खाड़ी में बढ़ता तनाव अमेरिकी कूटनीति का परिणाम है।
- फोटो : Pixabay
तेल उत्पादक देशों में अमेरिकी कूटनीति का परिणाम है यह
खाड़ी में बढ़ता तनाव अमेरिकी कूटनीति का परिणाम है। आने वाले समय में यह तनाव और बढ़ेगा। क्योंकि ईऱान अब अमेरिका से समझौता के मूड में नहीं है। ईरान अपनी अर्थव्यवस्था को तबाही की तरफ ले जाने के लिए अमेरिका को जिम्मेदार मान रहा है। ईऱान और सऊदी अरब के बीच पुरानी दुश्मनी है।
ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को लिए ईऱान सऊदी अरब को भी जिम्मेदार मानता है। इसलिए अब ईरान लगातार सऊदी अरब को चारों तरफ से घेरने की कोशिश कर रहा है। चूकिं सऊदी अरब की इकनॉमी पूरी तरह से सऊदी अरब की तेल कंपनी अरामको के बल पर ही चलती है, इसी के कमाए गए पैसे से अमेरिकी हथियारों की खरीद होती है, इसलिए अब ईऱान सऊदी तेल कंपनी को निशाना बना रहा है। इसके लिए ईऱान स्थानीय शिया मिलिशिया गुटों का बेहतर इस्तेमाल कर रहा है।
अरामको के सेंटरों पर हमले के बाद ईऱान की रणनीति स्पष्ट है। वो सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था और आय के मुख्य केंद्रों पर हमला करवाएगा। दिलचस्प बात यह है कि लेबनान, सीरिया से लेकर यमन तक ईऱान समर्थिक मिलिशिया गुट जमीन पर खासे मजबूत है। महत्वपूर्ण ट्रेड रूटों पर उनका कब्जा है। यहां तक नौवहन के प्रमुख रूटों के आसपास भी ईरान समर्थित मिलिशिया गुटों ने अपना कब्जा जमा रखा है।
अरामको की आय, अमेरिकी हथियार और ईरान की चिढ़
पश्चिम एशिया में तनाव, तेल का खेल और सऊदी अरब की तेल कंपनी अरामको की इसमें भूमिका समझना जरूरी है। सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको का दावा है कि सऊदी अरब के पास कुल 336 अरब बैरल का तेल भंडार है। इसका मालिक सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको है।
अरामको प्रति वर्ष अऱबों डॉलर की शुद्ध कमाई करता है। 2018 में अरामको ने 111 अरब डॉलर की शुद कमाई की थी। इससे पहले 2017 मे अरामको ने 75 अरब डॉलर की शुद्ध कमाई की थी। 2019 में कंपनी ने पहले 6 महीनें में 47 अरब डॉलर की कमाई की है। अब इस कमाई को देख ईऱान का नाराज होना लाजिमी है। क्योंकि ईऱान अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों के कारण अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल नहीं बेच पा रहा है। ईऱान के पास तेल है, लेकिन वो दुनिया को तेल नहीं बच सकता है।
भारत जैसे खरीदार ने भी अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण तेल लेना बंद कर दिया। दूसरी तरफ अरामको ने भारत में रिलांयस के जामनगर रिफाइनरी में अपनी हिस्सेदाऱी खरीदने का फैसला लिया। इससे ईऱान का नाराज होना स्वभाविक है। ईऱान का तर्क है कि सऊदी अरब, इजरायल और अमेरिका मिलकर कर ईऱान को तबाह कर रहे हैं। वैसे इजराइल और सऊदी अरब एक दूसरे के घोर विरोधी है, लेकिन ईऱान के मामले में दोनों इकट्ठे है। अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को झेल रहे ईऱान की अर्थवयवस्था चरमरा रही है।
ईरान लगाता यूरोपीए देशों से आग्रह कर रहा है कि ईऱानी तेल की बिक्री पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों को खत्म करवाए। लेकिन अमेरिका यूरोपीए देशों की बात भी नहीं सुन रहा है। हालांकि अमेरिका की अपनी रणनीति है। सऊदी अरब और ईऱान का तनाव अमेरिका को दोतरफा लाभ देगा। इस हमले के बाद अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री और हथियार सऊदी अरब को बेचेगी।
सऊदी अरब ने 2017 में अमेरिका से दस सालों में 350 अरब डॉलर के हथियार खरीदने का समझौता कर चुका है। इस समझौते से अमेरिकी रक्षा उधोग को भारी लाभ पहुंचा है। इस समझौते के तहत 110 अरब डॉलर के हथियार तो तुरंत ही खरीदे जाने थे। लेकिन अमेरिका सिर्फ हथियार उधोग से ही लाभ कमाने के चक्कर में नहीं है। वो तेल के क्षेत्र में भी अरामको के हुए हमले का लाभ लेना चाहता है। हमले के बाद अरामको के तेल उत्पादन क्षमता पर असर प़ड़ा है। यहां से वैश्विक आपूर्ति कुछ समय तक प्रभावित होगी। अमेरिका इसी का लाभ उठाते हुए बाजार मे अमेरिकी शेल तेल को बेचने की कोशिश करेगा। इस अमेरिका प्रतिदिन 90 लाख बैरल शेल ऑयल का उत्पादन कर रहा है। उसे वो वैश्विक बाजार में बेचने के लिए हर हथकंडे को अपना रहा है। अरामको पर हुआ हमला अमेरिकी शेल ऑयल के लिए अच्छी खबर लेकर आया है।
अरबों डॉलर का रक्षा बजट फिर भी हमले से बचने में फेल
सऊदी अरब के तेल सेंटरों पर हमला यमन से हुआ, इराक से हुआ है या ईरान से यह बहस का विषय है। लेकिन इस हमले ने सऊदी अरब के डिफेंस सिस्टम की पोल खोल दी है। क्योंकि यह कोई पहला हमला नहीं है। बीते कुछ समय में तीन से चार हमले सऊदी अरब की धरती पर हुए है।
निशाना अरामको के तेल सेंटरों, पाइप लाइनों को बनाया गया। अगर इस हमले को हाउथी विद्रोहियों ने अंजाम दिया है, तो यह खतनारक संकेत है। अगर हाउथी विद्रोही 500 किलोमीटर दूर बैठ सऊदी अरब के अंदर ड्रोन अटैक करने में सफल हो गए तो इसका असर एशियाई से अफ्रीका तक के समुद्री नौवहन पर पड़ेगा। हाउथी विद्रोहियों का दावा है कि उन्होंने ड्रोन से हमला किया है।
अगर इस दावे में सच्चाई है तो इसका मतलब है यह है कि उनके पास उच्च गुणवता वाले ड्रोन है। अनुमान यहां तक लगाया जा रहा है कि हाउथी विद्रोहियों के पास 1200 किलोमीटर तक मार करने वाले ड्रोन भी है। हाउथी विद्रोहियों को यह तकनीक ईऱान ने उपलब्ध करवायी है। हमले के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की चिंता यह है कि समुद्री रास्ते से जाने वाले तेल पर भी ड्रोन हमला हो सकता है।
सऊदी अरब की चिंता यह है कि वह सबसे बड़ा अमेरिकी हथियारों का खरीदार है। दुनिया के बेहतर हथियार सऊदी अरब के पास है। सऊदी अरब अरबों डॉलर हर साल अमेरिकी हथियारों की खरीद पर खर्च करता है। सऊदी अरब का रक्षा बजट दुनिया का तीसरा बड़ा रक्षा बजट है। इसका स्थान अमेरिका और चीन के रक्षा बजट के बाद है। 2018 में सऊदी अरब का रक्षा बजट 68 अऱब था। सऊदी अरब का रक्षा बजट सऊदी अरब के कुल जीडीपी का 9 प्रतिशत है। यही नहीं सऊदी अरब ने पिछले दस सालों में अपने रक्षा बजट में 26 प्रतिशत की बढोतरी की है। इसका सबसे ज्यादा लाभ अमेरिकी हथियार कंपनियों को मिला है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।