अगर हर परंपरा को एक ही ढांचे में ढालने की कोशिश की जाएगी तो यह विविधता धीरे-धीरे खत्म हो सकती है।
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विश्वास हमेशा तर्क से नहीं चलता। कई बार वह तर्क से परे होता है। एक लोकतांत्रिक समाज में यह स्वीकार करना जरूरी है कि हर चीज को वैज्ञानिक या तर्कसंगत कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। जब तक कोई परंपरा सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य या नैतिकता को सीधा नुकसान नहीं पहुंचा रही, तब तक उसमें हस्तक्षेप सीमित रहना चाहिए।
सबरीमाला मामले में अनुच्छेद 25(2)(b) का भी बार-बार जिक्र किया गया। यह कहा गया कि मंदिर सभी ‘वर्गों’ के लिए खुले होने चाहिए, लेकिन यहां ‘वर्ग’ शब्द को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में समझना जरूरी है। यह प्रावधान मुख्य रूप से ‘छुआछूत’ जैसी सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए लाया गया था, जैसा कि अनुच्छेद 17 में भी स्पष्ट है। इसे सीधे ‘लैंगिक समानता’ से जोड़ देना क्या उसके मूल उद्देश्य को बदलना नहीं है?
सबरीमाला में महिलाओं के एक विशेष आयु वर्ग का प्रवेश निषेध कई लोगों को भेदभाव लगता है, लेकिन उस संप्रदाय के भीतर इसे देवता के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ स्वरूप के सम्मान के रूप में देखा जाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या हर धार्मिक परंपरा को एक ही तरह के ‘समानता’ के पैमाने से मापा जाना चाहिए? राज्य की भूमिका यहां बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील हो जाती है। उसे परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाना होता है। धार्मिक संस्थानों के प्रशासनिक और आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप करना एक बात है, लेकिन उनके मूल धार्मिक आचरण में दखल देना दूसरी बात। क्या राज्य को नियंत्रक बनना चाहिए, या एक संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए?
इतिहास बताता है कि धार्मिक सुधार तब ज्यादा प्रभावी और स्वीकार्य होते हैं, जब वे समाज के भीतर से आते हैं। बाहर से थोपी गई बातें अक्सर असंतोष और विरोध को जन्म देती हैं। सबरीमाला के मामले में भी कई महिला भक्त स्वयं परंपरा के पक्ष में थीं। यह स्थिति अपने आप में अनोखी थी, जहां जिनके अधिकार की बात हो रही थी, वे ही उस परंपरा के साथ खड़ी नजर आईं। यह दिखाता है कि यह मामला केवल अधिकारों का नहीं, बल्कि आस्था और दृष्टिकोण का भी था। न्यायपालिका की मर्यादा इसी में है कि वह ‘संवैधानिक नैतिकता’ को लागू करते समय ‘धार्मिक नैतिकता’ को भी समझे। संवैधानिक मूल्यों का उद्देश्य विविधता को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे संतुलित करना होना चाहिए।
भारत एक बहुवादी समाज है। यहां विविधता ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। अगर हर परंपरा को एक ही ढांचे में ढालने की कोशिश की जाएगी तो यह विविधता धीरे-धीरे खत्म हो सकती है। आज यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि क्या कुछ समूह जनहित याचिकाओं का उपयोग अपने विचारों को लागू करने के लिए कर रहे हैं? जब याचिकाकर्ता स्वयं उस आस्था से जुड़े नहीं होते तो उनकी मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या यह न्यायिक सक्रियता है या फिर न्यायिक अतिक्रमण?
सबरीमाला का विवाद हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों का तंत्र नहीं है, बल्कि यह विश्वास, विविधता और सह-अस्तित्व का भी आधार है। अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों को जो स्वायत्तता दी गई है, उसे ‘सुधार’ के नाम पर कमजोर करना क्या सही होगा?
न्यायपालिका को अपनी सीमाओं को समझना होगा। उसे उन क्षेत्रों में जाने से बचना चाहिए, जहां तर्क खत्म हो जाता है और आस्था शुरू होती है। एक मजबूत और आधुनिक भारत के लिए जरूरी है कि वह प्रगति करे, लेकिन अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों को भी साथ लेकर चले। सबरीमाला का मुद्दा केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। यह उस संतुलन का प्रश्न है, जहां संविधान और आस्था दोनों एक साथ, सम्मानपूर्वक आगे बढ़ सकें।
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