भारत को यदि विश्व की सबसे बड़ी आध्यात्मिक सभ्यता कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। देश में प्रतिदिन करोड़ों लोग मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों, चर्चों और दरगाहों में श्रद्धा अर्पित करते हैं। यह आस्था केवल धार्मिक नहीं बल्कि आर्थिक शक्ति भी है।
वैष्णो देवी: बोर्ड आधारित उत्तरदायित्व
श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड भारत में धार्मिक प्रशासन का दूसरा सफल मॉडल है।
श्राइन बोर्ड के अनुसार 2024-25 में श्रद्धालुओं द्वारा किए गए दान में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और दान लगभग ₹172 करोड़ तक पहुँच गया। यह राशि तीर्थयात्रियों की सुविधाओं, अस्पतालों, विश्वविद्यालय, आधारभूत संरचना और सुरक्षा व्यवस्था पर व्यय की जाती है।
यह मॉडल दर्शाता है कि पारदर्शी संस्थागत व्यवस्था श्रद्धालुओं का विश्वास बढ़ाती है।
स्वर्ण मंदिर: सेवा आधारित धार्मिक अर्थव्यवस्था
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) धार्मिक दान को सामाजिक सेवा में बदलने का अद्वितीय उदाहरण है।
एसजीपीसी ने वर्ष 2025-26 के लिए लगभग ₹1,386 करोड़ का बजट पारित किया है। इस बजट का बड़ा भाग गुरुद्वारों, शिक्षा, चिकित्सा, धार्मिक प्रचार, छात्रवृत्ति और जनकल्याण पर खर्च किया जाता है।
विश्वविख्यात हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) का लंगर प्रतिदिन लगभग 75,000 से 1,00,000 लोगों को निःशुल्क भोजन कराता है। विशेष अवसरों पर यह संख्या कई लाख तक पहुँच जाती है। दुनिया में इतनी विशाल सामुदायिक रसोई शायद ही कहीं और हो।
मस्जिदें, वक्फ और चर्च
भारत में केंद्रीय वक्फ परिषद तथा विभिन्न राज्य वक्फ बोर्ड लाखों वक्फ संपत्तियों के नियमन की जिम्मेदारी निभाते हैं। वक्फ व्यवस्था में भी पारदर्शिता और पेशेवर प्रबंधन को लेकर समय-समय पर सुधारों की मांग उठती रही है।
इसी प्रकार चर्च-आधारित ट्रस्ट और डायोसीज़ शिक्षा, स्वास्थ्य, अनाथालयों और सामाजिक सेवा संस्थानों का संचालन करते हैं। भारत के अनेक प्रतिष्ठित विद्यालय और अस्पताल इन्हीं संस्थाओं द्वारा संचालित हैं। धार्मिक दान को सामाजिक पूंजी में बदलने का यह भी एक महत्वपूर्ण मॉडल है।
समस्या किसी धर्म की नहीं, व्यवस्था की है
यह कहना अनुचित होगा कि केवल मंदिरों में भ्रष्टाचार है या केवल किसी अन्य धार्मिक समुदाय की व्यवस्था आदर्श है।
जहाँ भी हजारों करोड़ रुपये का प्रवाह होगा वहाँ सुशासन, स्वतंत्र लेखा परीक्षण और जवाबदेही आवश्यक होगी। यही सिद्धांत सरकार, कॉरपोरेट, विश्वविद्यालय और धार्मिक संस्थाओं- सभी पर समान रूप से लागू होता है। आस्था किसी संस्था को वित्तीय जवाबदेही से मुक्त नहीं कर सकती।
क्या होना चाहिए सुधार?
भारत को अब राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक संस्थाओं के लिए न्यूनतम सुशासन मानक विकसित करने चाहिए-
यदि तिरुपति पांच हजार करोड़ रुपये से अधिक का बजट आधुनिक वित्तीय प्रणाली से संचालित कर सकता है, यदि वैष्णो देवी बोर्ड तीर्थ सुविधाओं और सामाजिक अवसंरचना पर दान का व्यवस्थित उपयोग कर सकता है, यदि एसजीपीसी शिक्षा, स्वास्थ्य और विश्व के सबसे बड़े सामुदायिक लंगर का संचालन संस्थागत अनुशासन से कर सकती है, तो देश के सभी बड़े धार्मिक संस्थानों चाहे वे मंदिर हों, मस्जिदें, गुरुद्वारे, चर्च या दरगाहें, के लिए भी समान स्तर की पारदर्शिता स्थापित की जा सकती है।
यह किसी धर्म पर प्रश्न नहीं है।
यह श्रद्धालु के अधिकार का प्रश्न है।
दान देने वाला व्यक्ति भगवान से हिसाब नहीं मांगता, लेकिन संस्था से पारदर्शिता की अपेक्षा अवश्य करता है।
भारतीय लोकतंत्र में धार्मिक स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण है धार्मिक संस्थाओं की सार्वजनिक जवाबदेही। आस्था को संरक्षण की आवश्यकता नहीं; उसे ईमानदार प्रबंधन की आवश्यकता है। क्योंकि अंततः मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों और चर्चों की सबसे बड़ी संपत्ति उनका स्वर्ण भंडार नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास है। और विश्वास तभी स्थायी रहता है, जब उसके साथ पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिक प्रशासन भी जुड़ा हो।
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