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अयोध्या विवादः माननीय सुप्रीम कोर्ट की गरिमा का मान रखना होगा दोनों पक्षों को

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रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के ऐतिहासिक विवाद के मुकदमे का आज आखिरी दिन था। - फोटो : file photo
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रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के ऐतिहासिक विवाद के मुकदमे का आज आखिरी दिन था। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 23 दिन के लिए फैसला सुरक्षित कर लिया है। खास बात रही कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तय समय से एक घंटा पहले ही खत्म हो गई। अदालत ने कहा  है कि अगले तीन दिन तक इस मामले में दस्तावेज जमा कराए जा सकते हैं।

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इस ऐतिहासिक फैसले पर चल रही सुनवाई पर मीडिया से लेकर पूरे देश की दिनभर निगाहें थीं। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर पल-पल की अपडेट दे रहे मीडिया के लिए सबसे बड़ी खबर अदालत में मुस्लिम पक्ष पक्ष के वकील द्वारा दो टुकड़ों में नक्शा फाड़ने की रही। हालांकि माननीय कोर्ट ने मामले को ज्यादा तूल ना देते हुए फैसला 23 दिनों के लिए सुरक्षित कर लिया। 

बहरहाल, नक्शा फाड़ने की इस घटना ने एक तरह से सनसनी को पैदा किया। मामला कुल मिलाकर यही था कि मुस्लिम पक्ष के वकील ने नक्शा बताकर जो दावा किया था वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक किताब में छपा था। यह दावा बेशक मूर्खतापूर्ण था लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता को ये हरकत नहीं करनी चाहिए थी। बता दें कि इससे पहले भी कथित पक्ष के वकील ने झल्ला कर दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की माननीय पीठ पर ही सवाल उठा दिए थे। 

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केस में दोनों ही पक्ष अपने पक्ष में कोई ठोस सबूत नहीं दे पाए। - फोटो : self
दरअसल, अदालती कार्यवाही और नियमों की बात करें तो किसी भी जज को वकील से सवाल करने का हक है ताकि वह केस को सही परिप्रेक्ष्य में समझ कर उस पर अपना फैसला तय कर सके। यह बात संबंधित पक्ष के वकील को समझनी चाहिए थी। लेकिन उत्तेजना में वे अपना धैर्य खो बैठे।

इस पूरे मामले की खास बात यह है कि केस में दोनों ही पक्ष अपने पक्ष में कोई ठोस सबूत नहीं दे पाए। पूरा केस मान्यता पर लड़ा जा रहा है।  जन्मस्थान पक्ष की मान्यता है कि श्रीराम काजन्म स्थान यही हैं। इसे साबित करने के लिए उसके पास तमाम विदेशी यात्रियों के वर्णन, अंग्रेजों के गजेटियर, इतिहास की किताबें, पुराण आदि हैं। लेकिन इन सबको ठोस सबूत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये सारे जिक्र लोक मान्यता पर आधारित हैं।

इधर, इस सदी के दूसरे दशक में हुई पुरातत्व की खुदाई में यह बात जरूर सामने आई कि मस्जिद के ढांचे के नीचे कोई मंदिर था। उसे तोड़ा भी गया होगा। लेकिन ये कोई तर्क नहीं है क्योंकि बाबर जैसे आक्रान्ताओं ने न जाने कितने मंदिर तोड़कर उसके अवशेषों पर मस्जिदें बनावाई। एक कब्र खोदी जाएगी तो कई मुर्दे निकल आएंगे। ये पुरानी बात हो गई। 

बहरहाल, अंग्रेजों के राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर उस जमीन पर दोनों ही अपना दावा ठोंक रहे हैं। उनके पास जो नक्शे हैं उन पर 'मस्जिद', 'कब्रिस्तान' और 'जन्मस्थान' तीनों शब्द लिखे हैं। दोनों पक्ष अपने नक्शे और दस्तावेज को सही ठहरा रहे हैं।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के लिए किसी एक के पक्ष में फैसला करना कठिन है। लेकिन अगले एक महीने में सुप्रीम कोर्ट को फैसला देना है। 

कोर्ट की कार्रवाई की पिछली चालीस सुनवाइयों पर मैं लगातार नजर रख रहा हूं। कोर्ट के दोनों पक्ष के वकीलों के सम्पर्क में हूं। मामला 50-50 है। सब पीठ की व्याख्या पर निर्भर है। जो भी हो 433 साल पुराना ये विवाद अब खत्म होना चाहिए।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण ): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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