मशहूर पत्रकार और सांस्कृतिक टिप्पणीकार शेफाली वासुदेव पच्चीस साल से अधिक समय से फैशन व संस्कृति के बारे में लिखती रही हैं। उन्होंने अपनी नई एवं चर्चित किताब स्टोरीज वी वीयर में बताया है कि भारत का राजनीतिक वर्ग कपड़ों के जरिये अपनी सार्वजनिक छवि कैसे बनाता है।
राजनेता कपड़ों की भाषा के बारे में अच्छी तरह जानते हैं। हर कपड़ा सोच-समझकर चुना जाता है, ताकि विचारधारा को मजबूत किया जा सके या धार्मिक प्रतीकों को उभारा जा सके, और इसे मतदाता वर्ग के साथ तालमेल बिठाने के लिए तैयार किया जाता है। किताब का दूसरा अध्याय एक शानदार तस्वीर से शुरू होता है, जब नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे होते हैं। वासुदेव का ध्यान उस दिन मोदी की पहनी गई आसमानी-नीली बंडी पर जाता है। वह तर्क देती हैं कि यह ‘नेहरू जैकेट’ नहीं थी। वह लिखती हैं कि वह पक्का ‘मोदी जैकेट’ थी-अपने आप में एक अलग श्रेणी, ठीक वैसे ही, जैसे इसे पहनने वाला आदमी है। नीला रंग एक ऐसा शेड है, जो ‘दिखना चाहता है’, जो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से जुड़े हुए रंगों या अटल बिहारी वाजपेयी के पसंदीदा हल्के ग्रे-ब्लू रंगों से बिल्कुल अलग है।
इस पुस्तक में वासुदेव खादी के बदलते प्रतीकवाद का पता लगाती हैं, और छोटे शहरों की भारतीय महिलाओं के शांत पहनावे वाले विद्रोहों का दस्तावेजीकरण करती हैं। स्टोरीज वी वियर में, शेफाली पड़ताल करती हैं कि पहनावा पहचान, अपनेपन, और विरोध का माध्यम कैसे बनता है। वह कई जगहों से गुजरती हैं, यह पूछने के लिए कि जब हम ताकत, विनम्रता, विद्रोह या दुख को जताने के लिए कपड़े पहनते हैं, तो हम क्या संकेत देते हैं? इस प्रक्रिया में, वह हमारी जिंदगी और आधुनिक भारत की संरचना में गुंथे विरोधाभासों को सामने लाती हैं: खादी की विवादित विरासत से लेकर एयरपोर्ट टर्मिनलों के नजारे तक, हिंदी ओटीटी ड्रामा की एंटी-हीरोइनों से लेकर एथिकल फैशन के लुभावने भ्रम तक। मिथक और आईने, कपड़े व प्रदर्शन, त्वचा और स्क्रीन पर आधारित यह अनोखी किताब उन तरीकों की जांच करती है, जिनसे हम अपने इतिहास को दिखाते या छिपाते हैं तथा विरोधाभासों को कहानियों के रूप में सामने लाते हैं।
कुल मिलाकर, यह किताब उन जिंदगियों की एक दिलचस्प पड़ताल है, जिनसे हम गुजरते हैं और उनकी खामोशी में बुनी कहानियों की भी। एक पत्रकार की नजर और एक कहानीकार के दिल से, शेफाली उन कहानियों को सामने लाती हैं, जो सबके सामने छिपी होती हैं, जिनमें श्मशान घाट और कॉफी शॉप, खादी पर बहस और एयरपोर्ट लाउंज शामिल हैं। राजनीतिक शैली से लेकर उसे जान-बूझकर मिटाने तक, वासुदेव बताती हैं कि कैसे कपड़े, संस्कृति और पहचान के खामोश वाहक बन जाते हैं।