सीनियर सिटीजन के मारे जाने की खबरें तेजी से बढ़ी हैं।
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क्या यह पहली घटना है या एकमात्र घटना है? शायद नहीं! खबरों में बहुत बार आता है एक बुजुर्ग पुरुष या बुजुर्ग महिला का उनके सेवक ने मर्डर कर दिया। कई बार तो यह सेवक पांच या इससे अधिक अवधि से उनके साथ काम कर रहे होते हैं, पर वह कब बदनीयत हो जाएं इसकी कोई गारंटी नहीं होती।
दिल्ली पुलिस ने पिछले दिनों यह अभियान चलाया था कि किसी भी कॉलोनी के नजदीक के थाने वाले पुलिसकर्मी अकेले रह रहें बुजुर्गों का हाल-चाल पूछने के लिए समय-समय पर उनके यहां जाते रहेंगे। इससे उनके सेवक और केयरटेकर को यह डर बना रहता है कि पुलिस की नजरों में तो हैं ही। यह अभियान अभी भी चल रहा है या नहीं इसकी जानकारी तो नहीं है पर, पुलिस द्वारा चलाया गया यह एक अच्छा अभियान था।
बुजुर्गों की सुरक्षा की जिम्मेदारी समाज और शासन की है।
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सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी
जिस तरह से बच्चे, महिलाएं और इनकी सुरक्षा हमारी और शासन की सामाजिक जिम्मेदारी है उसी तरह बुजुर्ग भी सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। एक समय इतने सक्रिय रहने वाले और उच्च व प्रतिष्ठित पदों पर रह चुके आज उम्र के तकाजे के कारण अशक्त और मजबूर हो जाते हैं। उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। यह सही है कि वह अपनी सहायता के लिए कोई सहायक रखते हैं पर, यह सहायक बहुत वेरीफिकेशन के बाद ही रखा जाए।
बुजुर्ग सबसे पहले उसकी पूरी जानकारी थाने में दें। डोमेस्टिक हेल्प देने वाली एजेंसिया एक अति विश्वसनीय व्यक्ति को ही बुजुर्गों के यहां भेजें। आजकल सभी कॉलोनियों के रहवासी संघ होते हैं। इनके सदस्य अकेले रहने वाले बुजुर्गों के पास नियमित मिलने जाते रहें। इसमें उनकी खुशी के साथ-साथ एक मानवीय कर्तव्य भी पूरा हो जाता है। बुजुर्गों की सुरक्षा समाज का एक ऐसा शुभ कार्य है जो हमें हमारे भविष्य के प्रति भी सचेत करता है।
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