वृद्धावस्था में सबसे बड़ी जरूरत केवल दवाइयों की नहीं, बल्कि सहारे, अपनत्व और सही मार्गदर्शन की भी होती है। यही कारण है कि आज कई स्थानों पर सामूहिक वार्ताओं और समूह आधारित कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इनका उद्देश्य केवल बातचीत करना नहीं, बल्कि बुजुर्गों के जीवन को अधिक स्वस्थ, सुरक्षित और आनंदमय बनाना है।
इन सामूहिक बैठकों/कार्यक्रमों की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि ये वृद्धों को यह एहसास कराते हैं कि वे अकेले नहीं हैं। समाज उनके साथ खड़ा है। जब एक उम्र के लोग साथ बैठते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं और एक-दूसरे की समस्याओं को समझते हैं, तो मन का बोझ हल्का हो जाता है। इसके अलावा, कई बार जो बात डॉक्टर या किताबें नहीं समझा पातीं, वह साथी बुजुर्गों की साधारण सलाह समझा देती है। इन बैठकों या कार्यक्रमों में भोजन और पोषण पर भी चर्चा होती है, क्योंकि बढ़ती उम्र में सबसे बड़ी चिंता इन्हें लेकर ही रहती है। समूह में हर कोई अपने-अपने अनुभव साझा करता है। उनकी छोटी-छोटी जानकारियां बाकी लोगों के लिए बड़े काम की साबित होती हैं। कुछ बुजुर्ग महिलाएं रसोई में ही उपलब्ध चीजों से पौष्टिक व्यंजन व पेय बनाने की विधियां एक-दूसरे को सिखाती हैं। इससे स्वास्थ्य तो सुधरता ही है, उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
प्रबल यात्रा कार्यक्रम जैसे प्रयासों में घर के आसपास सब्जियां उगाने पर विशेष जोर दिया गया है। गांवों में कई बुजुर्ग अपने आंगन या घर के पीछे थोड़ी-सी जमीन में ही हरी सब्जियां उगा लेते हैं। इससे एक तो ताजी सब्जियां मिलती हैं और बागवानी करने से मन को सुकून भी। कई बुजुर्ग तो मजाक में कहते हैं कि पेड़-पौधे हमारे सबसे शांत दोस्त होते हैं, उन्हे पानी दो, तो मुस्कुरा उठते हैं। अक्सर वरिष्ठ नागरिक यह सोचकर व्यायाम नहीं करते कि अब उम्र निकल गई है। पर, हल्की-फुल्की शारीरिक गतिविधि वृद्धावस्था में और भी जरूरी हो जाती है। इसलिए, ऐसी बैठकों में बेहद आसान व्यायाम भी सिखाए जाते हैं। कई गांवों में तो बुजुर्ग समूह बनाकर पार्क या चौपाल में ही व्यायाम करते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए भी कई रोचक उपाय किए जाते हैं। कोई पहेलियां पूछता है, कोई पुरानी कहावतें याद दिलाता है, तो कोई गीत गुनगुनाता है। कई जगह स्मृति बढ़ाने वाले खेल भी खेले जाते हैं। इससे अकेलापन कम होने के साथ दिमाग भी चुस्त बना रहता है। वृद्धावस्था में शरीर कमजोर होने के कारण कई बार फिसलन, टूटी सीढ़ियां या अंधेरा दुर्घटनाओं का कारण बन जाते हैं। इसलिए, इन कार्यक्रमों या समूहों में घर और आसपास के सुरक्षित वातावरण पर भी चर्चा की जाती है।
आज जरूरत केवल अस्पताल और दवाइयों की नहीं, बल्कि ऐसे संवेदनशील समाज की है, जहां वरिष्ठ नागरिक सम्मान व खुशी के साथ जीवन बिता सकें। यदि गांव, मोहल्ले व परिवार मिलकर छोटे-छोटे प्रयास करें, तो वृद्धावस्था जीवन का शांत व सुंदर पड़ाव बन सकती है। जिसने जीवन भर दूसरों को सहारा दिया, उसके कांपते हाथों को थाम लेना ही सच्ची संवेदना है। बुजुर्ग किसी घर का पुराना सामान नहीं, बल्कि उस दीपक की तरह होते हैं, जिसकी लौ भले धीमी हो जाए, पर वह घर को रोशन करना कभी नहीं छोड़ती।
-पूनम पांडे
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