बढ़ती गर्मी के पीछे कई परतें हैं। सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है, जो अब किसी बहस का विषय नहीं, अपितु एक कड़वी सच्चाई बन चुका है। वायुमंडल में बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें धरती को एक ऐसे जाल में फंसा रही हैं, जहां गर्मी बाहर नहीं निकल पाती। इसके साथ ही ‘एंटी-साइक्लोनिक सर्कुलेशन’ जैसी मौसमीय स्थितियां हवा को नीचे दबाकर और गर्म कर देती हैं। अल नीनो प्रभाव भी इस बार सक्रिय रहा है, जिसने मानसून के पैटर्न को बिगाड़ दिया है। सूखी, गर्म हवाओं को और तेज कर दिया है। शहरों में बढ़ता कंक्रीट, घटते पेड़ और बेतरतीब निर्माण ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का रूप ले चुके हैं, जहां रात में भी गर्मी कम होने का नाम नहीं लेती।
जब तापमान 45 डिग्री के पार जाता है तो यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि एक स्वास्थ्य आपातकाल बन जाता है। हीट स्ट्रोक का खतरा तेजी से बढ़ता है, जिसमें शरीर की तापमान नियंत्रित करने की क्षमता जवाब देने लगती है। इससे मस्तिष्क, हृदय और किडनी तक प्रभावित हो सकते हैं। अत्यधिक पसीने के कारण शरीर में पानी और नमक की कमी हो जाती है, जिसे डिहाइड्रेशन कहा जाता है। इसके लक्षण चक्कर आना, थकान, मांसपेशियों में ऐंठन आम होते जा रहे हैं। सबसे ज्यादा खतरे में वे लोग हैं, जो खुले में काम करते हैं, जिनके पास गर्मी से बचने का कोई विकल्प नहीं है।
भीषण गर्मी से लड़ाई में सबसे पहला कदम सतर्कता है। प्यास न लगने पर भी लगातार पानी या तरल पदार्थ लेते रहें। ओआरएस, नींबू पानी, छाछ और नारियल पानी शरीर को संतुलित रखते हैं। दोपहर 12 से 4 बजे के बीच बाहर निकलने से बचें। हल्के, ढीले और सूती कपड़े पहनें। सिर को कपड़े या टोपी से ढककर रखें। भोजन में भारी और तला-भुना कम करें। तरबूज, खीरा जैसे पानी से भरपूर फल शामिल करें। अगर चक्कर, घबराहट या बेहोशी महसूस हो तो इसे हल्के में न लें, तुरंत ठंडी जगह जाएं और चिकित्सा सहायता लें।
अक्सर हम सोचते हैं कि पर्यावरण बचाना केवल सरकार का काम है, लेकिन सच्चाई यह है कि सबसे बड़ा बदलाव आम नागरिक ही ला सकता है। बिजली की बचत करें, खासकर पीक समय में। छतों पर सोलर पैनल और वर्षा जल संचयन अपनाएं। घर और बालकनी या छत पर पौधे लगाएं। निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें। ये छोटे-छोटे कदम मिलकर बड़े बदलाव की नींव रखते हैं। साथ ही, सरकार के स्तर पर अब समय केवल योजनाएं बनाने का नहीं, अपितु उन्हें जमीन पर उतारने का है।
सरकार को ‘हीट एक्शन प्लान’ को सख्ती से लागू करना होगा। शहरों में ‘अर्बन फॉरेस्ट’ विकसित करना, सार्वजनिक परिवहन को इलेक्ट्रिक बनाना और इमारतों में ‘कूल रूफ’ तकनीक को बढ़ावा देना जरूरी है। सार्वजनिक जगहों पर पेयजल, छायादार शेल्टर और अस्पतालों में विशेष ‘हीट वार्ड’ की व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही, जल निकायों को बचाना और अतिक्रमण हटाना भी प्राथमिकता में होना चाहिए।
आज की यह भीषण गर्मी केवल एक मौसम की घटना नहीं है, यह प्रकृति का संदेश है। अगर हमने अब भी अपनी जीवनशैली, उपभोग और पर्यावरण के प्रति अपने रवैये पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले साल और भी ज्यादा कठिन होंगे। हमें यह समझना होगा कि विकास और प्रकृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। असली विकास वही है, जो संतुलन बनाए। अंत में सवाल केवल गर्मी का नहीं है, अपितु यह हमारे अस्तित्व का सवाल है।
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