भारतीय संस्कृति में राम रचे-बसे हुए हैं, या यूं कहें, भारतीय संस्कृति राम में रची-बसी हुई है। जन-जीवन इससे संचालित होता है। ‘राम-राम’ के साथ दिन शुरु होता है तो ‘राम नाम सत्य’ के साथ जीवन का अंत होता है। राम की जीवन यात्रा के साथ यहां के त्योहार जुड़े हुए हैं। दशहरा, दीपावली, राम नवमी ऐसे ही त्योहार हैं, जो बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं।
वाल्मीकि के मुख से क्रौंच-वध से करुणा विगलित हो जो आदि श्लोक निकला, आगे चल कर 24,000 श्लोक, सात काण्ड के महाकाव्य ‘रामायण’ में परिणत हुआ। कालीदास का ‘रघुवशम्’ इसी ग्रंथ पर आधारित है। फ़िर तो सबके अपने-अपने राम हुए। तुलसी ने उसे लोक में ‘रामचरित मानस’ के रूप में उतारा, जिसका परायण उत्तर भारत में नित-नित होता रहता है।
भारत की विभिन्न भाषाओं में रामकथा प्राप्त होती है-
काश्मीरी कवि क्षेमेंद्र की ‘रामायण मंजरी’, राजशेखर का ‘बाल रामायण’ है, विदर्भ के महाकवि भवभूति ने ‘उत्तररामचरित’ की रचना की। उड़िसा के जयदेव ने ‘प्रसन्नराघव’ लिखा। असमिया में माधवकंदलिके, माधवदेव, शंकरदेव कवि त्रयी ने मिलकर ‘रामायण’ रची।
बांग्ला में कृतिवास ओझा की रामायण का नाम लोग जानते हैं। ओड़िया में बलराम दास ने रामकथा कही। मराठी में संत एकनाथ की ‘भावार्थ रामायण’ प्रसिद्ध है, गुजराती में पंडित गिरिधर की ‘गिरिधर रामायण’ है, तो तेलगू में गोन बुद्धा रेड्डी ने दोहों में रची ‘द्विपद रामायण’, तेलगू में ही ‘रंगनाथ रामायण’ मिलती है।
कन्नड में नागचंद्र की ‘पम्प रामायण’ है। कन्नड में ही नरहरि ने ‘तोरवे रामायण’ का लेखन किया। तमिल में कंबन की रामायण है, तो मलयालम में तुंचतु रामानुजन एऴुत्तच्छन लिखित ‘आध्यात्म रामायण’ जन-जन द्वारा पढ़ी जाती है।
भारत ही नहीं भारत के बाहर भी रामकथा का लेखन हुआ। नेपाली में भानुभक्त की ‘भानुभक्त को रामायण’ के अलावा रामायण के संस्करण मलाया, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, जापान, थाईलैंड, चीनी, रूसी, बर्मी, सिंहली आदि देशों में भी मिलते हैं।
इसी तरह विभिन्न प्रांतों एवं देशों में रामलीला अपनी-अपनी शैली में खेली जाती है। और जब सिनेमा का आविर्भाव हुआ तो वह भी राम से अछूता न रहा। भारत की हर भाषा के सिनेमा में राम मिलते हैं।
रामायण का शाब्दिक अर्थ है, राम की यात्रा। मुख्य रूप से इसमें राम का पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन गमन, रावण द्वारा सीता हरण और वन में रहते हुए राम-लक्ष्मण द्वारा दुष्ट शक्तियों का नाश करना आता है। कई बार राम का बचपन और लंका से अयोध्या लौटने के बाद सीता का वन गमन तथा लव-कुश और आगे की कथा भी कही गई है। सीता का अग्नि प्रवेश एवं राम का सरयु में समाधि लेना भी चित्रित होता है। कई बार संपूर्ण रामायण परदे पर आती है, कई बार कथा का मात्र कोई एक आयाम उभरता है।
रुपहले पर्दे के राम और फिल्मों की आस्था-
‘संपूर्ण रामायण’ के नाम से बापू नामक निर्देशक ने 1973 में 175 मिनट की एक ड्रामा, फैंटसी फिल्म बनाई। फिल्म राम जन्मोत्सव से प्रारंभ होती है और राम-सीता विवाह, 14 वर्ष वनवास, सीता-विछोह, रावण-वध से होते हुए राम के राज्याभिषेक तक को समेटती है। इस तेलगू फिल्म में शोभन बापू, चंद्रकला, एस.वी. रंगा राव ने भूमिकाएं की हैं।
वैसे इसी नाम से 1961 में बाबूभाई मिस्त्री ने हिन्दी में फिल्म बनाई थी, जिसमें महिपाल, अनीता गुहा, ललिता पवार ने अभिनय किया था। ठीक समझा, ललिता पवार मंथरा थीं, तो हेलेन सूर्पनखा बनी थीं। लेकिन इसके बहुत पहले, मूक युग के सिनेमा काल में भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फालके ने ‘लंका दहन’ बनाई। इसे रामायण का सबसे पुराना फिल्मी संस्करण माना जाता है।
1917 की इस फिल्म में राम के रूप में जो अभिनेता था, वही सीता की भूमिका कर रहा था। उन दिनों सिनेमा में स्त्री चरित्र केलिए स्त्री कलाकार मिलना कठिन था। राम-सीता की दोहरी भूमिका में अन्न सैलुन्के थे। गनपत शिन्दे हनुमान बने थे। दादा साहेब ने इसे ‘रामायण’ के आधार पर लिखा भी स्वयं था। आज इसे कल्ट का दर्जा प्राप्त है। और करीब सौ साल बाद 2019 में समय की मांग को देखते हुए शादाब सिद्दिकी ने एक लघु फ़िल्म ‘जय श्री राम’ का निर्देशन किया। लेखन का काम मकबूल निसार अहमद ने किया और गौरव दीक्षित बने राम। मनीष देव झा तथा जावेद रहमान अन्य अभिनेता थे।