Silkyara Tunnel Incident
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ऋषिकेष कर्णप्रयाग रेल की सुरंगों में किसी को खरोच तक नहीं आई
ऋषिकेश -कर्णप्रयाग रेललाइन के लिए बन रही 105 किमी लंबी 17 सुरंगों में अब तक एक भी श्रमिक का खरोच तक आने की खबर सुरंगों से बाहर नहीं निकली। जबकि सुरंग निर्माण में घटनाएं घटती रहती है। इन 17 सुरंगों के लिए कुल छोटी-बड़ी 218 किमी लम्बी सुरंगें बननी हैं। चूंकि हिमालय क्षेत्र में राजमार्ग और बांध श्रमिकों को अक्सर शोषण के साथ-साथ उच्च जोखिम और अलगाव का सामना करना पड़ता है, इसलिए हमारी सरकारों को उनकी सुरक्षा और सुरक्षा के लिए तात्कालिकता के आधार पर महत्वपूर्ण कदम उठाने चाहिए।
समूचा खनन क्षेत्र जोखिम भरा है
सवाल केवल सड़क या रेल परियोजनाओं की सुरंगों का ही नहीं है। समूचा सुरंग निर्माण क्षेत्र जोखिम से भरा होता है, जिसमें गरीब मजदूरों की ही जानें जोखिम में होती हैं। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा प्रायोजित एनविस सेंटर ऑन एनवार्नमेंटल प्राब्लम ऑफ मानिंग संस्था की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2013 से लेकर 2023 अब तक की 10 वर्षों की अवधि में देश में कुल 225 माइनिंग दुर्घटनाएं हुईं जिनमें 404 लोग मारे गए और 271 घायल हुए। घायलों से अधिक मृतकों की संख्या को देखते हुए माइनिंग के खतरों की गंभीरता का आंकलन किया जा सकता है। इस अवधि में सर्वाधिक 151 मौतें 2018 और 102 मौतें 2015 में हुई थीं।
भारतीय कंपनियों की घटिया डीपीआर
अपने बेवाक बयानों के लिये चर्चित सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इसी साल 17 मई 2023 को उद्योग जगत के प्रमुख संगठन फिक्की के एक कार्यक्रम में कहा था कि सड़क परियाजनाओं में विलम्ब, लागत में वृद्धि और दुर्घटनाओं के लिए अगर कोई सबसे बड़ा दोषी है तो वह डीपीआर बनाने वाला है।
डीपीआर का मतलब डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट। गडकरी के अनुसार भारत की डीपीआर बनाने वाली कंपनियां निहायत घटिया डीपीआर बनाती हैं, इसलिये हमें इस कार्य के लिये अन्तर्राष्ट्रीय कंपनियों की मदद लेनी चाहिए। घटिया डीपीआर के मामले में गडकरी की यह धारणा सिलक्यारा सुरंग हादसे में सही साबित हो गई। अब बताया जा रहा है कि सिलक्यारा सुरंग की डीपीआर में जिस जगह पक्की रॉक बताई गई थी वहां खुदाई के दौरान भुरभुरी मिट्टी निकल रही है। लूज रॉक का मलबा खुदाई में थम नहीं रहा है।
हिमालय पर 2.75 लाख करोड़ की सुरंगे बनेंगी
अगर केन्द्रीय मंत्री की आंशका निर्मूल नहीं है तो वर्तमान में चल रही राजमार्गों की तमाम सुरंग परियोजनाओं पर सवाल उठना वाजिब ही है। क्योंकि इन सबकी डीपीआर भारतीय कंपनियों द्वारा बनायी गई हैं। अगर ऐसी डीपीआर के आधार पर बनने वाली सुरंगें आज टिक भी गईं तो इनके कल का क्या भरोसा? सिलक्यारा सुरंग का वह हिस्सा भी ढह रहा था जिसे पक्का कर दिया गया था। उत्तराखंड के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में इस वक्त पौने तीन लाख करोड़ रुपये की लागत की सुरंगें बनाई जा रही हैं।
ये सुरंगें विभिन्न रेल, सड़क प्रोजेक्ट में बन रही हैं। गडकरी का यह भी कहना था कि वर्तमान में सड़क परियोजनाओं में हिमालयी क्षेत्रों में लगभग 79 किमी लम्बी सुरंगें बन रही हैं जिनमें 6 सुरंगें हिमाचल प्रदेश और 2 उत्तराखण्ड की भी हैं जिनका सुरक्षा ऑडिट अब सिलक्यारा हादसे के बाद कराया जा रहा है। राजमार्ग के अलावा उत्तराखण्ड में रेल मार्ग के लिए 17 बड़ी सुरेंगे बन रही हैं जिनमें से कुछ तैयार हो गई हैं।
अगर रेल लाइन सचमुच बदरीनाथ और केदारनाथ तक पहुंचाई गई तो रेल सुरंगों के बार नहीं दिख सकती। सन् 2021 के अन्तराष्ट्रीय रोड टनल वेबिनार में गडकरी ने कहा था कि देश में कुल 270 किमी लम्बी सुरंगें 2026 तक बनायी जानी हैं जिनमें से 135 किमी लम्बी सुरंगों की डीपीआर उस समय तक बन चुकी थी। ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए कि सिलक्यारा हादसे से सबक लेकर इन सभी सुरंग परियोजनाओं में सुरक्षा मानकों के साथ ही पर्यावरणीय मानकों का पूरा ध्यान रखा जाएगा।
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