राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत के हालिया अमेरिकी दौरे के बाद भारतीय कूटनीति की सफलता की कुछ रोचक बातें सामने आई हैं। यात्रा शुरू होने से पहले अमेरिका के कुछ कथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भागवत के विरोध में मीडिया के माध्यम से काफी शोर-शराबा किया। लेकिन, कार्यक्रम के दौरान उनका विरोध प्रदर्शन इतना फीका रहा कि न भारतीय और न ही यूरोपियन मीडिया ने उसको तवज्जो दी।
कार्यक्रम के दौरान भारत में भगोड़ा घोषित कश्मीरी मूल के अलगाववादी नेताओं को तो विरोध में ट्रकों पर एलईडी लगाने तक के लिए संसाधन नहीं मिल सके।
दरअसल, डॉ. गुलाम नबी फई जैसे स्वघोषित मानवाधिकारी कार्यकर्ता अमेरिका में आईएसआई के एजेंट साबित होने पर सजायाफ्ता हो चुके हैं। साथ ही, साल 2025 में उन्हें भारत में भगोड़ा घोषित किया जा चुका है।
वह हर साल पाक अधिकृत कश्मीर के कुछ नेताओं और वहां की सरकार के एक-दो प्रतिनिधियों के अमेरिका के किसी शहर में बुलाकर देशविरोधी बयानबाजी करने की रस्म जैसी निभाते रहे हैं। लेकिन, पहले जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की विदाई और अब पाक अधिकृत कश्मीर से उठ रही आजादी की मांग ने फई जैसे धुर भारत विरोधी और अलगाववादी सोच वाले कश्मीरी नेताओं की अमेरिका में बची-खुची साख भी खत्म कर दी।
इसका नतीजा रहा कि पिछले पखवाड़े जब भागवत ने न्यूयार्क स्थित एक मंदिर में अनवरत लंगर जैसे अच्छे कामों की शुरुआत की तो उसे अमेरिकी मीडिया में ज्यादा जगह मिली। दूसरी ओर, टाइम्स स्कवॉयर के पास जुटे अलगाववादियों की सोच वाले लोगों की संख्या 150 का आंकड़ा भी नहीं छू सकी।
फई ने पाक अधिकृत कश्मीर के जिन नेताओं को इस विरोध में शामिल होने का न्योता भेजा था, वह भी इस बार किनारा काट गए। पहले के ज्यादातर प्रदर्शनों में वहां की सरकार के एक-दो प्रतिनिधि रहते थे।
इस बार फई के वर्ल्ड कश्मीर अवेयरनेस फोरम जैसे तमाम संगठनों के प्रयास के बावजूद पाक अधिकृत कश्मीर के नेताओं का उनको समर्थन नहीं मिल सका और न ही अमेरिका में रह रहे कश्मीरियों ने खुलकर उनका साथ दिया। बस, सोशल मीडिया के माध्यम से सक्रियता दिखाने की कोशिश की जाती रही।
संगठन की वेबसाइट पर कार्टून दिखे, लेख और बयान नदारद
डॉ. मोहन भागवत और आरएसएस के विरोध में अमेरिकी मीडिया में शोर मचाने वाले गुलाम नबी फई के वर्ल्ड कश्मीर अवेयरनेस फोरम की वेबसाइट पर यात्रा के विरोध में कुछ आपत्तिजनक कार्टून तो दिखे, लेकिन इसमें न तो विरोध में कोई लेख पोस्ट किया गया और न ही बयान।
इस यात्रा के विरोध में काम करने वाले अलगाववादियों ने हिंदू शब्द को शामिल कर बने कुछ संघटनों को आगे कर विरोध करने का प्रयास किया। लेकिन, जब मैदान पर उतर कर टाइम्स स्क्वैयर के सामने प्रदर्शन की बात आई तो कई बार बुलाने के बावजूद 150 लोग भी जुटते नहीं दिखे। हालांकि कुछ संगठनों का दावा है वे अलग-अलग समय में तख्ती लेकर विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए थे।
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