रानी दोनों हाथों से तलवार चलाने में पारंगत थीं। उन्होंने घोड़े की बाग दांतों में दबा कर अंग्रेजी सेना के होश उड़ाने का काम किया।
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झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के तीन प्रिय घोड़े थे जिनके नाम सारंगी, बादल और पवन थे। अपने अंतिम युद्ध के समय रानी जिस घोड़े पर सवार थीं उसका नाम बादल था। रानी के अंग्रेजों से हुए अंतिम युद्ध में नवाब अली बहादुर उनके साथ थे। भोपाल की बेगम का एक एजेंट भवानी प्रसाद जो उस समय मध्य भारत के अंग्रेजी एजेंट सर रॉबर्ट हैमिल्टन की छावनी में था, उसने रानी के अंतिम युद्ध और रानी की 17 जून को मृत्यु के समाचार को, एक पत्र के माध्यम से 18 जून को बेगम को सूचना दी थी।
हालांकि कुछ इतिहासकार उनके इस पत्र में लिखी कई बातों को पूर्णता सत्य नहीं मानते अपितु इससे इतना तो पता चलता है कि रानी के अंतिम युद्ध में बांदा नवाब अली बहादुर उनके साथ थे। रानी की कालपी से ग्वालियर तक की यात्रा ह्यूरोज के लिए आश्चर्यचकित करने वाली थी। उसके अनुमान से कहीं ज्यादा थी रानी की वीरता। ह्यूरोज के बहादुरपुर तक बढ़ आने की खबर के बाद 16 जून को सेना की कमान तात्या टोपे ने संभाली। रानी ने ग्वालियर से पूर्व का सबसे कठिन मोर्चा संभाला। इस अंतिम युद्ध में रानी के विश्वासपात्र सहयोगियों ने बराबर साथ दिया। उनके साथ सेना की कमान संभाले नवाब अली बहादुर भी अपने प्राणों की चिंता किए बगैर रणभूमि में वीरता से डटे रहे।
रानी दोनों हाथों से तलवार चलाने में पारंगत थीं। उन्होंने घोड़े की बाग दांतों में दबा कर अंग्रेजी सेना के होश उड़ाने का काम किया। युद्ध भूमि में उनकी सेविका मित्र मुंदर एक अंग्रेज सैनिक की गोली लगने से शहीद हो गयी। रानी के भयंकर प्रहारों से अंग्रेजी सेना पीछे हटने लगी लेकिन तभी ह्यूरोज स्वयं युद्धभूमि में आ गया। कहते हैं तब रानी लक्ष्मीबाई ने दामोदर राव को रामचंद्र देशमुख को सौंप दिया और आगे बढ़ी, सोनरेखा नाले को उनका घोड़ा पार न कर सका। वहीं एक सैनिक ने पीछे से रानी पर तलवार से जोरदार प्रहार कर दिया जिससे उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और उनकी एक आंख बाहर आ गयी।
कहते हैं घायल होते हुए भी उन्होंने उस अंग्रेज सैनिक को मौत के घाट उतार दिया और फिर अपने प्राण त्याग दिए। कुछ इतिहासकार 17 तथा कुछ 18 जून 1857 उनकी शहादत का दिन मानते हैं। रणभूमि के निकट ही रानी का बाबा गंगादास की कुटिया में अंतिम संस्कार किया गया। रानी की इच्छा अनुसार उनका मृत शरीर भी अंग्रेजों के हाथ न आ सका। 18 जून को रानी की वीरगति की खबर ब्रिटिश हुकूमत को हुई।शायद इसलिए उनकी अंतिम संस्कार की तिथि को लेकर इतिहास की पुस्तकें अलग-अलग तारीखें बताती हैं।
1857 की क्रांति बेशक सफल न हो सकी लेकिन ब्रिटिश हुकूमत को लोहे के चने चबाने पर मजबूर होना पड़ा। लार्ड कैनिंग के नेतृत्व में हुई इस क्रांति ने ब्रिटिश हुकूमत को अपनी नीतियों पर जबरदस्त परिवर्तन करने पर विवश कर दिया। उन्हें मानना पड़ा कि रानी लक्ष्मीबाई का साहस और शौर्य का कोई मुकाबला नहीं था ।
सुभद्रा कुमारी चौहान की लिखी पंक्तियाँ,
" बुंदेलों हर बोलो के मुह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लडी मर्दानी,वो तो झांसी वाली रानी थी"
पढ़ कर आज भी रानी का मर्दाना लिबास 19वी सदी में 21वी सदी की दुनिया को महिला सशक्तिकरण की राह दिखाता नज़र आता है।
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