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26 जनवरी गणतंत्र दिवस विशेष: बच्चों को मिलना चाहिए उनके अधिकार

सार

देश के संविधान को अस्तित्व में आए 72 साल हो गए हैं लेकिन एक वाजिब सवाल जो कई वर्षों से उठता रहा है, वह यह है कि क्या हम एक देश के रूप में उन मूल उद्देश्यों और लक्ष्यों को पाने में सफल रहे हैं जिसकी प्रत्याशा हमारे संविधान निर्माताओं ने उस वक़्त की थी जब वे देश के संविधान को तैयार कर रहे थे?
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अगर देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर होना है,तो इन शोषित एवं शिक्षा से दूर बच्चों को सामाजिक न्याय और सुरक्षा के घेरे में लाना होगा। - फोटो : istock
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विस्तार
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भारत जैसे सांस्कृतिक विविधताओं वाले देश में आखिर ऐसी कौन सी शक्ति है जो भारतवासियों को एक सूत्र में बांधे रखती है? इसका जवाब है भारत का संविधान। यह भारत का संविधान ही है जो देश के प्रत्येक नागरिक को समान धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता और सुरक्षा प्रदान करता है।

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आज देश उसी संविधान के प्रभावी रूप से अस्तित्व में आने वाले दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मना रहा है। उल्लेखनीय है कि 26 जनवरी 1950 को अधिकृत रूप से संविधान को लागू किया गया था। 
 

देश के संविधान को अस्तित्व में आए 72 साल हो गए हैं लेकिन एक वाजिब सवाल जो कई वर्षों से उठता रहा है, वह यह है कि क्या हम एक देश के रूप में उन मूल उद्देश्यों और लक्ष्यों को पाने में सफल रहे हैं जिसकी प्रत्याशा हमारे संविधान निर्माताओं ने उस वक़्त की थी जब वे देश के संविधान को तैयार कर रहे थे?

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इसका जवाब संभवत: ‘नहीं’ में होगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि देश अभी भी संविधान की मूल भावना को पूर्ण रूप से धरातल पर उतारने में नाकामयाब रहा है। ऐसा तब संभव हो पाएगा जब देश का हर नागरिक संविधान से मिले अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो।


बच्चों की दुनिया और हमारा संविधान 

 

जब हम बच्चों की बात करते हैं, तो आज भी उनका एक बड़ा वर्ग शोषित और वंचित है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 (3) राज्य को बच्चों के सशक्तिकरण का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21(ए) 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करता है। ऐसे ही बाल श्रम और पॉक्सो  जैसे कई कानून हैं जो बच्चों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। 


विडंबना तो यह है कि ऐसे ही बच्चे हाशिए पर हैं जो संविधान में उल्लिखित अपने अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा कानूनों से अपरिचित हैं और अज्ञानता एवं जागरुकता के अभाव में बाल श्रम, बाल विवाह एवं बाल यौन शोषण के दलदल में लगातार धंसते जा रहे हैं।

अगर देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर होना है,तो इन शोषित एवं शिक्षा से दूर बच्चों को सामाजिक न्याय और सुरक्षा के घेरे में लाना होगा। इसके लिए अनिवार्य रूप से देश अपनी पूर्व की गलतियों पर आत्ममंथन करे। 

इस प्रश्न का जवाब ढूंढने का प्रयास करे कि आखिर क्यों हमारे बच्चे मौजूदा सामाजिक ढांचे में अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित रह जा रहे हैं। बच्चों को उचित शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषित भोजन मिले इसको सुनिश्चित करके इस ओर बढ़ा जा सकता है। बच्चों और उनके परिवारों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करके भी इस लक्ष्य को साधा जा सकता है।

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देश की आबादी के एक बड़े वर्ग बच्चों को उनके अधिकारों से लैस किया जाना चाहिए। - फोटो : istock
2011 की जनगणना के अनुसार देश की कुल आबादी का 40 प्रतिशत बच्चों की आबादी थी, जिसमें आधिकारिक रूप से 1 करोड़ बाल श्रमिक थे, जबकि गैर सरकारी संगठनों ने 5 करोड़ बाल श्रमिक होने का आकलन किया था। कोरोनाकाल में बाल दुर्व्याकपार (ट्रैफिकिंग), बाल श्रम और चाइल्ड पोर्नोग्राफी के मामलों में अप्रत्याशित इजाफा हुआ है। 


कोरोना काल और गणतंत्र दिवस 

आज देश जब कोरोना काल में गणतंत्र दिवस की 72वीं वर्षगांठ मना रहा है, तो यह प्रश्न खड़ा होता है कि इतने सारे क़ानूनों के बावजूद भी हमारे बच्चे सुरक्षित क्यों नहीं हैं? ऐसे में उनको और अधिकार देने के लिए एक सशक्त कानून अहम भूमिका निभा सकता है। विशेष रूप से कॉम्प्रीहेंसिव ट्रैफिकिंग कानून,जो अभी संसद में लंबित है उसे पारित कराना समय की मांग है। यह कानून ट्रैफिकिंग को खत्मब करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। 

गौरतलब, है कि इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु नोबेल शांति पुरस्कार से सम्माबनित बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने पिछले संसद सत्र के दौरान कई सांसदों और नीति निर्माताओं से अपील की थी कि ट्रैफिकिंग के कानून को अविलंब बिना किसी गतिरोध के संसद से पारित किया जाना चाहिए। कई सांसदों ने सत्यार्थी की इस मुहिम का समर्थन भी किया था। 

सत्यार्थी का संगठन कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रे न्सत फाउंडेशन (केएससीएफ) नेदेशभर के 20 राज्योंस के 410 से अधिक जिलों में सरकार और प्रशासन के साथ मिलकर बच्चों  के साथ हाल में (26 नवंबर 2021 को) संविधान दिवस मनाया था। इसमें बड़े पैमाने पर दूर-दराज के अति पिछड़े इलाके में रहने वाले बच्चों से लेकर आदिवासी, वंचित और हाशिए के बच्चे भी शामिल हुए थे। इस मौके पर 5 करोड़ से जायदा बच्चों ने संविधान का पाठ किया था। 

हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि देश की आबादी के एक बड़े वर्ग बच्चों को उनके अधिकारों से लैस करें,जिससे कि वे राष्ट्र के विकास में अपनी अहम भूमिका निभाएं और एक सशक्त और सम्पन्न राष्ट्र का निर्माण करें।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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