रक्षाबंधन का पर्व पुनः स्वदेशी राखियों से मनाया जाने लगा है। बहन-भाई के पवित्र पर्व में चीन की व्यापारिक घुसपैठ करीब-करीब समाप्त हो चुकी है। यह सुनने में आश्चर्यजनक लगता है, लेकिन यह सत्य है। पिछले कुछ वर्षों में 'मेक इन इंडिया', 'आत्मनिर्भर भारत' और 'वोकल फॉर लोकल' की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील ने देशवासियों को स्वदेशी राखियों की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित किया है।
एक अनुमान के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष 5000-6000 करोड़ रुपए का राखियों का व्यापार होता है। हर वर्ष इस में 10-15 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा रही है। पहले करीब 30 प्रतिशत बाजार पर चीन का कब्जा हो गया था, जो अब लगभग सिमट गया है।
समय के साथ राखियों का स्वरूप बदला है। पहले चीन से आयातित राखियां बाजार में अधिक दिखती थीं, जो स्वदेशी राखियों से सस्ती थीं। चीनी राखियां प्लास्टिक और सिंथेटिक सामग्री से बनी होती हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल नहीं हैं, जबकि स्वदेशी राखियां भारतीय कारीगरों द्वारा हस्तनिर्मित, पारंपरिक और पर्यावरण के अनुकूल सामग्री से बनी होती हैं।
आज बाजार में रेशम, सूती धागे, गोला, मौली, चंदन, मिट्टी, बांस, जूट, कागज, बीज आदि का प्रयोग करके सुंदर, टिकाऊ और जैविक राखियां उपलब्ध हैं। स्वदेशी राखियां ऐसे प्राकृतिक पदार्थों से बनाई जाती हैं, जो बायोडिग्रेडेबल हैं।
भारत में स्वदेशी राखियों को बढ़ावा मिलने से महिला स्वयं सहायता समूह और स्वदेशी राखी निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले गैर सरकारी संगठनों को बल मिला है। मध्य प्रदेश, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा, बिहार जैसे राज्यों में लाखों की संख्या में महिलाएं राखी बनाकर अपनी आजीविका चला रही हैं।
भारत में निर्मित राखियां कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया, फिजी, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों को निर्यात की जा रही हैं। वर्ष 2024 के आंकड़ों पर नजर डालें तो राखियों का निर्यात करीब 300 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। प्रवासी भारतीयों में स्वदेशी राखियों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है।
भारत सरकार और उसके संगठन भी स्वदेशी राखियों को बढ़ावा और प्रोत्साहन देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं। खादी ग्रामोद्योग आयोग ने खादी राखी के निर्माण को प्रोत्साहन दिया है। डाक विभाग स्वदेशी राखियों को डाक से डिलीवरी की सुविधा दे रहा है। कई भारतीय स्टार्टअप और युवा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर स्वदेशी राखियां बेचकर ‘वोकल फॉर लोकल’ के अभियान को गति दे रहे हैं।
कई नए प्रयोग स्वदेशी राखियों में देखने को मिल रहे हैं। जैसे बीज राखी, जिसमें राखी में बीज होता है, जिसे बाद में मिट्टी में दबाने पर पौधा उगता है। खादी राखी, खादी के धागों और कपड़ों से बनती है, यह राखी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रही है। मिट्टी की राखी न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि कई आकर्षक डिजाइनों में उपलब्ध है।
बांस राखी को आदिवासी क्षेत्रों में महिलाएं तैयार करती हैं। पेंटेड या हैंडमेड राखी में लोककलाओं जैसे मधुबनी, वारली या कच्छ कढ़ाई का प्रयोग किया जाता है। सुखद बात है कि स्वदेशी राखियों के बढ़ते चलन से भारत के कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योग को नया जीवन मिला है।
वैसे, रक्षाबंधन के स्वदेशीकारण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पिछले काफी वर्षों से संघ रक्षाबंधन को स्वदेशी बनाने के लिए अभियान चला रहा है।
संघ का वनवासी कल्याण आश्रम, संत निरंकारी मिशन, विद्या भारती, सेवा भारती जैसे आनुवांशिक संगठन स्वदेशी रक्षाबंधन के प्रचार-प्रसार में जुटे हैं। राखी के स्वदेशीकारण से संघ ने छोटे व्यापारियों, महिला स्वयं सहायता समूह और ग्रामीणों को आगे बढ़ाया है।
दरअसल, संघ के लिए रक्षाबंधन एक सामाजिक समरसता का पर्व है और वह इसके माध्यम से पूरे देश में संदेश देना चाहता है कि हम सब भारतीय एक हैं और हर व्यक्ति समाज की रक्षा का भागीदार है। अब राखी का कारोबार केवल रक्षा सूत्र बांधने का पर्व भर नहीं है, बल्कि यह स्वदेशी जागरण का एक प्रतीक बन गया है, जो सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुका है।
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