सास बहू का परस्पर रिश्ता किसी भी परिवार का मूल आधार है।
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सास बहू का परस्पर रिश्ता किसी भी परिवार का मूल आधार है। आधे से अधिक परिवार इसलिए टूट रहे हैं क्योंकि सास ने बहू को बेटी और बहू ने सास को मां मानने से इंकार कर दिया है। सास को बहू पराये घर से आई लगती है और बहू को ससुराल पराया लगता रहता है। बाकी कसर टीवी पर दिखाए जाने वाले सीरियलों ने पूरी कर दी है।
घर-घर की कहानी दिखाकर यही बताने और सिद्ध करने की कोशिश की गई है कि घर-परिवार की महिलाओं में परस्पर विवाद होते हीं रहते हैं। द्वेष और ईर्ष्या से भरी परिवार की महिलाएं एक दूसरे की टांग खींचती रहती हैं। इतना ही नहीं बल्कि घर के पुरुष भी इसी में लिप्त हैं।
दरअसल, सहनशीलता और परस्पर सहयोग की बात तो परिवार में दिखाई ही नहीं देती। ऐसे परिवार का चित्रण न तो मनोरंजक हो सकता है और न ही कोई सकारात्मक संदेश देता है। लेकिन महिलाओं ने इसे जी भरकर देखा क्योंकि वह शायद मानती हैं कि सास-बहू और परिवार की अन्य महिलाओं के बीच मधुर संबंध हो ही नहीं सकते। परिवार में शांति व सव्यवहार का माहौल इस कटु व्यवहार से कैसे संभव है। महिलाएं अब यही चाहती हैं कि यदि सुख व शांति पाना है तो परिवार से अलग होकर ही इसे पाया जा सकता है।
घर-घर की कहानी निर्मात्री एकता कपूर द्वारा निर्मित सीरियल की तरह न होकर बल्कि जैनाचार्य श्री विजयरत्न सूरीश्वर द्वारा वर्णित उस घटना की तरह होना चाहिए जिसमें सास अपनी बहू की सेवा से इतनी अभिभूत है और उसके प्रति इतनी कृतज्ञ है कि वह उसकी सेवा से उऋण होना चाहती है।
यही वह प्रेम, स्नेह और त्याग है जो परिवारों को जोड़ता है और उनमें शांति लाता है। भारतीय समाज में अभी भी कुछ परिवार आदर्श हैं। वह संयुक्त परिवार है और पश्चिम वाले उन्हें देखकर अभिभूत हो जाते हैं।
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