RSS 100 Years Celebration: 27 सितंबर 1925 को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। यह संघ का शताब्दी वर्ष चल रहा है। स्थापना के दिन के रूप में दशहरा का दिन चुना गया। विजयदशमी का पर्व सदैव अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक रहा है। यह वह दिन था जो भारत की सांस्कृतिक चेतना में समाहित है।
आज संघ की शाखाएं 68,000 से अधिक हैं, और शताब्दी वर्ष में लक्ष्य है एक लाख शाखाओं तक पहुंचना। देश भर में पथ संचलन की तैयारियां जोरों पर हैं। नागपुर में पारंपरिक पथ संचलन 27 सितंबर को होगा, जिसमें 10,000 स्वयंसेवक भाग लेंगे—जो शताब्दी की भव्यता दर्शाएगी।
अयोध्या में पहली बार विजयदशमी का कार्यक्रम आयोजित होगा, जहां राम पथ पर हजारों स्वयंसेवक मार्च करेंगे। संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले मुख्य उद्बोधन देंगे। यह स्थानांतरण प्रतीकात्मक है। अयोध्या, राम जन्मभूमि का प्रतीक, संघ की हिंदू एकता की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद नागपुर के मुख्य अतिथि होंगे, जो राष्ट्रीय स्तर पर इस आयोजन को गरिमा प्रदान करेगा।
देशभर में यह विशेष अवसर ऐतिहासिक बनाने की तैयारियां चल रही हैं। संघ ने 1,500 से 1,600 हिंदू सम्मेलनों का आयोजन किया है, जो हर क्षेत्र में सांस्कृतिक केंद्र बनेंगे। इनमें संत, विद्वान, युवा, महिलाएं और कारीगर शामिल होंगे। 'सामाजिक समरसता' अभियान के तहत एक लाख हिंदू सम्मेलन और घर-घर संपर्क अभियान चलेगा, जो विभिन्न हिंदू समुदायों को जोड़ेगा। बेंगलुरु, कोलकाता और मुंबई में डॉ. भागवत के व्याख्यान होंगे, जो शताब्दी की वैचारिक यात्रा को मजबूत करेंगे। ये कार्यक्रम केवल उत्सव नहीं, बल्कि संघ के मूल्यों-अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभक्ति-को पुनः प्रतिपादित करने का माध्यम हैं।
पिछले सरसंघचालकों के विजयदशमी उद्बोधनों ने संघ की वैचारिक नींव रखी। द्वितीय सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर (गुरुजी) ने 1956 के उद्बोधन में हिंदू समाज की एकता पर जोर दिया। वे कहते हैं- हिंदू राष्ट्र की अवधारणा जाति-भेद से ऊपर उठकर समग्र समाज को मजबूत बनाती है। उनके समय में संघ ने विभाजन के घावों को भरने का कार्य किया। तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने 1973 के बाद के उद्बोधनों में सामाजिक समानता को संघ का मुख्य लक्ष्य बताया। वे आरक्षण और दलित उत्थान पर कहते हैं- "संघ जातिवाद का विरोधी है, लेकिन सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध।
शताब्दी वर्ष में पथ संचलन का विशेष महत्व है। यह संघ की शारीरिक और वैचारिक शक्ति का प्रदर्शन है। नागपुर का पथ संचलन 5,000 से बढ़कर 10,000 स्वयंसेवकों का होगा, जो अनुशासन और एकता का संदेश देगा। अयोध्या में राम पथ पर मार्च राम जन्मभूमि के प्रति संघ की निष्ठा को साकार करेगा। ये संचलन केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि समाज को प्रेरित करने वाले आयोजन हैं। पूर्व सरसंघचालकों के समय से पथ संचलन संघ की पहचान बने, जो आज शताब्दी में नई ऊंचाइयों को छुएंगे।
संघ की शताब्दी यात्रा भारत के उत्थान की कहानी है। डॉ. हेडगेवार की दृष्टि से प्रारंभ होकर गुरुजी की वैचारिक मजबूती, बालासाहेब की सामाजिक समरसता और वर्तमान नेतृत्व की समावेशी पहुंच तक, संघ ने राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया। आपातकाल में जेल यात्राएं, आपदा राहत में सेवा, शिक्षा और स्वास्थ्य में योगदान ये सब संघ की परिपक्वता दर्शाते हैं। शताब्दी वर्ष में सामाजिक सद्भाव पर फोकस होगा, जहां गुजरात, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे क्षेत्रों में स्थायी परियोजनाएं शुरू होंगी।
विजयदशमी 2025 संघ के लिए नया अध्याय खोलेगा। सरसंघचालक का उद्बोधन स्वयंसेवकों को नई दिशा देगा, जो राष्ट्र को मजबूत बनाने का संकल्प लेगा। जैसा कि डॉ. भागवत कहते हैं- संघ की शाखा अपरिहार्य है।" यह शताब्दी न केवल संघ की, बल्कि पूरे भारत की परिपक्वता का उत्सव होगी। स्वयंसेवक, समाज और राष्ट्र सब मिलकर अधर्म पर विजय प्राप्त करेंगे।
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