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दूसरा पहलू: 1857 की क्रांति और आगरा का पागलखाना... आज यहां समाज से ठुकराए लोग भविष्य का ताना-बाना बुनते हैं

Fri, 21 Mar 2025 08:33 AM IST
ज्योति भास्कर भूपेंद्र कुमार

सार

डेढ़ सौ साल पुराने मानसिक स्वास्थ्य संस्थान, आगरा में फिल्मों की तरह नहीं, बल्कि आधुनिक तरीके से इलाज होता है।
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आगरा मनश्चिकित्सा संस्थान से जुड़ा इतिहास बेहद रोचक - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अठारहवीं सदी के विशाल दरवाजे से प्रवेश करते समय लातिन अमेरिकी कथाकार ग्रैबियल गार्शिया मारखेज की मनोरोगियों की पृष्ठभूमि पर लिखी बेचैन करने वाली कहानी, मुझे तो बस एक कॉल करनी थी, जहन में तैरने लगती है। सामने 172 एकड़ में औपनिवेशिक काल की इमारतों वाला हरा-भरा कैंपस है। आगरा के प्रख्यात मानसिक स्वास्थ्य संस्थान एवं चिकित्सालय के निदेशक डॉ. दिनेश राठौड़ कहते हैं, 150 साल से ज्यादा पुराने इस संस्थान ने नए तौर-तरीकों को तेजी से अपनाया है।

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हमें गुजरे दौर में लौटना होगा
फिल्मों में मानसिक रोगियों के इलाज को जिस तरह से दिखाया जाता है, वैसा कुछ अब नहीं है। यह आम अस्पताल की तरह है। ओपीडी में रोजाना लगभग 250 मरीज आते हैं। स्थायी मरीजों में ज्यादातर कुछ हफ्तों में ठीक होकर चले जाते हैं। जिनका परिवार नहीं है, वे यहां रहते हैं और फिर पुनर्वास संगठनों की मदद से बेहतर जीवन गुजारते हैं। इलेक्ट्रिक चेयर पर बिजली के झटके जैसा कोई इलाज यहां नहीं है। तो फिर उस अंग्रेज लेफ्टिनेंट गवर्नर जॉन रसेल कॉल्विन की क्या कहानी है, जो 1857 की क्रांति में पागल हो गया था और उसकी कब्र आगरा फोर्ट में दीवान-ए-आम के सामने है। इसके लिए हमें गुजरे दौर में लौटना होगा।

क्रांति के दौरान लेफ्टिनेंट गवर्नर कॉल्विन का संतुलन बिगड़ा
आगरा में 1859 में पागलखाना बनाने की तात्कालिक वजह नॉर्थ वेस्ट प्रोविंस एंड अवध, जिसका मुख्यालय आगरा था, के लेफ्टिनेंट गवर्नर कॉल्विन का क्रांति के दौरान की परिस्थितियों की वजह से पागल होना था। उन्हें यहां कभी भर्ती नहीं किया गया। उनकी मौत की तात्कालिक वजह 9 सितंबर, 1857 को हैजे से हुई बताई गई। बाद में ब्रिटिश सरकार को लगा कि क्रांति से प्रभावित अंग्रेजों के इलाज के लिए आगरा में मानसिक संस्थान बनना चाहिए। इस संस्थान में भर्ती होने वाली पहली मरीज एक भिखािरन थी। उस समय आईजी जेल ही इसके प्रमुख होते थे।
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डॉ. केसी दुबे की पहल ने पूरी दुनिया का ध्यान आगरा की ओर खींचा
1904 में लखनऊ का पागलखाना बंद कर इसके मरीजों  और रिकॉर्ड को आगरा शिफ्ट कर दिया गया, ताकि एक ही जगह बेहतर सुविधाएं मिल सकें। इसी साल आईजी जेल की जगह डॉ. काकरन को पहला मेडिकल सुपरिटेंडेंट बनाया गया। 1957 में संस्थान के प्रमुख डॉ. केसी दुबे की पहल ने पूरी दुनिया का ध्यान आगरा की ओर खींचा। यह था मानसिक मरीजों के वार्ड खुले रखना। 1995 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे स्वायत्तशासी निकाय बना दिया और मेंटल हॉस्पिटल की जगह नया नाम दिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड हॉस्पिटल। ...और आज यहां खिली धूप में अपनों और समाज से ठुकराए लोग भविष्य का ताना-बाना बुनते हैं।

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