युद्ध की तरफ बढ़तीं दो महाशक्तियां
- फोटो : Agency
नाटो पर अटका तार
पड़ोसी देश होने की वजह से और सोवियत संघ के विघटन से पहले तक उसका हिस्सा रहने वाले यूक्रेन को लेकर अगर रूस वहां के नागरिकों की अस्मिता की लड़ाई में उनका साथ देता रहा है तो इसे वह अपना नैतिक दायित्व भी बताता है। लेकिन कूटनीतिक जानकार लगातार ये भी कहते आए हैं कि अमेरिका पूर्वी यूक्रेन में नाटो के सैन्य ठिकाने बनाकर अप्रत्यक्ष रूप से रूस पर नजर रखना चाहता है जिसे रूस जानता है और इसीलिए वह लगातार नाटो का विरोध करता है और इसकी जरूरत पर सवाल उठाता है।
नाटो का गठन सोवियत संघ के ज़माने में हुआ था, लेकिन रूस का तर्क है कि जब सोवियत संघ ही नहीं रहा तो नाटो की जरूरत क्यों है। इसे भंग कर दिया जाना चाहिए। जबकि अमेरिका कूटनीतिक तौर पर नाटो के बहाने तमाम देशों में फैली अलगाववादी गतिविधियों को रोकने के लिए शांति सैनिक भेजकर अपना वर्चस्व बनाए रखने की रणनीति पर चलता रहा है।
अब रूस के इन दोनों प्रांतो पर कब्जा कर लेने के बाद वहां जश्न भी मनाए जा रहे हैं और इन प्रांतों के लोग भी इस बात से खुश नजर आ रहे हैं कि अब यहां अलगाववादी गुटों और यूक्रेन की सेना के बीच पिछले आठ साल से चल रही गोलाबारी और हमले बंद हो जाएंगे, इलाके में शांति रहेगी और रूस की सेना होने की वजह से वे सुरक्षित रहेंगे।
रूस जानता है कि इस कदम के बाद यूरोपीय देश और पश्चिम के तमाम देश उसपर आर्थिक प्रतिबंध लगाएंगे, कई तरह की बंदिशें लगेंगी, उसपर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन के आरोप भी लगेंगे, लेकिन इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। जिस तरह उसने 2014 में क्रीमिया को कब्जे में लिया था, उसी तरह इस बार भी उसने इन दोनों प्रांतों को स्वायत्त घोषित कर और वहां के अलगाववादी गुटों से समझौता कर अपना मकसद हासिल कर लिया है और अमेरिका के मंसूबों को फिलहाल नाकाम कर दिया है।
दो महाशक्तियों के युद्ध में भारत का क्या रुख?
हालांकि अमेरिका जिस तरह लगातार ये चेतावनी दे रहा है कि रूस यूक्रेन पर कभी भी हमला कर सकता है, उससे दहशत और असमंजस की स्थितियां बनी हुई है और भारत समेत तमाम देश अपने अपने नागरिकों को वहां से वापस बुलाने की शुरुआत कर चुके हैं। यूक्रेन में रहने वाले 20 हजार भारतीय भी वापस आ रहे हैं। भारत ने साफ कह दिया है कि सबसे पहले अपने नागरिकों की सुरक्षा उसके लिए अहम है।
सुरक्षा परिषद में भी भारत लगातार अपना रुख साफ करता रहा है कि तमाम मसलों का हल मिल बैठकर शांति से होना चाहिए। यूक्रेन के मसले पर भी यही होना चाहिए। भारत के रूस और अमेरिका दोनों से ही करीबी व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्ते हैं और जाहिर है भारत अपने रिश्तों से कोई समझौता नहीं कर सकता।
पिछले करीब दो महीनों से बनी इस स्थिति का यह निर्णायक दौर है और यूक्रेन लगातार खबरों में है। वैसे भी युद्ध और अशांति के साथ साथ दो महाशक्तियों के टकराव की खबरों में हमेशा लोगों की दिलचस्पी रही है और वह भी तब जब मामला दो महाशक्तियों के बीच चल रही वर्चस्व की जंग का हो और गरजते हथियारों का। यूक्रेन अभी कुछ समय तक सुर्खियों में बना रहेगा और भारत में चुनावी गहमा गहमी के बीच भी यह खबर लोगों में दिलचस्पी पैदा करती रहेगी।