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रमजान विशेष: इबादत और मदद में रम जाना है रमजान का मतलब

सार

रमजान का पाक महीना रोजा रखने के साथ साथ आत्मसंयम, इबादत और जरूरतमंदों की मदद और सेवा करने का बेहतरीन मौका देता है। रमजान अपनी गलतियों को सुधारने और दूसरों की मदद करने का बेहतरीन अवसर है। तप, तपस्या से तब्दीली की राह दिखाता रमजान, इस्लामी कैलेंडर का नौवां माह है।
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रमजान - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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माहे रमजान की आमद होने को है, हर मुसलमान को साल भर रमजान के महीना का शिद्दत से इंतेज़ार रहता है। कहते हैं इस महीने की बेहिसाब फ़ज़ीलते हैं। अल्लाह अपने बंदों को खास तौर पर रहमत से नवाजता है। यह महीना खुदा को राजी करने वाला है। इबादत में रम जाने वाला है। मदद के लिए उठ खड़े होने वाला है। खुदा अपने बंदों के द्वारा की गई किसी एक नेकी का सवाब (पुण्य) सत्तर गुना बढ़ाकर देता है इसलिए यह महीना नेकी कमाने वाला है। रमजान का मतलब इबादत और मदद में रम जाना ही तो होता है।

' जो कोई किसी रोज़ा तोड़ने वाले को खाना खिलाता है, उसे भी उसके बराबर सवाब मिलेगा, और रोज़ा रखने वाले के सवाब में कोई कमी नहीं की जाएगी।' 

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                          हदीस | तिर्मिजी


रमजान का पाक महीना रोजा रखने के साथ साथ आत्मसंयम, इबादत और जरूरतमंदों की मदद और सेवा करने का बेहतरीन मौका देता है। रमजान अपनी गलतियों को सुधारने और दूसरों की मदद करने का बेहतरीन अवसर है। तप, तपस्या से तब्दीली की राह दिखाता रमजान, इस्लामी कैलेंडर का नौवां माह है। कहते है, इस माह की बरकत से खुदा अपने बंदों की दुआएं सुनता है और मगफिरत (मुक्ति) आसान बनाता है।

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माहे रमजान में 30 रोजे होते हैं, जिन्हें तीन भागो में बांटा जाता है। पहला अशरा 10 दिन 'रहमत' का, दूसरा अशरा 10 दिन 'बरकत' का, तीसरा अशरा 10 दिन 'मगफिरत' का, जिसमें खुदा अपने बंदों के गुनाह माफ करता है।

रमजान में एक खूबसूरत संदेश दूसरों की मदद करने का भी है। जकात और सदके की हिदायत उन लोगों की मदद का जरिया है जो आर्थिक तंगी से खस्ताहाल जीवन गुजार रहे हैं। उन यतीमों के कांधे का मजबूत सहारा है जिनके सिर से मां बाप की नेमत को हटा लिया गया हो। जिस तरह हर मुसलमान के लिए रोजों को फर्ज किया गया है उसी तरह हर सम्पन्न मुस्लिम पर सदका और जकात लाजिमी है ताकि रमजान की रौनक से गरीबों की मदद हो सके।

रमजान की बरकत है कि ईद आने पर मुरझाए हुए चेहरों पर खुशियों की रौनक फैल जाती है। पड़ोसियों, रिश्तेदारों और समाज के जरूरतमंद लोगों की मदद करना इस महीने में उन तमाम लोगों पर फर्ज है जो संपन्न हैं और दूसरों की मदद करने में सक्षम हैं। पहली रमजान से ही बाजारों  में बढ़ती रंगत इस बात की तस्दीक करती है। 

रमजान में इबादत का महत्व

रमजान में इबादत का विशेष महत्व है रोजे रखने के साथ साथ पांचों वक्त की नमाज और तरावीह की विशेष नमाज का महत्व है। साथ ही कुरान की तिलावत और रातों को उठकर इबादत करना (तहज्जुद नमाज) आत्मशुद्धि के लिए बहुत अहम मानी है। बहुत सारे लोग खुद को घर से दूर मस्जिद में एकांत में खुदा की इबादत में मसरूफ कर लेते हैं। क्यों कि रमजान में इबादत और नेकी का फल अन्य दिनों के मुताबिक सत्तर गुना ज्यादा मिलता है। रोजा केवल भूखे पेट रहना नहीं है बल्कि आत्मसंयम की इबादत का पैगाम भी है। लोगों के घरों में इफ्तार में ढेरों पकवान बनाए जाते हैं और आस-पड़ोस में रोजेदारों के घरों में उसे पहुंचाने का रिवाज आत्मसंतुष्टि देता है। 

' ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े अनिवार्य किये गये हैं, जिस प्रकार तुमसे पहले लोगों पर अनिवार्य किये गये थे, ताकि तुम तक़्वा (ईश्वरीय चेतना) प्राप्त करो।' 
कुरआन | 2:183


रोजे के कई सामाजिक और वैज्ञानिक फायदे हैं। यह स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है। रोजा रखने से शरीर डिटॉक्स होता है और पाचन तंत्र को आराम भी मिलता है। दिन भर भूखा- प्यासा रहना अन्न और पानी की अहमियत बताते हैं जिससे हम उन लोगों की तकलीफ को समझ सकें, जो जीवन जीने के लिए सीमित साधन बमुश्किल जुटा पाते हैं। रमजान अमीर और गरीब के बीच की दूरी को कम करता है, क्योंकि सभी लोग एक साथ रोजा रखते हैं और एक साथ इफ्तार करते हैं।
मस्जिदों में होने वाले इफ्तार हर शख्स के लिए खुले रहते हैं।  

पूरे महीने के त्याग और इबादत के बाद ईद-उल-फितर के जश्न के रूप में ईद का त्यौहार खुशी और भाईचारे के प्रतीक के तौर पर दुनिया भर में मनाया जाता है। इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को फितरा (दान) देना अनिवार्य माना जाता है 
ताकि वे भी ईद की खुशियों में शामिल हो सकें। 

आदम की संतानों के सारे कर्म उनके लिए हैं, सिवाय रोज़े के, वह मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला दूंगा' 
                हदीस | सहीह अल-बुखारी


रमजान का वास्तविक अर्थ अपने आप को बेहतर इंसान बनाना, समाज की भलाई के लिए काम करना और जरूरतमंदों, कमजोरों और बेसहारा लोगों का सहारा बनना है ताकि खुदा को राजी किया जा सके और ईश्वर के करीबियों में शामिल हुआ जा सके। अगर खुदा के बंदे बारहों महिने आठों पहर रमजान की तरह रम कर जिये, तो हम एक खूबसूरत संसार बनाने में, सच्ची इबादत और मदद के साथ एक सार्थक जिंदगी जीने में सफल हो सकेंगे! साथ ही खुदा को राजी करने में कामयाब हो सकेंगे।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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