साहिर ने अपनी पहली फिल्म
"आज़ादी की राह" में 4 गाने लिखे। फिल्म के बारे में कोई चर्चा नहीं हुई। गुमनाम होते साहिर की मुलाक़ात एसडी बर्मन से हुई। साहिर का अंदाज़ दादा को पसंद आया, शायद साहिर की कविता और मीटर की समझ की वजह से। अंग्रेजी गायिका कॉनी फ्रांसिस ने अपने एक गीत "नेवर ऑन अ संडे" के शुरू में आलाप लिया था जिस से इंस्पायर हो कर दादा बर्मन ने ट्यून बनाई थी और साहिर ने लिखा -
ठंडी हवाएं लहरा के आएं। यहां से दोनों के साथ काम करने की शुरुआत हुयी। बाद में बाज़ी फिल्म में दोनों पहली बार झगड़े थे।
साहिर इस बात से गुस्सा थे की दादा बर्मन ने एक ग़ज़ल को बार डांसर का गाना बना दिया वो भी वेस्टर्न धुन पर।गाना था -
तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले, अपने पे भरोसा हैं तो एक दांव लगा ले। खैर, दोनों ने साथ साथ कई सुपर हिट गीतों की रचना की। फिर आयी फिल्म फिल्म
"प्यासा"। निर्देशक गुरुदत्त की शुरूआती दौर की फिल्में हलकी फुलकी होती थी।
गुरुदत्त और साहिर की एक कॉमन समस्या थी, मोहब्बत। गुरु दत्त की गायिका गीता दत्त से शादी में कई दिक्कतें आई। फिर गुरुदत्त का वहीदा रहमान के प्रति झुकाव। और गुरुदत्त के मन में एक अमिट छाप छोड़ने वाले निर्देशक की ख्याति पाने का ख्वाब, सब कुछ साहिर की ज़िन्दगी से मिलता जुलता ही था। वैसे प्यासा के संगीत पर एक पूरी किताब लिखी जा सकती है। साहिर के अंदर छुपी कलाकार की अकड़, इस फिल्म के संगीत की सफलता से बाहर आ गई थी। साहिर ने लता मंगेशकर से एक रुपया ज़्यादा फीस की डिमांड करना शुरू कर दी थी। और साहिर ने प्यासा में दादा बर्मन से एक रुपया ज़्यादा लेने की ज़िद भी की थी।
प्यासा के इस गीत के फिल्मांकन ने इस गीत को हमेशा के लिए अमर कर दिया। असफल शायर विजय जो अपनी ही मृत्यु के पश्चात् अपनी स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में पहुंच जाता है और बालकनी के दरवाज़े पर खड़ा है, रौशनी पीछे से आ रही है, उसकी आकृति दिख रही है और शॉल लपेटे भूखा प्यासा शायर ज़िंदा है तो बरबस उसके मुंह से साहिर की तल्ख़ आह निकलती है। इस फिल्म के गाने लिखने में साहिर ने अपने आप को निचोड़ के रख दिया था।
वो ये साबित करने पर तुले हुए थे कि गीतकार की वजह से फिल्म का गाना हिट होता है। प्यासा से साहिर ने एक नया ट्रेंड शुरू किया था। उस ज़माने में धुन बनती थी, और लिरिसिस्ट उस पर फिट होने वाले शब्दों से गीत बनाते थे। प्यासा में साहिर ने एसडी बर्मन को सभी गानों के लिरिक्स पहले ही लिख कर दे दिए और उन्हें न चाहते हुए भी साहिर के बोलों के लिए संगीत देना पड़ा। इस फिल्म के बाद साहिर ने कभी एसडी बर्मन के साथ काम नहीं किया।
आज सजन मोहे अंग लगा लो (गीता दत्त)/ सर जो तेरा चकराए (रफ़ी)/ हम आपकी आंखों में (रफ़ी- गीता)/ जाने क्या तूने कही (गीता)/ जाने वो कैसे लोग थे (हेमंत कुमार)/ ये हंसते हुए फूल (रफ़ी)/ जिन्हें नाज़ है हिन्द पर (रफ़ी)/ तंग आ चुके हैं कश्मकशे (रफ़ी)/ ये कूचे ये नीलाम घर (रफ़ी) और सबसे खूंखार गीत है जिसकी रचना दादा बर्मन ने न्यूनतम वाद्य यंत्रों की मदद से की थी।
"ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया,
ये इंसा के दुश्मन समाजों की दुनिया.
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.
खूंखार इसलिए क्योंकि गाने का अंत होता है रफ़ी का तार सप्तक में ये गाना -
जला दो इसे, फूंक डालो ये दुनिया,
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है, तुम ही सम्भालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
साहिर की ज़िन्दगी में कई औरतें आई। कई बार उन्होंने मोहब्बत की। मगर अमृता प्रीतम जैसा प्यार उन्हें कभी हुआ नहीं, और शायद किसी और से किया भी नहीं। साहिर के चाहने वाले लाखों हैं। उनकी तल्खियों के दीवानों की कमी नहीं है। एक टूटे दिल के आशिक की कहानी लिखने में साहिर का कोई सानी नहीं था और हिंदुस्तान में हर इंसान या तो मोहब्बत कर रहा है या मोहब्बत में जूते खा रहा है। बस इसलिए साहिर का गुस्सा हम सबमें नज़र आता है।
कभी वहश की तरह, कभी ज़ुल्म की तरह और कभी बेगैरत इंसान की तरह। मौत के बाद भी साहिर को चैन नहीं था। जिस कब्रिस्तान में उसे दफनाया गया था, जब बाद में उसमें जगह नहीं बची तो वहां की कब्रें खोद दी गई और नई कब्रों को जगह दी गई।साहिर के साथ उस कब्रिस्तान में रफ़ी साहब और मधुबाला की भी कब्रें हुआ करती थी।
साहिर के गाने आज भी बेहतरीन उर्दू शायरी के नमूने माने जाते हैं। उन्होंने अपनी ग़ज़लों को फ़िल्मी गीतों की शक्ल भी दी मगर उस बात से न मजमून नहीं बदला और न गहराई कम हुई। अपनी ज़िन्दगी के आखिरी दिन टैक्सी वाले को रुकने का कह कर वो अपने दोस्त से मिलने उसके घर गए। टैक्सी वाला इंतज़ार करता रहा और साहिर ने अपने दोस्त की बांहों में दम तोड़ दिया। अपने आप से जूझते साहिर की ज़िन्दगी खुद ही लिखी होगी उसने
रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूं
मैंने जज़्बात निभाए हैं उसूलों की जगह
अपने अरमान पिरो लाया हूं, फूलों की जगह
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