जिस दिन भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने एलान किया था कि इस बार का विधानसभा चुनाव पार्टी लड़ेगी और किसी चेहरे को नहीं पेश किया जाएगा तो पार्टी में संदेश यह गया कि आलाकमान इस बार शिवराज को भावी मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देख रहा है । इसका असर चुनाव अभियान पर भी पड़ा। शिवराज चौहान के प्रचार अभियान में शिथिलता आई और एक तरह से वे हाशिए पर चले गए। लेकिन मंच से शिवराज की अनुपस्थिति के बाद नाराज नेता कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, प्रभात झा, बाबूलाल गौर, प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह मिलकर भी प्रचार अभियान को गति नहीं दे पाए। इसके बाद पार्टी के हाथ पांव फूल गए और फिर शिवराज को प्रचार अभियान का मुख्य केंद्र बिंदु बनाया गया।
महीनों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के लिए तैयार विज्ञापन अखबारों और चैनलों को दिए गए। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। अब व्यवस्था विरोधी वोट और बागी उम्मीदवारों से निपटना शिवराज सिंह चौहान की बड़ी चुनौती बन गई है। हालांकि दोबारा सक्रिय होने के बाद शिवराज सिंह पार्टी को वापस मुकाबले में ले आए हैं।
जिस तरह से केंद्रीय नेतृत्व ने अभी भी राष्ट्रीय मुद्दे और प्रचार के अनेक संवेदनशील मोर्चे अपने हाथ में ले रखे हैं, वे शिवराज सिंह के लिए राहत का सबब बन गए हैं। अगर पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ता है तो आलाकमान भी उसके लिए उतना ही जिम्मेदार होगा जितना प्रदेश सरकार का कामकाज। इसमें कोई संदेह नहीं कि मध्यप्रदेश में तीन बार लगातार सरकार बनाकर बीजेपी ने एक अनूठा रिकॉर्ड बनाया है। मगर इसके लिए सरकार के प्रदर्शन से अधिक कांग्रेस का लचर अभियान रहा है। नेतृत्व थका हुआ था, संगठन बिखर गया था और कार्यकर्ता निराश था। लिहाजा पार्टी चुनाव दर चुनाव हारती गई।
राहुल गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को जिस तरह अगुआ बनाया गया उससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है। राजनीतिक पंडित कह रहे हैं कि पंद्रह साल में पहली बार कांग्रेस चुनाव मैदान में आर पार की लड़ाई के मूड में नजर आ रही है।