्दे को देशव्यापी जनआंदोलन बनाने का विपक्ष का दावा आम मतदाता के बीच वैसा प्रभाव पैदा कर पाया, जैसा वह चाहता था?
विपक्ष को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसके पास पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जाने के कितने प्रमाणित मामले हैं। कितने लोगों ने शिकायत की, कितनों की सुनवाई हुई और कितने नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल कराए गए? यदि किसी नागरिक का मताधिकार छीना गया है तो उसकी लड़ाई पूरी ताकत से लड़ी जानी चाहिए, लेकिन केवल राजनीतिक मंचों से लोकतंत्र खतरे में होने की घोषणा करने से किसी मतदाता का नाम सूची में वापस नहीं आता। इसके लिए बूथ स्तर पर काम करना, प्रभावित लोगों की पहचान करना और चुनाव आयोग के सामने प्रमाण प्रस्तुत करना जरूरी है।
इस पूरे विवाद में विपक्ष की राजनीति का एक विरोधाभास केरल के उदाहरण से सामने आता है। बीती 6 मार्च को केरल में चुनावी तैयारियों की समीक्षा के दौरान चुनाव आयोग ने मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों से बातचीत की थी। अधिकांश राजनीतिक दलों ने केरल में एसआईआर के शांतिपूर्ण और सुचारु संचालन की सराहना की थी। कांग्रेस इस बैठक में शामिल थी। कुछ दलों ने बूथ लेवल अधिकारियों के काम की प्रशंसा की थी। यह तथ्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि जिस प्रक्रिया को दूसरे राज्यों में विपक्ष लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहा है, उसी प्रक्रिया के केरल में संचालन पर राजनीतिक दलों ने संतोष व्यक्त किया था।
कर्नाटक का उदाहरण भी इस बहस को समझने में मदद करता है। वहां एसआईआर के दौरान लगभग 5.54 करोड़ मतदाताओं की सूची में से 99.76 लाख नाम हटाए गए। इनमें 65.46 लाख स्थायी रूप से स्थानांतरित, 19 लाख अनुपस्थित, 16.4 लाख मृत और 7.1 लाख दोहरी प्रविष्टियों के रूप में दर्ज थे। नोटिस पाने वाले 43.82 लाख लोगों में से 43.2 लाख को अंतिम सूची में बनाए रखा गया, जबकि 61,867 को अपात्र पाया गया। साथ ही, दस लाख से अधिक नए मतदाता भी जोड़े गए। ये आंकड़े बताते हैं कि पुनरीक्षण में नाम हटाने के साथ नाम जोड़ने और दावों की जांच की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है। इसलिए केवल कुल हटाए गए नामों की संख्या को गलत तरीके से मताधिकार छीनने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के मंत्री सतीश जारकीहोली ने 29 अक्टूबर को कहा कि कांग्रेस के प्रशिक्षण और प्रयासों के कारण राज्य में एसआईआर सही ढंग से पूरा हुआ। अन्य राज्यों में भी इसी तरह होना चाहिए। हालांकि, 30 अक्टूबर को उन्होंने सफाई दी कि उनके बयान का अर्थ एसआईआर का समर्थन करना नहीं था, बल्कि फॉर्म-7 के जरिए पात्र मतदाताओं के नाम हटाने की कथित कोशिशों को नाकाम करना था। निश्चित रूप से किसी दबाव में उन्होंने सफाई दी है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आपत्ति एसआईआर की अवधारणा से है या उसके क्रियान्वयन में सामने आई विशिष्ट गड़बड़ियों से? दोनों के बीच अंतर स्पष्ट करना विपक्ष की जिम्मेदारी है।
एसआईआर को देश में पहली बार हो रही प्रक्रिया बताना भी सही नहीं है। चुनाव आयोग के अनुसार पिछला बड़ा विशेष गहन पुनरीक्षण 2002 से 2004 के बीच हुआ था। दो दशक से अधिक समय बाद मतदाता सूची की व्यापक जांच की आवश्यकता महसूस की गई। वर्तमान प्रक्रिया का उद्देश्य मृत मतदाताओं, स्थाई रूप से स्थानांतरित हो चुके लोगों, दोहरी प्रविष्टियों और अन्य अपात्र नामों की पहचान करना है। पात्र नागरिकों के नाम सूची में बने रहें, यह सुनिश्चित करना भी इसका अनिवार्य हिस्सा है। संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी देता है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का कानूनी आधार प्रदान करती है।
एसआईआर की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट भी 27 मई 2026 को अपना फैसला दे चुका है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम चुनाव आयोग मामले में न्यायालय ने आयोग के इस पुनरीक्षण को उसके संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों के अनुरूप माना। हालांकि, न्यायालय ने प्रक्रिया में दस्तावेजों, पारदर्शिता और मतदाताओं की पहुंच से जुड़ी चिंताओं को भी गंभीरता से लिया तथा आवश्यक सुरक्षा उपायों पर जोर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम हट जाना अपने आप में किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त होने की घोषणा नहीं है। इस फैसले का अर्थ यह नहीं कि चुनाव आयोग की प्रत्येक कार्रवाई सवालों से परे है, बल्कि यह है कि पुनरीक्षण का अधिकार और उसके निष्पक्ष क्रियान्वयन की जिम्मेदारी साथ-साथ चलती हैं।
वैसे, यहां चुनाव आयोग की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना गंभीर प्रशासनिक चूक है। आयोग को प्रत्येक हटाए गए नाम का कारण सार्वजनिक करना चाहिए, नोटिस और सुनवाई की व्यवस्था प्रभावी बनानी चाहिए। अपीलों का समयबद्ध निस्तारण करना चाहिए। सरकार और आयोग के पास उपलब्ध आंकड़ों की स्वतंत्र जांच तथा राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों की भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए। लोकतंत्र में किसी संस्था को आलोचना से छूट नहीं मिल सकती, लेकिन आलोचना का आधार प्रमाण और तथ्य होने चाहिए।
विपक्ष की राजनीतिक चुनौती इससे कहीं बड़ी है। लगातार चुनावी पराजयों के बाद उसे अपनी संगठनात्मक कमजोरियों, नेतृत्व, नीतियों और जनता से कटते संवाद पर आत्ममंथन करना चाहिए। रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास और सुशासन जैसे मुद्दों पर ठोस विकल्प प्रस्तुत करना उसकी जिम्मेदारी है। यदि हर चुनावी पराजय के बाद संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना ही मुख्य राजनीतिक कार्यक्रम बन जाए तो जनता के बीच वास्तविक मुद्दों की जगह आरोप-प्रत्यारोप ले लेते हैं।
लोकतंत्र में विपक्ष का मजबूत होना आवश्यक है, लेकिन मजबूत विपक्ष केवल विरोध से नहीं बनता। उसे तथ्यों के साथ सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछने होते हैं तथा जनता के सामने अपना वैकल्पिक कार्यक्रम भी रखना होता है। इसी तरह चुनाव आयोग को भी निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ काम करना होगा। एसआईआर पर अंतिम कसौटी न कांग्रेस की रैली होनी चाहिए, न भाजपा का राजनीतिक जवाब और न ही किसी दल का चुनावी लाभ। कसौटी केवल यह होनी चाहिए कि एक भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से न कटे और एक भी अपात्र प्रविष्टि मतदाता सूची में न बनी रहे। मतदाता के अधिकार की रक्षा राजनीतिक नारों से नहीं, प्रमाण, जवाबदेही और जमीन पर किए गए काम से होगी।
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