पिछले कुछ दिनों से सर मूल्य आधारित पत्रकारिता के लिए बेहद सक्रिय थे।
- फोटो : Journalism
एक अनूठा और प्रेममयी व्यक्तित्व
प्रो. दीक्षित का हमेशा हंसता हुआ चेहरा, उनकी सरलता और हमारी शैतानियों को नजरंदाज करने की उनकी अभूतपूर्व क्षमता आज भी हमारी आंखें पनीली कर जाती हैं। वे गजब के अध्यापक थे। उनके पास कोई नोट्स नहीं होते थे, उनकी कक्षाएं एक घंटे के निर्धारित समय से अक्सर तीन घंटे पार कर जातीं, लेेेेेकिन वे हमें कभी बोर नहीं करती थीं।
ऐसा लगता था कि सर सारी पत्रकारिता आज ही पढ़ा देंगें और हम अभी यहां से निकले नहीं कि संपादक हो जाएंगें। ज्यादातर के साथ ऐसा हुआ भी, जिनमें मैं भी एक था। पिछले कुछ दिनों से सर मूल्य आधारित पत्रकारिता के लिए बेहद सक्रिय थे।
उन्होंने एक संगठन बनाया ‘मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम समिति’, उसकी पत्रिका भी निकाली ‘मूल्यानुगत मीडिया’। सर पिछले 2009 से यह कहते आ रहे थे कि मुझे इस संगठन से जुड़ना चाहिए। मुझे लगता था मैं अपने विश्वविद्यालयीन दायित्वों से इतना घिरा हूं, संगठन में समय नहीं दे पाऊंगा। उन्हें मना करता रहा।
पिछले साल कुछ ऐसा हुआ कि सर को कैंसर की बीमारी हुई। हम उनके साथ बैठते थे। एक दिन बहुत कातर स्वर में उन्होंने कहा कि संजय तुम संगठन का काम देखो। सर की आवाज में जाने क्या असर था, मैंने उन्हें सदस्यता का चेक बनाकर तुरंत दिया। कुछ ही महीनों में इंदौर में मूल्यानुगत मीडिया का अधिवेशन था, सर बहुत बीमार थे। फिर भी आए और उस सम्मेलन में मुझे संगठन का अध्यक्ष बना दिया गया। मैं अवाक् था किंतु गुरु आज्ञा की अवहेलना का साहस नहीं था। इस घटना को अभी साल भर भी नहीं हुए हैं। सर बहुत कठिन उत्तराधिकार मेरे कंधों पर सौंपकर जा चुके हैं।
इसी तरह गत साल माउंटआबू में आयोजित मीडिया सम्मेलन के लिए उन्होंने कहा और मैं चला गया। जबकि इसके पहले वे कई बार कहते रहे मैं नहीं जा सका। माउंटआबू में उन्होंने सप्ताह भर मेरी बहुत चिंता की। हमें बातचीत का बहुत समय मिला। छात्र जीवन के बाद साथ रहने का, दोनों समय साथ भोजन करने का।
मैंने उन्हें निकट से देखा वे पूरी तरह अध्यात्म को समर्पित हो चुके थे। सिर्फ मूल्य आधारित समाज और मीडिया का सपना उनकी आंखों में तैरता था। मुझे उनकी कई बातें अव्यवहारिक भी लगती थीं, हमारे प्रतिवाद भी होते, किंतु वे अडिग और अविचल। कहते थे रास्ता यही है।
एक सुंदर दुनिया इन्हीं मूल्यों से बनेगी। नहीं तो असंभव है। वहां अपनी गहरी आस्था के चलते उन्होंने कहा “संजय यह बाबा का दरबार है। यहां से लौटकर तुम्हें बहुत बड़ा पद मिलेगा। उनकी कृपा तुम पर है पर तुम यहां लेट आए। लौटकर देखना।”
मुझे इन बातों पर इस तरह का विश्वास नहीं है। पर सर के सामने खामोशी ही ठीक थी। पर मैंने अनुभव किया माउंट आबू से लौटने के बाद मेरे भी अच्छे दिन आए। सर की नजर में यह बाबा का आशीर्वाद है। मैं इसे गुरु कृपा के रूप में भी देखता हूं। मैंने अपने शिक्षक और गुरु की जबसे सुननी प्रारंभ की, मुझे भी आध्यात्मिक शक्तियों को आशीष मिल रहा है। प्रकृति मेरे साथ न्याय करती नजर आती है।
स्मृतियों की लंबी श्रृृंखला
ऐसे गुरुवर न जाने कितनी कहानियां हैं। एक याद जाती है तो तुरंत दूसरी आती है। उनका न होना मेरी जिंदगी में ऐसा शून्य है, जिसे भरना संभव नहीं है। पिछले साल मेरे दादा जी की पुण्य स्मृति में गांधी भवन, भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में वे खराब स्वास्थ्य के बाद भी आए और कहा “मैं बीमार नहीं हूं, मेरा शरीर बीमार है।”
उनका आत्मविश्वास विलक्षण था। इस आयु में भी लेखन, प्रवास, संपादन और मिलने-जुलने से उन्होंने परहेज नहीं किया। हाल में भी भारतीय जनसंचार संस्थान की ऑनलाइन गोष्ठी में भी वे हमारे साथ जुड़े और सुंदर संबोधन दिया। उनकी अनुपस्थिति को स्वीकारना कठिन है।
लगता है वे आएंगें और कहेंगें “पंडत कुछ करो। ऐसे ही जिंदगी गुजर जाएगी।” मुझे उनके पुत्र और मेरे भाई गीत दीक्षित, बहूरानी और बच्चों का चेहरा याद आ रहा है। उन सबने सर को बहुत दिल से संभाला और चाहा कि वे मनचाही जिंदगी जिएं। गीत ने सबको जोड़कर सर की पुस्तक विमोचन पर हम सबको जोड़ा और भव्य आयोजन में उनके तमाम दोस्त और साथी जुड़े।
हम सब और गीत भाई की इच्छा थी सर मुस्कराएं और खुश रहें। मेरी फेसबुक पोस्ट पर अपनी श्रध्दांजलि व्यक्त करते हुए पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने ठीक ही लिखा है-“ मध्यप्रदेश ने दो पीढ़ियों को संस्कारित करने वाला एक मूल्यनिष्ठ पत्रकार, संपादक और मीडिया प्राध्यापक खो दिया है।”
सच में सर एक संस्कारशाला थे, पाठशाला और एक पूरी जिंदगी। उनके साथ बिताए समय ने हमें समृद्ध किया है, अब उनकी यादें ही हमारा संबल हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।