केस में दोनों ही पक्ष अपने पक्ष में कोई ठोस सबूत नहीं दे पाए।
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दरअसल, अदालती कार्यवाही और नियमों की बात करें तो किसी भी जज को वकील से सवाल करने का हक है ताकि वह केस को सही परिप्रेक्ष्य में समझ कर उस पर अपना फैसला तय कर सके। यह बात संबंधित पक्ष के वकील को समझनी चाहिए थी। लेकिन उत्तेजना में वे अपना धैर्य खो बैठे।
इस पूरे मामले की खास बात यह है कि केस में दोनों ही पक्ष अपने पक्ष में कोई ठोस सबूत नहीं दे पाए। पूरा केस मान्यता पर लड़ा जा रहा है। जन्मस्थान पक्ष की मान्यता है कि श्रीराम काजन्म स्थान यही हैं। इसे साबित करने के लिए उसके पास तमाम विदेशी यात्रियों के वर्णन, अंग्रेजों के गजेटियर, इतिहास की किताबें, पुराण आदि हैं। लेकिन इन सबको ठोस सबूत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये सारे जिक्र लोक मान्यता पर आधारित हैं।
इधर, इस सदी के दूसरे दशक में हुई पुरातत्व की खुदाई में यह बात जरूर सामने आई कि मस्जिद के ढांचे के नीचे कोई मंदिर था। उसे तोड़ा भी गया होगा। लेकिन ये कोई तर्क नहीं है क्योंकि बाबर जैसे आक्रान्ताओं ने न जाने कितने मंदिर तोड़कर उसके अवशेषों पर मस्जिदें बनावाई। एक कब्र खोदी जाएगी तो कई मुर्दे निकल आएंगे। ये पुरानी बात हो गई।
बहरहाल, अंग्रेजों के राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर उस जमीन पर दोनों ही अपना दावा ठोंक रहे हैं। उनके पास जो नक्शे हैं उन पर 'मस्जिद', 'कब्रिस्तान' और 'जन्मस्थान' तीनों शब्द लिखे हैं। दोनों पक्ष अपने नक्शे और दस्तावेज को सही ठहरा रहे हैं।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के लिए किसी एक के पक्ष में फैसला करना कठिन है। लेकिन अगले एक महीने में सुप्रीम कोर्ट को फैसला देना है।
कोर्ट की कार्रवाई की पिछली चालीस सुनवाइयों पर मैं लगातार नजर रख रहा हूं। कोर्ट के दोनों पक्ष के वकीलों के सम्पर्क में हूं। मामला 50-50 है। सब पीठ की व्याख्या पर निर्भर है। जो भी हो 433 साल पुराना ये विवाद अब खत्म होना चाहिए।
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