विश्व के रंगमंच पर पहला गणतंत्र देने वाले देश भारत में संविधान लागू हुए 72 साल हो चुके हैं।
- फोटो : facebook/University of Rajasthan, Jaipur
भारतीय गणतंत्र के सामने आने वाली चुनौतियों को संविधान सभा के समक्ष संविधान प्रस्तुत करते हुए डॉ. अंबेडकर ने कहा था -
"हम लोकतांत्रिक प्रणाली के रूप में राजनीतिक समता के युग में प्रवेश कर रहे हैं, लेकिन सामाजिक और आर्थिक समता प्राप्त करने में असफल रहते हैं, तो हमारा लोकतंत्र भी ख़तरे में पड़ सकता है।"
दरअसल, यह बात उन्होंने दुनिया भर के लोकतंत्र के अनुभवों के आधार कही थी । लोकतांत्रिक देश में सामाजिक-आर्थिक असमानता बनी रहती है तो राजनीतिक समता को भी निगल लेती है, भले ही औपचारिक और कानूनी तौर पर राजनीतिक समता बरकरार रहे। आज का भारत काफी हद तक इसकी पुष्टि करता है ।
आज हमारा संविधान विभन्न बीमारियों से ग्रसित हो गया है। भ्रष्टाचार , बलात्कार , प्रदूषण , जनसंख्या नियंत्रण जैसे अनेक समस्याओं ने भारत माँ को लहूलुहान कर दिया है। आज भी हमारा गणतंत्र कितनी ही कंटीली झाड़ियों में फंसा हुआ प्रतीत होता है। अनायास ही हमारा ध्यान गणतंत्र की स्थापना से लेकर 'क्या पाया, क्या खोया' के लेखे-जोखे की तरफ खींचने लगता है।
इस ऐतिहासिक अवसर को हमने मात्र आयोजनात्मक स्वरूप दिया है, अब इसे प्रयोजनात्मक स्वरूप दिए जाने की जरूरत है।
बी. आर. अम्बेडकर ने भी समस्याओं के समाधान हेतु कानून लाने के बारे में कहा था-
"क़ानून व व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़ने लगे तो दवा जरूर देनी चाहिए।”
संविधान और महिलाओं के अधिकार
अपनी ममता से देश का बचपन संवारने वाली महिलाओ के साथ हो रहे अनेक प्रकार की हिंसा से उन्हें घायल कर दिया जाता है। एक तरफ लड़कियां भारत का नाम विश्व मंच पर रौशन कर रही हैं तो वहीं दूसरी ओर महिलाओं का बलात्कार किया जाता है , तेजाब फेंक उन्हें झुलसाया जाता है और दहेज के लिए मार दिया जाता है।
क्या सच में संविधान में जो अधिकार महिलाओं को मिले है उनको अब तक मिल पाया है ? आखिर विवशता की आग में कब तक जलती रहेगी महिलाएं ! तमाम चीजें सवाल बनकर संविधान के समक्ष खड़ा है। कब तक महिलाओ को वो सामाजिक अधिकार मिलेगा जो संविधान ने दिए हैं ?
राजनीतिक व्यवस्था से समाज में चुस्त, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासित कानून बनाया जाए और प्रत्येक नागरिक चाहे जो कोई हो, गरीब हो या अमीर, सेवादार या किसान सब अपनी प्रत्यक्ष संपत्ति जायदाद का खुलासा करें कि जो भी चल-अचल धन है, वही है और अप्रत्यक्ष कहीं भी देश या विदेश में मिलने पर ज़ब्त होगा तो सज़ा मिलेगी। हमारी ज़्यादातर प्रतिबद्धताएं व्यापक न होकर संकीर्ण होती जा रही हैं जो कि राष्ट्रहित के खिलाफ हैं।
राजनैतिक मतभेद भी नीतिगत न रह कर व्यक्तिगत होते जा रहे हैं। जनतंत्र-गणतंत्र की प्रौढ़ता को हम पार कर रहे हैं लेकिन आम जनता को उसके अधिकार, कर्तव्य, ईमानदारी समझाने में पिछड़े, कमजोर, गैर जिम्मेदार साबित हो रहे हैं। चूंकि स्वयं समझाने वाला प्रत्येक राजनीतिक पार्टी और उसके नेता स्वयं ही कर्तव्य, ईमानदारी से अछूते व गैर-जिम्मेदार हैं, इसलिए असमानता की खाई गहराती जा रही है और असमानता की बराबरी बढ़ गई है। जबकि बराबरी के आधार पर ही समाज की उत्पत्ति हुई थी।
आखिर आजादी के 7 दशक बाद भी महिलाएं अपने अधिकार से क्यों वंचित हैं?
- फोटो : pixabay
हमारा संविधान और चुनौतियां
भ्रष्टाचार वह जहर है जिसने पूरी मानवता व नैतिकता को स्वाहा कर दिया है। जिस देश मे दूध की नदियां बहती थी , वहाँ आज भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहती है। संविधान लागू होने के सात दशक बाद भी हमारे संविधान के तीन आधारभूत स्तम्भों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार का काला साया मंडरा रहा है। पूरी व्यवस्था प्रदूषित होती जा रहा है।
आज आजाद हुए 7 दशक पार कर गए, अब तक हमने बहुत कुछ हासिल किया है, वहीं हमारे इन संकल्पों में बहुत कुछ आज भी आधे-अधूरे सपनों की तरह हैं। भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सांप्रदायिक वैमनस्यता, कानून-व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तमाम क्षेत्र हैं जिनमें हम आज भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर पाए हैं।
हाल फिलहाल में नई शिक्षा नीति के अंतर्गत मातृभाषा लो लेकर शिक्षा क्षेत्र में चर्चा शुरू होती रही है, तो दशकों से अनुत्तरित सवाल फिर सामने खड़ा होता है कि हमारी राष्ट्रभाषा कौन-सी है? अफसोस इस बात का है कि इसके जबाब में हमारी सरकार मौन धारण कर लेती है। इसका जवाब न ही जनता के पास है और न ही सरकार के पास। क्योंकि विविधताओं के इस देश मे भाषाओं के विविधता भी देश के सांस्कृतिक खूबसूरती में चार चांद लगाता है।
संविधान ने हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दे दिया लेकिन उसे राष्ट्रभाषा बनाने का सपना अभी भी अधूरा है। राष्ट्रभाषा का जबाब अब भी वक्त के गर्भ में छुपा हुआ है।
समस्याओं की कड़ी में भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में पर्यावरणीय समस्याएं मुँह बाए खड़ी हैं। पर्यावरण प्रदूषण पृथ्वी के प्राणियों के मानवता को मंथित कर रहा हैं। यह स्थानीय ही नहीं बल्कि विश्व व्यापी समस्या बन कर पृथ्वी को ही नष्ट कर रही है। भारत का संविधान और कानून पर्यावरण संरक्षण की भी बात करता है ,जरूरत है इस पर अमल करने की।
मनुष्य और पृथ्वी को बचाने के लिए उस परम्परा की ओर लौटना होगा, जहां मनुष्य और प्रकृति में सामंजस्य हों , विरोध नहीं। जीवन दृष्टि प्रकृति के विवेकशील इस्तेमाल की हो , लूट खसोट की नहीं। पर्यावरण की संस्कृति पर आधारित जीवन पद्धति और जीवन दृष्टि की ओर लौटने की जरूरत होगी।
संविधान हमारे लोकतंत्र का मार्गदर्शक है, तो चुनाव इस लोकतंत्र का आधार तैयार करता है और इस आधार को मजबूत करने के लिए आजाद भारत कई चुनाव सुधारों का गवाह बन चुका है। सार्वभौमिक मताधिकार, नोटा का विकल्प, महिलाओं और सामाजिक रूप से निर्बल समूहों के लिए चुनावों में आरक्षण जैसी कई पहल से हमने अपनी चुनाव प्रणाली को सुधारने के प्रयास किए हैं, लेकिन 17 आम चुनाव और सैकड़ों विधानसभा चुनावों के वाद भी काले धन, चुनावी हिंसा, राजनीति के अपराधीकरण, ओपिनियन पोल, पेड न्यूज, फेक न्यूज, चुनावी धांधलियां जैसी चुनौतियां आज भी विद्यमान हैं।
ईवीएम की जगह वैलट पेपर का तर्क इस आधार पर जोर पकड़ रहा है कि कई चरणों में हो रहे मतदान से लंबी होती जा रही चुनाव प्रक्रिया में ईवीएम की समय बचाने वाली उपयोगिता के कोई खास मायने नहीं रह गए हैं। चुनाव खर्च काफ़ी महंगा हो चुका है जिसका समाधान निकालना भी जरूरी हो गया है। इसका समाधान वन नेशन , वन चुनाव से किया जा सकता है। जिस पर आये दिन विचार-विमर्श होते रहता है।
सामाजिक सौहार्दपूर्ण संस्कृति भारत की अतीत से ही इतिहास रहा है। आज जिस तरस से नागिरकता बिल के विरोध में देश जल रहा है और सरकार द्वेष को खत्म करने में नाकाम है वो भी एक प्रकार से साम्प्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ रहा है जो कि देश के संविधान की मूल भावना पर चोट है।
समाजवादी मूल्यों से प्रभावित एक समतावादी समाज की कल्पना और उसे तैयार करने के हमारे संकल्प सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक तीनों स्तर पर अब तक पूर्णतः सफल नहीं रहे। सामाजिक न्याय के लिए कदम तो उठाए पर सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की जरूरत को भूल कर।
हमने सिर्फ और सिर्फ आरक्षण की राजनीति से सामाजिक न्याय को परिभाषित करना चाहा। नतीजतन, समाज टुकड़े-टुकड़े में विखंडित हो गया। एक कवि की पंक्ति में - "आकाश का आँचल सितारा ही रहेगा, यह देश है हमारा, हमारा ही रहेगा।"
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।